ज़हर की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी -राजेंद्र सिंह जादौन 

ज़हर की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी

 -राजेंद्र सिंह जादौन 

ज़हर की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी,

पत्रकारिता से मोहब्बत तो करके देखो…

हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरोगे,

सच लिखने की हिम्मत तो करके देखो…

स्याही में दर्द घोलना पड़ेगा,

हर लफ़्ज़ से सवाल उठाना पड़ेगा,

यहाँ कलम उठाना आसान नहीं,

खुद से पहले ज़माने से लड़ना पड़ेगा…

दोस्ती खूब की ख़बरों से,

हर सुर्ख़ी को अपना समझा,

दिन-रात भागे उन सड़कों पर,

जहाँ सच अक्सर अकेला दिखा…

पर प्यासा ही रहा मैं,

इन ख़बरों के समंदरों में भी,

हर लहर में शोर बहुत था,

पर सच्चाई कम थी उनमें ही…

कभी भूख को हेडलाइन बनाया,

कभी आँसुओं को खबर में ढाला,

पर जिनके लिए लिखा सब कुछ,

उन्होंने ही सच को ठुकरा डाला…

यहाँ सच बिकता है अक्सर,

और झूठ सजता है बाज़ारों में,

ईमान की कीमत लगती है,

अख़बारों के इश्तहारों में…

तालियाँ कम, तंज़ ज़्यादा मिलते हैं,

नाम से पहले इल्ज़ाम मिलते हैं,

जो सच के साथ खड़ा रहे,

उसे अक्सर बदनाम मिलते हैं…

कभी सत्ता से टकराना पड़ता है,

कभी अपनों से भी हारना पड़ता है,

ये पेशा नहीं एक जंग है,

जिसमें हर दिन मरना पड़ता है…

फिर भी कलम नहीं रुकती,

ना ही ये जुनून थमता है,

क्योंकि कहीं न कहीं अंदर,

एक सच अब भी ज़िंदा रहता है…

ज़हर की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी,

पत्रकारिता से मोहब्बत तो करके देखो…

ज़िंदगी से लड़ते-लड़ते,

खुद से भी सवाल करना सीख जाओगे…

@फेसबुक से साभार

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