जर्जर तटबंधों के भरोसे बाढ़ से जूझता असम!

4,800 किमी तटबंधों में 3,000 किमी मरम्मत की राह देखते रहे; 423 में करीब 250 संवेदनशील, 16 वर्षों में बाढ़-भूस्खलन ने ली 1,271 जानें

हर साल करोड़ों लोग प्रभावित, फिर भी असम की विनाशकारी बाढ़ को नहीं मिला राष्ट्रीय आपदा का दर्जा

 अनुसंधानपरक प्रतिवेदन

बैधनाथ साहनी , नगांव 

नगांव 8 अगस्त: असम की पहचान जितनी उसकी नदियों, हरियाली और प्राकृतिक संपदा से है, उतनी ही उसकी पहचान हर वर्ष आने वाली विनाशकारी बाढ़ से भी जुड़ गई है। मानसून आते ही राज्य के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ और नदी कटाव का संकट गहराने लगता है। खेत डूबते हैं, सड़कें टूटती हैं, घर उजड़ते हैं और हजारों परिवार राहत शिविरों में पहुंचने को मजबूर हो जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर हर वर्ष दोहराई जाने वाली इस त्रासदी से असम को स्थायी राहत क्यों नहीं मिल पा रही?

उपरी असम के शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट जिलों में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने केवल इन जिलों की अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि इसके व्यापक असर ने पूरे राज्य की आर्थिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। इस महाप्रलय के कारणों को लेकर प्राकृतिक परिस्थितियों के साथ-साथ मानवजनित कारकों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अब बाढ़ का संकट उपरी असम तक सीमित नहीं रहा है। उत्तर और मध्य असम के कई इलाकों में भी बाढ़ की स्थिति भयावह होती जा रही है।

4,800 किमी तटबंध, लेकिन 3,000 किमी को मरम्मत की दरकार

असम में बाढ़ से बचाव के लिए हजारों किलोमीटर लंबे तटबंध बनाए गए हैं, लेकिन इनकी मौजूदा स्थिति चिंता पैदा करती है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल करीब 4,800 किलोमीटर तटबंध हैं, जिनमें लगभग 3,000 किलोमीटर तटबंधों को मरम्मत अथवा पुनर्निर्माण की आवश्यकता है।

विधानसभा में भाजपा विधायक भूपेन राय के एक सवाल के लिखित जवाब में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री सुशांत बरगोहाईं द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, राज्य के कुल तटबंधों का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अपनी प्रभावी वहन क्षमता और बाढ़ रोकने की क्षमता खो चुका है। यानी करीब 1,800 किलोमीटर तटबंध ही फिलहाल बाढ़ के प्रभावी मुकाबले की स्थिति में बताए गए हैं।

मंत्री द्वारा विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, लगभग 1,000 किलोमीटर तटबंधों को तटबंध-सह-सड़क (Embankment-cum-Road) के रूप में विकसित करने के लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) को हस्तांतरित किया गया है।

423 तटबंधों में करीब 250 कमजोर

जल संसाधन विभाग के आंकड़े तस्वीर को और गंभीर बनाते हैं। राज्य में कुल 423 तटबंधों में से करीब 250 तटबंध अपनी मजबूती खो चुके हैं और संवेदनशील स्थिति में हैं।

निचले असम में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। बरपेटा जल संसाधन मंडल के 20 से अधिक तटबंधों को संवेदनशील के रूप में चिन्हित किया गया है। इसके अलावा गुवाहाटी पूर्व, मंगलदै, गुवाहाटी पश्चिम, जोरहाट, तेजपुर, नगांव, नलबाड़ी, कोकराझार, धेमाजी, सिलचर और माजुली जल संसाधन मंडलों के अंतर्गत आने वाले आधे से अधिक तटबंध अपनी निर्धारित आयु पूरी कर चुके हैं।

यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राज्य के कई तटबंधों का निर्माण दशकों पहले हुआ था। सामान्यतः तटबंध की निर्धारित आयु करीब 25 वर्ष मानी जाती है। ऐसे में दशकों पुराने तटबंधों पर हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ का दबाव कितना जोखिमपूर्ण है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

1942 से बने तटबंध आज भी बाढ़ के खिलाफ ढाल!

