सौरभ वार्ष्णेय
लोकतंत्र में शब्दों की अपनी शक्ति होती है। शब्द कभी भरोसा पैदा करते हैं, कभी चेतावनी देते हैं, कभी उम्मीद जगाते हैं और कभी राजनीतिक बहस को इतना तीखा बना देते हैं कि उनके अर्थ से अधिक उनके इस्तेमाल पर चर्चा होने लगती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में देश की आंतरिक चुनौतियों, राष्ट्रविरोधी सोच, विकास और राष्ट्रीय एकता से जुड़े कई मुद्दे उठाए। इसी क्रम में यदि उन्होंने “दिमागी नक्सली” जैसे शब्द का इस्तेमाल किया, तो यह स्वाभाविक है कि उस पर राजनीतिक और सामाजिक बहस हो। प्रश्न यह है कि आखिर “दिमागी नक्सली” से तात्पर्य क्या है और लाल किले जैसे सर्वोच्च राष्ट्रीय मंच से निकला यह शब्द विरोधियों को क्यों चुभ रहा है?
सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि दिमागी नक्सली कोई सामान्य कानूनी या संवैधानिक श्रेणी नहीं है। इसे मुख्यत: राजनीतिक और वैचारिक संदर्भ में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द माना जा सकता है। सामान्य अर्थ में इसका प्रयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जिन पर आरोप लगाया जाता है कि वे हिंसक नक्सली विचारधारा, राज्य-विरोधी सोच या लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास को वैचारिक स्तर पर बढ़ावा देते हैं, भले ही वे स्वयं हथियार उठाकर हिंसा में शामिल न हों।लेकिन यहीं से असली बहस शुरू होती है। किसी व्यक्ति की सरकार से असहमति, किसी नीति का विरोध, किसी आंदोलन का समर्थन अथवा सत्ता की आलोचना को सीधे दिमागी नक्सलवाद कह देना लोकतांत्रिक विमर्श के लिए उचित नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं है और विपक्षी विचार रखना राष्ट्रविरोध नहीं है। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति या संगठन वास्तव में हिंसा, अलगाववाद, संवैधानिक व्यवस्था को हिंसक तरीके से गिराने या प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों के समर्थन में सक्रिय है, तो उसकी विचारधारा पर गंभीर प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है।
यानी फर्क करना जरूरी है—असहमति और हिंसक विचारधारा में, आलोचना और राष्ट्रविरोध में, विपक्ष और उग्रवाद में। लाल किले की प्राचीर केवल भाषण देने का मंच नहीं है। यह भारत की स्वतंत्रता, संविधान, लोकतंत्र और करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसलिए वहां से प्रधानमंत्री के मुख से निकला प्रत्येक शब्द राजनीतिक बयान से कहीं अधिक महत्व रखता है। जनता उसके शब्दों में सरकार की दिशा और भविष्य की प्राथमिकताओं का संकेत खोजती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री द्वारा इस्तेमाल किए गए किसी भी तीखे या असामान्य शब्द पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो जाती हैं। विरोधियों को दिमागी नक्सली शब्द चुभने का एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि राजनीतिक दलों और विचारधाराओं के बीच पहले से ही अविश्वास की खाई गहरी है। जब सत्ता पक्ष किसी विचारधारा या समूह पर गंभीर आरोप लगाने वाली भाषा का इस्तेमाल करता है, तो विपक्ष को आशंका होती है कि कहीं असहमति की व्यापक श्रेणी को ही राष्ट्रविरोध के दायरे में तो नहीं लाया जा रहा। यही आशंका राजनीतिक विवाद को जन्म देती है। लेकिन इस बहस का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत ने दशकों तक नक्सल हिंसा की चुनौती झेली है। जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा, सुरक्षा बलों पर हमले, विकास कार्यों में बाधा और निर्दोष नागरिकों की मौत ने अनेक परिवारों को प्रभावित किया। नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल बंदूक से नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए विकास, शिक्षा, रोजगार, प्रशासनिक पहुंच, न्याय और स्थानीय लोगों का विश्वास भी आवश्यक है।
यहीं दिमागी नक्सलवादजैसी अवधारणा पर गंभीर विमर्श की जरूरत पड़ती है। यदि किसी हिंसक विचारधारा का प्रभाव समाज में वैचारिक स्तर पर फैलता है, तो उसका मुकाबला लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के माध्यम से किया जाना चाहिए। लेकिन इस काम में सबसे बड़ा हथियार तर्क और संवाद होना चाहिए, लेबल नहीं। भारत की ताकत ही उसकी विविधता है। यहां वामपंथी विचार भी हैं, दक्षिणपंथी विचार भी हैं, समाजवादी विचार भी हैं, उदारवादी विचार भी हैं और अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक धाराएं भी हैं। इनमें से हर विचार से सहमत होना संभव नहीं, लेकिन हर असहमति को देशविरोधी बताना लोकतांत्रिक परंपरा को कमजोर कर सकता है। वास्तविक चुनौती यह है कि देश विरोधी हिंसक गतिविधियों और लोकतांत्रिक असहमति के बीच स्पष्ट रेखा कैसे खींची जाए। यदि यह रेखा धुंधली होती है तो राजनीतिक शब्दावली समाज को बांट सकती है। यदि यह रेखा स्पष्ट रहती है तो सुरक्षा और लोकतंत्र दोनों मजबूत होते हैं।
