डिब्रूगढ़ में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान का देव दुर्लभ श्री गुरु पूर्णिमा महोत्सव आयोजित

गुरु ही जीवन के परम पथप्रदर्शक हैं – साध्वी देवेशी भारती
डिब्रूगढ़, 9 जुलाई 2023, संदीप अग्रवाल
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान – जिसके संस्थापक एवं संचालक परम पूजनीय गुरूदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज जी है – एक सामाजिक एवं आध्यात्मिक संस्था है, जो समाज को जागरूक करने हेतु विविध कार्यो में संलग्न है | संस्थान की डिब्रूगढ़ शाखा द्वारा गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन आज शहर के  ए. टी. रोड, मारवाडी पट्टी स्थित इंडिया क्लब में सुबह 10 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक किया गया  |
गुरुपूर्णिमा पर्व एक शिष्य और उसके गुरु के बीच व्याप्त अथाह प्रेम को परिभाषित करता है | इस पावन कार्यक्रम की शुरुआत गुरुदेव की पावन स्तुति से हुई | बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कार्यक्रम में एकत्रित होकर गुरुदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज  के श्री चरणों में आरती व पूजन अर्पित  किया|  तत्पश्चात मधुर एवं प्रेरणादायी भजनों का गायन हुआ और साध्वी देवेशी भारती ने गुरु महिमा में अपने दिव्य एवं  प्रेरणादायी विचारों को भक्तजनों के समक्ष रखा | उन्होंने कहा की आज सर्वत्र मात्र शब्दों का भ्रम जाल व्याप्त है | कहीं भी कोई परम पथप्रदर्शक दृष्टिगोचर नहीं होते, जो जीवन को कल्याण की ओर कुशलतापूर्वक अग्रसर कर सके | उन्होंने समझाया की एक पूर्ण सतगुरु ही, ऐसी दिव्य विभूति होते हैं जो अपने भक्त का इस जीवन पथ पर मार्ग दर्शन करते हैं, सर्वदा ध्यान रखते है और जन्मों जन्मों उस पर कार्य कर उसे निखारने का प्रयास करते रहते हैं| इस निश्चल प्रेम के कारण सब भक्त अपने गुरुदेव को प्राणों से भी अधिक प्रेम करते हैं और एक शिष्य हमेशा अपने गुरुदेव पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करना चाहता है, परन्तु वह कभी भी अपने आप को पूर्ण एवं सक्षम नहीं पाता | एक शिष्य अपने को गुरु के अथाह प्रेम के सामने बहुत नगण्य सा पाता है, क्योंकि जो समर्पण से गुरु ने उस पर कार्य किया है, उतना ही समर्पण वह अपने गुरु को नहीं दे पाता | स्वामी विवेकानंद भी कहते हैं की अगर मैं दस जन्म भी ले लूँ तो भी अपने ठाकुर के ऋण को नहीं चुका सकता | क्योंकि गुरुदेव सदैव एक शिष्य के अंतःकरण को शुद्ध करने का प्रयास करते है, उसकी आत्मा के उत्थान के लिए प्रयासरत रहते हैं |
स्वामी विवेकानंद जी के जीवन का एक वृतांत के माध्यम ने उन्होंने गुरु की महानता एवं विराटता को समझाया | एक बार विदेश यात्रा के दोरान स्वामी जी के प्रवचनों की बहुत ही सुन्दर चर्चा हो रही थी | लोगों ने उनसे पूछा की आपका प्रेरणा स्रोत क्या है, तब उन्होंने बताया की मेरे प्रेरणा स्रोत मेरे परम गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस हैं | तभी उनमें से किसी ने पूछा की आप फिर अपने गुरु की महिमा को लोगों के समक्ष क्योँ नहीं लाते | उन्होंने भाव विह्वल होते हुए कहा की उन्हें भय लगता है, कहीं अगर मैं अपने गुरु की महिमा लोगों तक पूर्णरूप से नहीं रख पाया तो |  क्योंकि मेरे शब्दों में इतनी गहराई एवं भव्यता नहीं है, जो की उनकी महिमा का वर्णन कर सके | मेरे गुरु अत्यंत श्रेष्ठ हैं और मेरे शब्द बहुत निम्न हैं | जब ऐसे महान गुरु जीवन में आते हैं तो वास्तविकता में एक शिष्य का जीवन कुंदन सा बन जाता है | और परम गुरु जनम जनम तक साथ निभाते है और निरंतर अपने शिष्य को श्रेष्ठता की ओर अग्रसर करते रहते हैं | आज समाज के भटके युवा वर्ग को भी ऐसे ही परम ओजस्वी, तेजस्वी परम पथप्रदर्शक गुरु की आवश्यकता है | ताकि युवा वर्ग अपनी असीम उर्जा को एकलक्षित कर, समाज एवं राष्ट्र कल्याण की ज़िम्मेदारी पूर्ण कर सके |