शिवसागर जल संसाधन प्रमंडल के अंतर्गत करीब 40 तटबंधों का निर्माण 1942 से 1991 के बीच किया गया था। वहीं डिब्रूगढ़ जिले में भी करीब 30 तटबंध अपनी निर्धारित आयु पूरी कर चुके हैं।

सवाल यह है कि जिन तटबंधों ने अपनी निर्धारित आयु पूरी कर ली है, वे आज की अत्यधिक वर्षा, नदियों के बढ़ते जलस्तर और तेज धारा का सामना कितनी मजबूती से कर सकते हैं? यदि इनका समय पर पुनर्निर्माण या वैज्ञानिक तरीके से सुदृढ़ीकरण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में बाढ़ का खतरा और गंभीर हो सकता है।

बाढ़ नियंत्रण का विशाल ढांचा, फिर भी संकट बरकरार

असम में बाढ़ एवं नदी कटाव से सुरक्षा के लिए कुल 423 तटबंध, 1,019 शहरी सुरक्षा एवं कटावरोधी परियोजनाएं, 101 बड़े स्लुइस गेट, 545 छोटे स्लुइस गेट तथा 897.61 किलोमीटर लंबी ड्रेनेज व्यवस्था का निर्माण किया गया है।

इसके बावजूद हर साल लाखों लोगों का बाढ़ से प्रभावित होना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या मौजूदा बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था को नए सिरे से देखने की आवश्यकता नहीं है?

15 वर्षों में 5.45 करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित

असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की वर्ष 2024 में तैयार रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2024 तक 15 वर्षों में 545.44 लाख यानी 5.45 करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए।वर्षवार आंकड़े इस प्रकार हैं—

वर्ष

बाढ़ प्रभावित

2010-25.38 लाख,2011-9.12 लाख,

2012-29.14 लाख,2013-8.48 लाख

2014-42.04 लाख,2015-36.67 लाख

2016-39.89 लाख,2017-56.02 लाख

2018-13.22 लाख,2019-73.55 लाख

2020-57.89 लाख,2021-9.10 लाख

2022-88.51 लाख,2023-13.47 लाख

2024-42.96 लाख

इसी अवधि में 405 जिले बाढ़ की चपेट में आए। वर्ष 2022 में सर्वाधिक 35 जिले प्रभावित हुए, जबकि 2024 में भी 35 जिले बाढ़ से प्रभावित रहे।

16 वर्षों में बाढ़-भूस्खलन ने ली 1,271 जानें

वर्ष 2010 से 2025 तक 16 वर्षों में बाढ़ और भूस्खलन के कारण 1,271 लोगों की मौत होने के आंकड़े सामने आते हैं।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार—

2010 में बाढ़ से 17 मौतें,2011 में 11मौते,

2012 में 149 मौतें ,2014 में 90 मौतें ,

2015 में 66 मौतें ,2016 में बाढ़ से 64 और भूस्खलन से 17 मौतें,2017 में बाढ़ से 160 और भूस्खलन से 2 मौतें,2018 में बाढ़ से 45 और भूस्खलन से 8 मौतें,2019 में बाढ़ से 102 और भूस्खलन से 1 मौत,2020 में बाढ़ से 122 और भूस्खलन से 26 मौतें,2021 में बाढ़ से 24 और भूस्खलन से 2 मौतें,2022 में बाढ़ से 181 और भूस्खलन से 19 मौतें,2023 में बाढ़ से 18 और भूस्खलन से 1 मौत,2024 में बाढ़ से 110 और भूस्खलन से 11 मौतें,वर्ष 2025 में भी बाढ़ से 25 लोगों के प्रभावित होने की जानकारी राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों में दर्ज है।

2026 की बाढ़: करीब 97 मौतों का आंकड़ा, पुष्टि बाकी

वर्ष 2026 में उपरी असम में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर राज्य की बाढ़ प्रबंधन व्यवस्था की गंभीरता को उजागर किया है। सरकारी स्तर पर करीब 97 लोगों की मौत का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि, इस आंकड़े की अंतिम पुष्टि अभी नहीं हुई है और मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

