तेरह वर्षों से उपेक्षा और भेदभाव का शिकार टीईटी शिक्षक, शिलचर में तीन जिलों के संयुक्त पत्रकार सम्मेलन में फूटा आक्रोश


“सदौ असम प्राथमिक टीईटी उत्तीर्ण शिक्षक समाज” ने 7 दिनों में वार्ता की दी चेतावनी, वरना होगा आंदोलन

शिलचर, 5 जुलाई:
तेरह वर्षों से लगातार उपेक्षा, भेदभाव और अन्याय का शिकार हो रहे असम के प्राथमिक स्तर के टीईटी उत्तीर्ण शिक्षक एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर मुखर हो उठे हैं। शुक्रवार को शिलचर प्रेस क्लब में “सदौ असम प्राथमिक टीईटी उत्तीर्ण शिक्षक समाज” की ओर से कछार, करीमगंज (श्रीभूमि) और हैलाकांदी जिलों के प्रतिनिधियों की संयुक्त पत्रकार वार्ता में राज्य सरकार और शिक्षा विभाग की उदासीनता के विरुद्ध जोरदार तरीके से आवाज उठाई गई।

संस्था के नेताओं ने कहा कि वर्ष 2012 से अब तक नियुक्त टीईटी उत्तीर्ण शिक्षक—जो सभी डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन (D.El.Ed) किए हुए हैं—उन्हें समान कार्य के बावजूद नियमित शिक्षकों के बराबर दर्जा और सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं। उन्होंने इसे घोर अन्याय और संविधान में समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया।

केंद्रीय समिति के प्रवक्ता कौस्तभ चक्रवर्ती ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व शर्मा ने मंच से कई बार कुछ माँगों को स्वीकार किया है, लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारी जानबूझकर उन आदेशों को लागू नहीं कर रहे हैं। उन्होंने “समग्र शिक्षा अभियान, असम” के मिशन निदेशक से एक सप्ताह के भीतर संस्था के साथ औपचारिक वार्ता करने की अपील की। साथ ही चेतावनी दी कि यदि सात दिनों में सकारात्मक पहल नहीं हुई तो शिक्षक समाज आगामी आंदोलनों की ओर बढ़ेगा।

शिक्षक समाज की प्रमुख मांगें:

  • समान कार्य के लिए समान अधिकार लागू किया जाए।
  • चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति।
  • नियमित शिक्षकों के बराबर अवकाश की प्रणाली लागू करना।
  • लंबित अवकाशों की मंजूरी और 2025-26 वित्तीय वर्ष में छुट्टियों की पूर्व स्वीकृति।
  • संशोधित 2010 वेतन संरचना के अनुरूप वेतन निर्धारण।
  • एमएससीपी (MSCP) योजना के तहत लाभ देना।
  • सेवानिवृत्त शिक्षकों के लंबित मामलों का निपटारा और छुट्टी नकदीकरण (Leave Encashment) लागू करना।
  • प्रधान शिक्षक भत्ते का भुगतान।
  • डीए बकाया (2019 से) का भुगतान।
  • ग्रेच्युटी के लिए 5 साल की सेवा को आधार मानना।
  • सैलरी पैकेज योजना शुरू करना।
  • करियर डेवलपमेंट के तहत B.Ed की सुविधा इग्नू और कृष्णकांत हैंडिके ओपन यूनिवर्सिटी से उपलब्ध कराना।
  • बराक घाटी में इग्नू बी.एड. स्टडी सेंटर खोलना।

स्थानीय नेताओं की चिंता:

कछार जिला समिति के अध्यक्ष विवेकानंद देवनाथ ने कहा कि राज्य की शिक्षा प्रणाली को अधिक व्यवस्थित और उत्तरदायी बनाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने चिंता जताई कि नया शैक्षणिक सत्र अप्रैल में शुरू हुआ, लेकिन अभी तक कई छात्रों को किताबें नहीं मिली हैं।

संस्था के महासचिव इक़बाल अहमद लश्कर ने असम प्राइमरी एजुकेशन (प्रांतीयकरण) चौथा संशोधन अधिनियम, 2024 में बदलाव की मांग की, ताकि सभी संविदा शिक्षकों की सेवाएं नियमित हो सकें।

श्रीभूमि से आए प्रतिनिधि मनोज भट्टाचार्य ने मुख्यमंत्री द्वारा संविदा शिक्षकों के लिए घोषित “अपना वाहन योजना”, “अपना घर योजना”, “मुख्यमंत्री लोकसेवा आरोग्य योजना” और “ऋण सुविधा” जैसी योजनाओं के लिए आभार व्यक्त किया।

महिला प्रतिनिधि जयश्री नाथ ने मातृत्व अवकाश और चाइल्ड केयर लीव जैसे महिला-केंद्रित सुविधाओं से वंचित होने पर नाराजगी जताई। अन्य वक्ताओं में सोनाली दे, संजय चौहान, जियाउल हक और शुभ्रज्योति शर्मा आदि ने भी विचार रखे।

नियुक्ति और संघर्ष का इतिहास:

संस्था के अधिकारियों ने बताया कि शिक्षकों की नियुक्ति 2009 के शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत की गई थी। ये नियुक्तियाँ वर्ष 2012, 2013, 2014, 2015, 2017 और 2021 में मेरिट के आधार पर विज्ञापन जारी कर की गईं। बावजूद इसके, इन्हें अब तक मुख्यधारा के शिक्षक के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। सेवानिवृत्त शिक्षकों को भी बहुत कम लाभ मिले हैं।

संस्था ने सरकार से तत्काल मानवीय और कानूनी दृष्टिकोण से कार्रवाई की मांग की है ताकि शिक्षकों का सम्मान और अधिकार बहाल हो सके।

राज्य सरकार को चाहिए कि वह शिक्षकों के इस लंबे संघर्ष और जायज मांगों को गंभीरता से ले। टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों की भूमिका शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है और उन्हें नजरअंदाज करना असम की शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

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