तारीख पे तारीख: आखिर कब मिलेगा आम आदमी को न्याय?

न्याय में देरी, अन्याय के समान है।

‘तारीख पे तारीख’ अब केवल फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की कड़वी हकीकत बन चुका है। न्याय की उम्मीद लेकर अदालत पहुंचने वाला आम आदमी वर्षों तक मुकदमे की सुनवाई का इंतजार करता रहता है। कई बार न्याय की प्रतीक्षा करते-करते उसकी जिंदगी ही समाप्त हो जाती है, लेकिन फैसला नहीं आता। सवाल है—आखिर न्याय कब मिलेगा?

अदालतों में मुकदमों का बढ़ता बोझ, न्यायाधीशों के रिक्त पद, बार-बार स्थगन, पुलिस जांच में देरी और कानूनी प्रक्रिया की जटिलताएं न्याय में विलंब के प्रमुख कारण हैं। इसका सबसे अधिक खामियाजा गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को भुगतना पड़ता है। वकीलों की फीस, आने-जाने का खर्च और वर्षों की मानसिक परेशानी उन्हें आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर कर देती है।

न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए न्यायाधीशों के रिक्त पद शीघ्र भरे जाएं, अनावश्यक तारीखों पर रोक लगे और मामलों की सुनवाई समयबद्ध तरीके से हो। पुलिस जांच और अभियोजन व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए। मध्यस्थता, लोक अदालतों और डिजिटल सुविधाओं का विस्तार किया जाए, ताकि छोटे विवादों का शीघ्र निपटारा हो सके।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जरूरी है। जल्द फैसला देने के दबाव में निष्पक्षता प्रभावित नहीं होनी चाहिए, लेकिन अनावश्यक देरी को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्याय का अर्थ केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि समय पर अधिकार दिलाना है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में न्याय केवल कागजों और संविधान की पुस्तकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार, न्यायपालिका, पुलिस और अभियोजन तंत्र को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे।

अब ‘तारीख पे तारीख’ नहीं, समय पर न्याय चाहिए। क्योंकि न्याय पाने की प्रतीक्षा में यदि इंसान की पूरी जिंदगी गुजर जाए, तो व्यवस्था की सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर आम आदमी को न्याय उसके जीवनकाल में मिलेगा या वह अगली तारीख की प्रतीक्षा करते-करते परलोक सिधार जाएगा?

यह सवाल आज पूरे देश की न्याय व्यवस्था के सामने खड़ा है।

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