– सुनील कुमार सिंह
आज का युग विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता का युग है। नई पीढ़ी शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व दे रही है। यह प्रगति समाज के विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी देखने को मिल रही है। आज अनेक युवा अपने बुजुर्गों के प्रति पहले जैसी संवेदनशीलता, सम्मान और आत्मीयता नहीं दिखा रहे हैं। माता-पिता, दादा-दादी और परिवार के अन्य बुजुर्गों की उपेक्षा करना एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है।
नई पीढ़ी के बुजुर्गों के प्रति असंवेदनशील होने के अनेक कारण हैं। आधुनिक जीवन की व्यस्तता, भौतिक सुख-सुविधाओं की बढ़ती चाह, पाश्चात्य जीवनशैली का अंधानुकरण और संयुक्त परिवारों का टूटना इसके प्रमुख कारण हैं। आज अनेक युवा अपने करियर, व्यवसाय और व्यक्तिगत जीवन में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने बुजुर्गों के साथ बैठने और उनकी बातें सुनने का समय नहीं मिलता। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रयोग ने भी पारिवारिक संवाद को प्रभावित किया है। कुछ युवा बुजुर्गों के अनुभवों और विचारों को पुरानी सोच मानकर उनकी उपेक्षा करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि आज उनकी सफलता के पीछे बुजुर्गों का त्याग, परिश्रम और मार्गदर्शन भी शामिल है।
बुजुर्गों की उपेक्षा के परिणाम अत्यंत गंभीर होते हैं। इससे उनमें अकेलेपन, असुरक्षा और मानसिक तनाव की भावना बढ़ती है। वृद्धावस्था में व्यक्ति को प्रेम, सहयोग और देखभाल की विशेष आवश्यकता होती है। जब अपने ही परिवार के सदस्य उसकी उपेक्षा करते हैं, तो उसे गहरा दुख पहुँचता है। कई बुजुर्ग उचित देखभाल और भावनात्मक सहारे से वंचित रह जाते हैं। इसके अतिरिक्त, परिवारों में प्रेम, सम्मान और आपसी सहयोग की भावना कमजोर होने लगती है। बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार से संस्कार सीखते हैं। यदि वे अपने बड़ों का अनादर होते देखते हैं, तो भविष्य में उनके भीतर भी ऐसी प्रवृत्ति विकसित हो सकती है। इस प्रकार, बुजुर्गों की उपेक्षा केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के नैतिक पतन का कारण बन सकती है।
नई पीढ़ी का कर्तव्य है कि वह अपने बुजुर्गों के प्रति प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता का भाव रखे। हमें उनकी बात ध्यानपूर्वक सुननी चाहिए, उनके अनुभवों से सीखना चाहिए तथा बीमारी और कठिनाई के समय उनकी उचित देखभाल करनी चाहिए। उनके साथ समय बिताना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य मानना हमारा नैतिक दायित्व है। बुजुर्गों को आर्थिक सहायता के साथ-साथ भावनात्मक सहारा देना भी आवश्यक है।
अंततः, बुजुर्ग किसी भी परिवार की अमूल्य धरोहर होते हैं। वे हमारे संस्कारों, परंपराओं और अनुभवों के संरक्षक हैं। जिस प्रकार वृक्ष अपनी जड़ों के सहारे खड़ा रहता है, उसी प्रकार परिवार बुजुर्गों के अनुभव और मार्गदर्शन से मजबूत बनता है। इसलिए नई पीढ़ी को आधुनिकता के साथ मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए। बुजुर्गों का सम्मान करना केवल हमारा कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान भी है।