यदि यह आंकड़ा अंतिम रूप से पुष्ट होता है, तो यह एक बार फिर साबित करेगा कि असम के लिए बाढ़ केवल मौसमी प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि लगातार बढ़ता हुआ मानवीय और आर्थिक संकट है।

राष्ट्रीय आपदा का दर्जा अब भी दूर

असम में दशकों से बाढ़ का कहर जारी है। हर साल जन-धन की भारी क्षति होती है, कृषि और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचता है तथा लाखों लोग प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद राज्य की बाढ़ की समस्या को अब तक राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं मिला है।

यही वजह है कि असमवासियों के बीच यह सवाल लगातार उठता रहा है कि आखिर कितनी बड़ी तबाही के बाद इस समस्या को राष्ट्रीय स्तर की आपदा माना जाएगा?

प्राकृतिक आपदा या मानवजनित संकट?

असम की बाढ़ के पीछे भारी वर्षा, नदियों का उफान, भौगोलिक स्थिति और जलवायु संबंधी परिस्थितियां निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कारक हैं। लेकिन इसके साथ ही कमजोर तटबंध, नदी तल में गाद जमाव, जल निकासी की समस्या, अनियोजित निर्माण, वन क्षेत्र में बदलाव तथा नदी एवं जलधाराओं के प्राकृतिक प्रवाह में मानवीय हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

विशेषकर जब राज्य के हजारों किलोमीटर तटबंध मरम्मत की प्रतीक्षा कर रहे हों और सैकड़ों तटबंध अपनी निर्धारित आयु पार कर चुके हों, तब केवल प्राकृतिक कारणों को बाढ़ की पूरी वजह मान लेना पर्याप्त नहीं होगा।

राहत नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत

हर वर्ष बाढ़ आने के बाद राहत शिविर खोलना, खाद्य सामग्री वितरित करना और बचाव अभियान चलाना जरूरी है, लेकिन इससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। असम को अब दीर्घकालीन और वैज्ञानिक बाढ़ प्रबंधन नीति की आवश्यकता है।

इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर तटबंधों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, जर्जर तटबंधों का चरणबद्ध पुनर्निर्माण, नदी कटाव नियंत्रण, जल निकासी व्यवस्था का आधुनिकीकरण, स्लुइस गेटों का पुनर्गठन और नदियों के समग्र प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

साथ ही, बाढ़ के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान का नियमित आकलन कर दीर्घकालीन वित्तीय व्यवस्था विकसित करनी होगी। केवल बाढ़ के समय धन उपलब्ध कराने के बजाय बाढ़ से पहले रोकथाम और जोखिम कम करने पर अधिक निवेश करना समय की मांग है।

निष्कर्ष: हर साल बाढ़ आएगी, लेकिन हर साल तबाही क्यों?

असम की बाढ़ अब कोई अप्रत्याशित घटना नहीं रह गई है। यह राज्य के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय जीवन का स्थायी संकट बन चुकी है। जब 4,800 किलोमीटर के तटबंधों में करीब 3,000 किलोमीटर मरम्मत की मांग कर रहे हों, 423 में से करीब 250 तटबंध कमजोर बताए जा रहे हों और 15 वर्षों में 5.45 करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हो चुके हों, तब समस्या की गंभीरता पर किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती।

अब असम के सामने असली सवाल यह नहीं है कि अगली बाढ़ कब आएगी, बल्कि यह है कि अगली बाढ़ आने से पहले सरकारें कितनी तैयारी पूरी कर पाएंगी।

असम को हर साल राहत की कतार में खड़ा करने के बजाय ऐसी स्थायी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें तटबंध मजबूत हों, नदियों का वैज्ञानिक प्रबंधन हो, जल निकासी प्रभावी हो और बाढ़ से होने वाली जन-धन की क्षति न्यूनतम हो। इसके लिए केंद्र-राज्य समन्वय, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और दीर्घकालीन राजनीतिक इच्छाशक्ति—तीनों का एक साथ होना अनिवार्य है।

