डिब्रूगढ़ के डीएचएसके कॉलेज में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी पु. चेंगजापाओ डौंगेल की ९८वीं पुण्यतिथि मनाई गई

डिब्रूगढ़: जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी और वर्ष १९१७ से १९१९ के एंग्लो-कुकी युद्ध के प्रमुख नेताओं में से एक पु. चेंगजापाओ डौंगेल की ९८वीं पुण्यतिथि शुक्रवार को डिब्रूगढ़ स्थित डीएचएसके कॉलेज (स्वायत्त) में श्रद्धापूर्वक मनाई गई।

कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन डीएचएसके कॉलेज के जनजातीय अनुसंधान एवं विकास केंद्र तथा राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा किया गया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले इस अपेक्षाकृत गुमनाम जनजातीय नेता के जीवन, संघर्ष और बलिदान को स्मरण करना था।

कार्यक्रम की शुरुआत राजनीति विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. बिराज दत्ता के स्वागत संबोधन से हुई। इसके बाद दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया गया। इस दौरान पु. चेंगजापाओ डौंगेल तथा एंग्लो-कुकी युद्ध से जुड़े अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण राजनीति विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. लामखोलाल डौंगेल की चित्रयुक्त प्रस्तुति रही। उन्होंने पु. चेंगजापाओ डौंगेल के जीवन, नेतृत्व और योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। ऐतिहासिक तस्वीरों, दस्तावेजों और अन्य सामग्रियों के माध्यम से एंग्लो-कुकी युद्ध तथा इस कम चर्चित जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी के इतिहास को सामने रखा गया।

डॉ. लामखोलाल डौंगेल ने अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘पु. चेंगजापाओ डौंगेल: एन अनसंग हीरो – द लाइफ, स्ट्रगल एंड सैक्रिफाइस ऑफ ए फ्रीडम फाइटर’ का भी परिचय दिया। पुस्तक का औपचारिक विमोचन डीएचएसके कॉलेज के प्राचार्य डॉ. शशि कांता सैकिया सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने किया।

इस अवसर पर डॉ. सैकिया ने पु. चेंगजापाओ डौंगेल को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जनजातीय प्रतिरोध के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बताया। उन्होंने जनजातीय अनुसंधान एवं विकास केंद्र तथा राजनीति विज्ञान विभाग की पहल की सराहना करते हुए विभिन्न समुदायों के इतिहास, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण के महत्व पर जोर दिया।

उप-प्राचार्य डॉ. पार्थ गांगुली ने भी डॉ. डौंगेल को बधाई दी और चेंगजापाओ डौंगेल को एक “गुमनाम नायक” बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के स्मृति कार्यक्रम एंग्लो-कुकी युद्ध और उससे जुड़े नेताओं के इतिहास को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

डिब्रू कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. रंजीत सिंघा ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि चेंगजापाओ डौंगेल और एंग्लो-कुकी युद्ध पर दी गई प्रस्तुति ने उन पर गहरा प्रभाव डाला।

कार्यक्रम में गणमान्य व्यक्तियों को पारंपरिक असमिया फुलाम गामोछा से सम्मानित किया गया। साथ ही, स्मृति-चिह्न के रूप में उन्हें पु. चेंगजापाओ डौंगेल के चित्र भी भेंट किए गए।

कार्यक्रम में जनजातीय अनुसंधान एवं विकास केंद्र की डॉ. निर्मली पेगू, अनंत टेरोन, उर्मिला रामचियारी, हिरामोनी लालुंग और डॉ. नीतुमोनी सैकिया सहित केंद्र के अन्य सदस्य, कॉलेज के शिक्षक, विद्यार्थी और मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का समापन शिवनाथ चुटिया के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस अवसर ने पूर्वोत्तर भारत के कम चर्चित स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को संरक्षित करने तथा उनके इतिहास के निरंतर शोध और दस्तावेजीकरण की आवश्यकता को रेखांकित किया।

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