प्रधानमंत्री के भाषणों की एक विशेषता यह रही है कि वे अक्सर राजनीतिक संदेश के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय अभियान का आह्वान भी करते हैं। लाल किले से दिए गए भाषण का महत्व इसी कारण बढ़ जाता है। यह अवसर केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने का नहीं, बल्कि देश के सामने मौजूद चुनौतियों को व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण से रखने का भी होता है।इसलिए प्रधानमंत्री के किसी कथन को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उसके व्यापक संदर्भ को समझना चाहिए। यदि दिमागी नक्सली शब्द का उद्देश्य हिंसक विचारधारा के वैचारिक समर्थकों की ओर संकेत करना है, तो सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी परिभाषा क्या है। कौन व्यक्ति या कौन-सी गतिविधि इस श्रेणी में आती है? क्या केवल सरकार की आलोचना करने वाला व्यक्ति भी इसके अंतर्गत आएगा? क्या किसी नीति का विरोध करने वाला नागरिक भी इसमें शामिल होगा? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर लोकतांत्रिक समाज में बेहद जरूरी हैं। क्योंकि शब्द जितना बड़ा मंच पाता है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है।
विपक्ष की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। यदि सरकार किसी गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित करती है, तो हर बात को केवल राजनीतिक हमला बताकर खारिज कर देना भी उचित नहीं। भारत में नक्सली हिंसा की वास्तविकता रही है और देश ने इसकी कीमत चुकाई है। इसलिए यदि सरकार वैचारिक स्तर पर हिंसक उग्रवाद के विस्तार की बात करती है तो विपक्ष को तथ्यों के आधार पर जवाब देना चाहिए।लेकिन विपक्ष को यह सुनिश्चित करने का अधिकार भी है कि लोकतांत्रिक असहमति को अपराध या राष्ट्रविरोध का पर्याय न बनाया जाए। संसद, न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय और नागरिक समाज लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इन संस्थाओं में सरकार की आलोचना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है।आज सोशल मीडिया ने इस बहस को और जटिल बना दिया है। कोई भी शब्द कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। संदर्भ हटाकर केवल एक वाक्य या एक शब्द वायरल हो सकता है। इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है और गंभीर विषय नारेबाजी में बदल जाते हैं। “दिमागी नक्सली” भी ऐसा ही शब्द है जिसे संदर्भ से काटकर इस्तेमाल करने पर भ्रम पैदा हो सकता है।जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर कठोरता हो, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न पर संवेदनशीलता भी बनी रहे। सरकार को हिंसा और उग्रवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन कार्रवाई कानून के दायरे में होनी चाहिए। विपक्ष को सरकार की नीतियों पर तीखी आलोचना करनी चाहिए, लेकिन आलोचना तथ्य और तर्क पर आधारित होनी चाहिए।लाल किले की प्राचीर से निकले शब्दों की असली परीक्षा यही है कि वे देश को जोड़ते हैं या राजनीतिक खेमों के बीच दूरी बढ़ाते हैं। प्रधानमंत्री का पद दलगत राजनीति से ऊपर राष्ट्रीय नेतृत्व की अपेक्षा रखता है। उसी प्रकार विपक्ष की भूमिका भी केवल विरोध करने की नहीं, बल्कि वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करने की है।आज भारत को ऐसे राजनीतिक विमर्श की आवश्यकता है जिसमें राष्ट्रहित और लोकतांत्रिक असहमति एक-दूसरे के विरोधी न माने जाएं। देश की सुरक्षा भी जरूरी है और नागरिक स्वतंत्रता भी। विकास भी जरूरी है और सामाजिक न्याय भी। सरकार की मजबूती भी आवश्यक है और विपक्ष की प्रभावी आवाज भी।दिमागी नक्सली शब्द पर बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण वह प्रश्न है जिसे यह बहस सामने लाती है— क्या हम विचार से विचार का मुकाबला करेंगे या विचार रखने वाले व्यक्ति को ही दुश्मन घोषित कर देंगे? भारत की लोकतांत्रिक परंपरा का उत्तर स्पष्ट होना चाहिए। हिंसा का विरोध हो, आतंक और उग्रवाद के खिलाफ कठोरता हो, लेकिन विचारों का मुकाबला विचारों से हो। असहमति का जवाब तर्क से हो और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का जवाब कानून से।
लाल किले की प्राचीर से निकला हर शब्द इतिहास में दर्ज होता है। इसलिए सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—सभी को शब्दों की ताकत और जिम्मेदारी दोनों समझनी होंगी। राष्ट्रवाद को मजबूत करने का सबसे प्रभावी रास्ता केवल विरोधियों को नाम देना नहीं, बल्कि ऐसा भारत बनाना है जिसमें असहमति के बावजूद नागरिक स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और राष्ट्र की मुख्यधारा का हिस्सा महसूस करे। यही लोकतंत्र की असली शक्ति है और यही भारत की सबसे बड़ी पहचान भी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।
सौरभ वार्ष्णेय
BSc(Ag), LLB, PGDJMC, MJ
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।