4,800 किमी तटबंधों में 3,000 किमी मरम्मत की राह देखते रहे; 423 में करीब 250 संवेदनशील, 16 वर्षों में बाढ़-भूस्खलन ने ली 1,271 जानें

हर साल करोड़ों लोग प्रभावित, फिर भी असम की विनाशकारी बाढ़ को नहीं मिला राष्ट्रीय आपदा का दर्जा

 अनुसंधानपरक प्रतिवेदन

बैधनाथ साहनी , नगांव 

नगांव 8 अगस्त: असम की पहचान जितनी उसकी नदियों, हरियाली और प्राकृतिक संपदा से है, उतनी ही उसकी पहचान हर वर्ष आने वाली विनाशकारी बाढ़ से भी जुड़ गई है। मानसून आते ही राज्य के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ और नदी कटाव का संकट गहराने लगता है। खेत डूबते हैं, सड़कें टूटती हैं, घर उजड़ते हैं और हजारों परिवार राहत शिविरों में पहुंचने को मजबूर हो जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर हर वर्ष दोहराई जाने वाली इस त्रासदी से असम को स्थायी राहत क्यों नहीं मिल पा रही?

उपरी असम के शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट जिलों में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने केवल इन जिलों की अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि इसके व्यापक असर ने पूरे राज्य की आर्थिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। इस महाप्रलय के कारणों को लेकर प्राकृतिक परिस्थितियों के साथ-साथ मानवजनित कारकों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अब बाढ़ का संकट उपरी असम तक सीमित नहीं रहा है। उत्तर और मध्य असम के कई इलाकों में भी बाढ़ की स्थिति भयावह होती जा रही है।

4,800 किमी तटबंध, लेकिन 3,000 किमी को मरम्मत की दरकार

असम में बाढ़ से बचाव के लिए हजारों किलोमीटर लंबे तटबंध बनाए गए हैं, लेकिन इनकी मौजूदा स्थिति चिंता पैदा करती है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल करीब 4,800 किलोमीटर तटबंध हैं, जिनमें लगभग 3,000 किलोमीटर तटबंधों को मरम्मत अथवा पुनर्निर्माण की आवश्यकता है।

विधानसभा में भाजपा विधायक भूपेन राय के एक सवाल के लिखित जवाब में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री सुशांत बरगोहाईं द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, राज्य के कुल तटबंधों का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अपनी प्रभावी वहन क्षमता और बाढ़ रोकने की क्षमता खो चुका है। यानी करीब 1,800 किलोमीटर तटबंध ही फिलहाल बाढ़ के प्रभावी मुकाबले की स्थिति में बताए गए हैं।

मंत्री द्वारा विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, लगभग 1,000 किलोमीटर तटबंधों को तटबंध-सह-सड़क (Embankment-cum-Road) के रूप में विकसित करने के लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) को हस्तांतरित किया गया है।

423 तटबंधों में करीब 250 कमजोर

जल संसाधन विभाग के आंकड़े तस्वीर को और गंभीर बनाते हैं। राज्य में कुल 423 तटबंधों में से करीब 250 तटबंध अपनी मजबूती खो चुके हैं और संवेदनशील स्थिति में हैं।

निचले असम में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। बरपेटा जल संसाधन मंडल के 20 से अधिक तटबंधों को संवेदनशील के रूप में चिन्हित किया गया है। इसके अलावा गुवाहाटी पूर्व, मंगलदै, गुवाहाटी पश्चिम, जोरहाट, तेजपुर, नगांव, नलबाड़ी, कोकराझार, धेमाजी, सिलचर और माजुली जल संसाधन मंडलों के अंतर्गत आने वाले आधे से अधिक तटबंध अपनी निर्धारित आयु पूरी कर चुके हैं।

यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राज्य के कई तटबंधों का निर्माण दशकों पहले हुआ था। सामान्यतः तटबंध की निर्धारित आयु करीब 25 वर्ष मानी जाती है। ऐसे में दशकों पुराने तटबंधों पर हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ का दबाव कितना जोखिमपूर्ण है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

1942 से बने तटबंध आज भी बाढ़ के खिलाफ ढाल!