कबीर जी भी ऐसे गुरु की महिमा में कहते हैं,
” सब धरती कागद करू, लेखनी सब वनराय | “
” सात समुद्र की मसि करू, गुरु गुण लिखा न जाय | “
अर्थात, अगर मैं सब धरती का कागज बना लूँ, सारे वनों की लकड़ी की कलम बना लूँ और सारे समुद्र के जल की स्याही बना लूँ फिर भी मैं गुरु गुण की पूर्णतः व्याख्या करने में अपने को असमर्थ पता हूँ | ऐसी है गुरु की महिमा |
साध्वी देवेशी भारती जी ने अपने प्रवचन में बताया कि गुरु के बिना इस समस्त संसार में कोई भी उस परम कल्याणकारी शाश्वत ब्रह्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता | इसी बात का वर्णन हमारे शास्त्रों में भी किया गया है | भगवान शिव माँ पार्वती को समझाते हुए कहते है –
                    गुकारश्चन्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते |
               अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशय: ||    – गुरु गीता
      जिसमें ‘गु’ शब्द का अर्थ होता है ‘अंधकार’ और ‘रु’ शब्द का अर्थ होता है ‘प्रकाश’. मतलब कि अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करनेवाला जो प्रकाश ब्रह्म है वह प्रकाश हमें गुरु प्रदान कर सकते है इसमें कोई संशय नहीं है | सच में जीवन के इस कठिन पथ पर आगे बढ़ने के लिए एवं संसार के साथ – साथ ईश्वर को प्राप्त करने के लिए एक पूर्णगुरु कि व्यक्ति को नितांत आवश्यकता हमेशां रहती ही है | साध्वी जी ने बताया कि जीवन की दशा सही दिशा के बिना सुधर नहीं सकती | इसीलियें वर्तमान समय में इस दशा को सुधारने के लिए एक पूर्ण, तत्वदर्शी गुरु की आवश्यकता हर किसी को है | साध्वी जी ने शिष्य के गुरु के प्रति श्रद्धा और विश्वास का अनूठा संगम धार्मिक उदाहरणों सहित सभी के समक्ष रखा।
    इस प्रकार साध्वी जी नी अपने प्रवचन के माध्यम से लोगों को जगाने का प्रयास किया और मानवसमाज एवं भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान कितना ऊँचा है यह समझाने का बहुत सुन्दर प्रयास किया | गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी भी एक ऐसी ही विभूति है जिनका चिंतन लगातार मानव को सत्य पथ की ओर ले जाने के लिए होता है |
     उनकी इस प्रकार की भावपूर्ण वाणी सुन भक्तजन भावविभोर हो गए थे और उनकी आंखे भी गुरु कि याद में नम हो गई | इस प्रकार साध्वी जी ने बहुत ही सुन्दर, भावपूर्ण एवं सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए |
सभी भक्तजनों, विशेषकर युवा वर्ग ने  इस गुरु महिमा रूपी ज्ञान गंगा के स्नान कर अपने मन को पवित्र किया और अपने आप को पुनः उर्जावान एवं उत्साहित पाया | कार्यक्रम में महात्मा  बुद्ध के शिष्य के जीवन पर आधारित एक गुरु-भक्ति से परिपूर्ण नाटक का मंचन किया गया। जिसने सभी को गुरु प्रेम के अटूट संबंध की परिभाषा  को उजागर किया। इस कार्यक्रम  में  सुमधुर  भजनों का  गायन साध्वी सुश्री आकांक्षा भारती जी, साध्वी सुश्री ममता भारती जी ने किया |
इस प्रकार से संस्थान के इस आध्यात्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रम का समापन बहुत ही सुन्दर प्रकार से हुआ |

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