चुनाव परिणाम और भाजपा का अंतर्द्वंद्व 

– पवन सिंह 

विधान परिषद चुनाव परिणाम घोषित हो गये। इसको लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी गरम हो गयीं हैं। सबसे प्रमुख मोहरा है भाजपा और उसके सामने हैं अन्‍य सभी दल। चुनाव परिणाम घोषित हो गये, लेकिन कौन हारा इसी पर तर्क-वितर्क चल रहा है। कारण उत्‍तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव मे कुछ माह ही शेष हैं और इस परिणाम का प्रभाव आगामी चुनावों में किसी के लिए प्रतिकूल न हो इसलिए सभी विजेता के रूप में अपने-अपने तर्क प्रस्‍तुत कर रहे हैं। 

उत्‍तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्‍य में बात करें तो चुनाव परिणाम भाजपा और सपा दोनों के लिए आंकड़ों के हिसाब से बहुत महत्‍वपूर्ण नहीं हैं, लेकिन मैं इसे भाजपा की प‍राजय के रूप में देखता हूं। इसके बावजूद सपा विजेता नहीं है, बल्कि भाजपा हारी है और उसे हराने वाली भी भाजपा है। भाजपा के प्रति मतदाताओं की निराशा आज अचानक नहीं प्रकट हुई है, बल्कि इसका सिलसिला 2022 या यूं कहें उसके एक वर्ष पूर्व हुए वाराणसी स्‍नातक विधान परिषद चुनाव से हो गया था, जब भाजपा ने अपनी तीन बार से लगातार जीत रही वाराणसी स्‍नातक निर्वाचन सीट सपा को सौंप दी। उसके बाद 2022 में प्रदेश में भाजपा की सीटें घटीं। 2024 लोकसभा चुनाव में तो प्रदेश में सपा भाजपा से आगे निकल गयी। भाजपा काशी को अपनी राजनीति, विकास और संस्‍कृति के माडल के रूप में प्रस्‍तुत करती है, जहां का नेतृत्‍व खुद प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी करते हैं। विगत लोकसभा चुनाव में उनकी जीत को लज्‍जाजनक कहना ही उचित है। इसके बावजूद सत्‍ता प्राप्ति से आत्‍ममुग्‍ध पार्टी ने इसके मूल कारणों को समझने का प्रयास नहीं किया, जिसके चलते यह पराभव का सिलसिला कहां ले जायेगा यह कहना मुश्किल है। हालात ऐसे हैं कि इस पराभव के पहिए को अचानक रोकना भी मुश्किल लग रहा है।

इसे समझने के लिए 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव के समय के हालात को समझना होगा। लोकतंत्र के स्‍वभाव के अनुसार लंबे समय से एक ही दल के शासन से जनता का मन भर गया था। मुख्‍य विपक्षी दल के नाते भाजपा ने भी अच्‍छा माहौल बना दिया था। वह दौर राजनीति ही नहीं बल्कि मीडिया, बाजार, संस्‍कृति के स्‍वरूप में परिवर्तन का दौर था। कारण इसका सहज था, देश स्‍तर पर नहीं बल्कि वैश्विक। राजनीति धोती से पैजामा होते हुए जींस पैंट तक पहुंच रही थी। स्‍वाभाविक रूप से बदलाव के दौर में जो खुद नहीं बदल पाते वे कतार से बाहर हो जाते हैं। भाजपा के साथ भी ऐसा ही था। यहां तक कि भाजपा के शिखर पुरुष आडवानी जी ही कतार से बाहर हो गये। लेकिन धरातल तो वही था जिसे भाजपा कैडर ने अपने खून-पसीने से सींचा था। बदलाव की बयार एक साथ सभी जगह नहीं पहुंचती है, बल्कि एक स्‍थान से होते हुए दूसरे स्‍थान तक जाती है, जिसमें समय लगता है। गुजरात में यह पहले पहुंच चुकी थी। इसलिए परिवर्तन के बयार की बारीकियों से वाकिफ गुजरात के लोगों ने देश के विभिन्‍न भागों में पहले ही पहुंचकर जब तक लोग समझते तब तक कतार में आगे अपना जगह बना लिया। स्‍वभाविक रूप से बदलाव के दौर में पहले से बदले लोगों को देश के विभिन्‍न भागों खासकर उत्‍तर प्रदेश में स्‍थानीय भाजपाइयों ने अपना मसीहा मान लिया। भाजपा कैडर के खून-पसीने से सींची गयी उत्‍तर प्रदेश की भू‍मि में 2014 और 2017 के चुनाव में गुजराती बोगस बीज डाला गया, लेकिन भूमि की अत्‍यधिक उर्वरता के कारण वह फसल अच्‍छी हुई। केन्‍द्र के साथ-साथ उत्‍तर प्रदेश में भी बंपर बहुमत के साथ सरकार बन गयी। जिसके श्रेय के रूप में किसी को अवतारी पुरुष तो किसी को चाणक्‍य तक की उपाधि मिली। जबकि असलियत इससे भिन्‍न थी। सफलता का राज भाजपा कैडरों द्वारा अपने त्‍याग-तपस्‍या से बनायी गयी राजनीतिक जमीन थी, जो राजनैतिक मौसम की अनुकूलता के चलते फसल लहलहा उठी। लेकिन बोगस गुजराती बीज ने भाजपा की राजनीतिक जमीन को बंजर बनाना शुरू कर दिया, जो अब स्‍पष्‍ट दिखायी दे रहा है।