शिवसागर जल संसाधन प्रमंडल के अंतर्गत करीब 40 तटबंधों का निर्माण 1942 से 1991 के बीच किया गया था। वहीं डिब्रूगढ़ जिले में भी करीब 30 तटबंध अपनी निर्धारित आयु पूरी कर चुके हैं।

सवाल यह है कि जिन तटबंधों ने अपनी निर्धारित आयु पूरी कर ली है, वे आज की अत्यधिक वर्षा, नदियों के बढ़ते जलस्तर और तेज धारा का सामना कितनी मजबूती से कर सकते हैं? यदि इनका समय पर पुनर्निर्माण या वैज्ञानिक तरीके से सुदृढ़ीकरण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में बाढ़ का खतरा और गंभीर हो सकता है।

बाढ़ नियंत्रण का विशाल ढांचा, फिर भी संकट बरकरार

असम में बाढ़ एवं नदी कटाव से सुरक्षा के लिए कुल 423 तटबंध, 1,019 शहरी सुरक्षा एवं कटावरोधी परियोजनाएं, 101 बड़े स्लुइस गेट, 545 छोटे स्लुइस गेट तथा 897.61 किलोमीटर लंबी ड्रेनेज व्यवस्था का निर्माण किया गया है।

इसके बावजूद हर साल लाखों लोगों का बाढ़ से प्रभावित होना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या मौजूदा बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था को नए सिरे से देखने की आवश्यकता नहीं है?

15 वर्षों में 5.45 करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित

असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की वर्ष 2024 में तैयार रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2024 तक 15 वर्षों में 545.44 लाख यानी 5.45 करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए।वर्षवार आंकड़े इस प्रकार हैं—

वर्ष

बाढ़ प्रभावित

2010-25.38 लाख,2011-9.12 लाख,

2012-29.14 लाख,2013-8.48 लाख

2014-42.04 लाख,2015-36.67 लाख

2016-39.89 लाख,2017-56.02 लाख

2018-13.22 लाख,2019-73.55 लाख

2020-57.89 लाख,2021-9.10 लाख

2022-88.51 लाख,2023-13.47 लाख

2024-42.96 लाख

इसी अवधि में 405 जिले बाढ़ की चपेट में आए। वर्ष 2022 में सर्वाधिक 35 जिले प्रभावित हुए, जबकि 2024 में भी 35 जिले बाढ़ से प्रभावित रहे।

16 वर्षों में बाढ़-भूस्खलन ने ली 1,271 जानें

वर्ष 2010 से 2025 तक 16 वर्षों में बाढ़ और भूस्खलन के कारण 1,271 लोगों की मौत होने के आंकड़े सामने आते हैं।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार—

2010 में बाढ़ से 17 मौतें,2011 में 11मौते,

2012 में 149 मौतें ,2014 में 90 मौतें ,

2015 में 66 मौतें ,2016 में बाढ़ से 64 और भूस्खलन से 17 मौतें,2017 में बाढ़ से 160 और भूस्खलन से 2 मौतें,2018 में बाढ़ से 45 और भूस्खलन से 8 मौतें,2019 में बाढ़ से 102 और भूस्खलन से 1 मौत,2020 में बाढ़ से 122 और भूस्खलन से 26 मौतें,2021 में बाढ़ से 24 और भूस्खलन से 2 मौतें,2022 में बाढ़ से 181 और भूस्खलन से 19 मौतें,2023 में बाढ़ से 18 और भूस्खलन से 1 मौत,2024 में बाढ़ से 110 और भूस्खलन से 11 मौतें,वर्ष 2025 में भी बाढ़ से 25 लोगों के प्रभावित होने की जानकारी राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों में दर्ज है।

2026 की बाढ़: करीब 97 मौतों का आंकड़ा, पुष्टि बाकी

वर्ष 2026 में उपरी असम में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर राज्य की बाढ़ प्रबंधन व्यवस्था की गंभीरता को उजागर किया है। सरकारी स्तर पर करीब 97 लोगों की मौत का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि, इस आंकड़े की अंतिम पुष्टि अभी नहीं हुई है और मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

यदि यह आंकड़ा अंतिम रूप से पुष्ट होता है, तो यह एक बार फिर साबित करेगा कि असम के लिए बाढ़ केवल मौसमी प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि लगातार बढ़ता हुआ मानवीय और आर्थिक संकट है।

राष्ट्रीय आपदा का दर्जा अब भी दूर

असम में दशकों से बाढ़ का कहर जारी है। हर साल जन-धन की भारी क्षति होती है, कृषि और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचता है तथा लाखों लोग प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद राज्य की बाढ़ की समस्या को अब तक राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं मिला है।

यही वजह है कि असमवासियों के बीच यह सवाल लगातार उठता रहा है कि आखिर कितनी बड़ी तबाही के बाद इस समस्या को राष्ट्रीय स्तर की आपदा माना जाएगा?

प्राकृतिक आपदा या मानवजनित संकट?

असम की बाढ़ के पीछे भारी वर्षा, नदियों का उफान, भौगोलिक स्थिति और जलवायु संबंधी परिस्थितियां निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कारक हैं। लेकिन इसके साथ ही कमजोर तटबंध, नदी तल में गाद जमाव, जल निकासी की समस्या, अनियोजित निर्माण, वन क्षेत्र में बदलाव तथा नदी एवं जलधाराओं के प्राकृतिक प्रवाह में मानवीय हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

विशेषकर जब राज्य के हजारों किलोमीटर तटबंध मरम्मत की प्रतीक्षा कर रहे हों और सैकड़ों तटबंध अपनी निर्धारित आयु पार कर चुके हों, तब केवल प्राकृतिक कारणों को बाढ़ की पूरी वजह मान लेना पर्याप्त नहीं होगा।

राहत नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत

हर वर्ष बाढ़ आने के बाद राहत शिविर खोलना, खाद्य सामग्री वितरित करना और बचाव अभियान चलाना जरूरी है, लेकिन इससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। असम को अब दीर्घकालीन और वैज्ञानिक बाढ़ प्रबंधन नीति की आवश्यकता है।

इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर तटबंधों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, जर्जर तटबंधों का चरणबद्ध पुनर्निर्माण, नदी कटाव नियंत्रण, जल निकासी व्यवस्था का आधुनिकीकरण, स्लुइस गेटों का पुनर्गठन और नदियों के समग्र प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

साथ ही, बाढ़ के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान का नियमित आकलन कर दीर्घकालीन वित्तीय व्यवस्था विकसित करनी होगी। केवल बाढ़ के समय धन उपलब्ध कराने के बजाय बाढ़ से पहले रोकथाम और जोखिम कम करने पर अधिक निवेश करना समय की मांग है।

निष्कर्ष: हर साल बाढ़ आएगी, लेकिन हर साल तबाही क्यों?

असम की बाढ़ अब कोई अप्रत्याशित घटना नहीं रह गई है। यह राज्य के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय जीवन का स्थायी संकट बन चुकी है। जब 4,800 किलोमीटर के तटबंधों में करीब 3,000 किलोमीटर मरम्मत की मांग कर रहे हों, 423 में से करीब 250 तटबंध कमजोर बताए जा रहे हों और 15 वर्षों में 5.45 करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हो चुके हों, तब समस्या की गंभीरता पर किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती।

अब असम के सामने असली सवाल यह नहीं है कि अगली बाढ़ कब आएगी, बल्कि यह है कि अगली बाढ़ आने से पहले सरकारें कितनी तैयारी पूरी कर पाएंगी।

असम को हर साल राहत की कतार में खड़ा करने के बजाय ऐसी स्थायी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें तटबंध मजबूत हों, नदियों का वैज्ञानिक प्रबंधन हो, जल निकासी प्रभावी हो और बाढ़ से होने वाली जन-धन की क्षति न्यूनतम हो। इसके लिए केंद्र-राज्य समन्वय, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और दीर्घकालीन राजनीतिक इच्छाशक्ति—तीनों का एक साथ होना अनिवार्य है।

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