चुनावी सफलता और सत्‍ता के अहंकार के चलते पार्टी के नीति नियंता पार्टी के विचार, व्‍यवहार, सिद्धांत और कार्यसंस्‍कृति को भूल मनमानी करने लगे। पार्टी का मूल सिद्धांत सिर्फ सत्‍ता ही रह गया। समाज के निकृष्‍टतम लोगों की सरकार के साथ संगठन में भागीदारी होने लगी। एक समय तो सत्‍ता की मलाई खाने भाजपा में पहुंचे दारा सिंह चौहान को पार्टी के पिछड़ा वर्ग मोर्चा और विनोद सोनकर को अनुसूचित जाति मोर्चा का राष्‍ट्रीय राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष तक बना दिया। भाजपा के संगठनात्‍मक और सरकार के विकास के माडल प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में तो परंपरागत भाजपा के साथ विचार और व्‍यवहार के भाजपाइयों को कूड़ेदान में फेंक दिया गया। दूसरे दल से आये दयाशंकर मिश्र दयालु बिना चुनाव लड़े मंत्री फिर विधान परिषद के माध्‍यम से सदन में भेज दिये गये। दयालु तो शहर के परिचित चेहरे और कुछ जनाधार वाले थे, लेकिन आश्‍चर्यजनक रूप से भाजपा के सत्‍ता में आने के बाद कथित रूप से किसी गुजराती माध्‍यम से शामिल हुए धर्मेन्‍द्र सिंह एमएलसी और अशोक तिवारी शहर के मेयर बना दिये गये। जिनकी पहचान ही शहर में भाजपा द्वारा पद दिये जाने के बाद हुई। पार्टी के कैडर में इसको लेकर कुंठा और आक्रोश दोनों पनपा, लेकिन विकास के शोर में किसी को दिखायी नहीं दिया। वाराणसी में विकास निश्चित रूप से हुआ, लेकिन वह अब भ्रष्‍टाचार के शोर में बदल रहा है। हर जगह पैसे की किस प्रकार बर्बादी हो रही है, यह खुलेआम चर्चा का विषय है। गंगा पार बालू खोद समानांतर नहर बनाने का काम शुरू हुआ, उसे गांव का एक मूर्ख भी जानता था कि बाढ़ आने पर समतल हो जायेगा, लेकिन आईआईटी पास अभियंताओं और सरकार के योजनाकारों को यह बात समझ में नहीं आयी। हुआ वही बाढ़ में करोड़ों स्‍वाहा हो गये। चर्चा तो यह भी है कि काम कराने वाली गुजराती कंपनी ने सरकारी धन के साथ ही खोदे गये बालू को बेच सैकड़ों करोड़ अवैध धन कमाया। काशी में चहुंओर हो रहे विकास कार्य से भी एक बड़ा वर्ग असंतुष्‍ट है। उसका मानना है कि धार्मिक केन्‍द्र को पर्यटन का केन्‍द्र बना दिया गया है। धीरे-धीरे इन राजनीति को व्‍यवसाय मानने वाले आयातित लोगों का प्रभाव पार्टी और सरकार में बढ़ा तो नीतियां भी पार्टी के मूल आधार और चरित्र के विरुद्ध बनने लगीं। एसएसी-एसटी एक्‍ट में संशोधन, विश्‍वविद्यालयों में रोस्‍टर, यूजीसी गाइडलााइन, राजभवन के भ्रष्‍टाचार ने कोढ़ में खाज का काम किया। इससे निराश होकर चुप बैठा वोटर अब मुखर होकर प्रतिरोध का स्‍वर निकालने लगा है। इससे सामाजिक ताना-बाना भी टूटता दिख रहा है। जिस काशी में पूरे देश के विभिन्‍न प्रांतों के लोगों के अलग-अलग मुहल्‍ले हैं, जिससे मिलकर बन‍ारसियत का अल्‍हण आह्नाद होता है। वहां गुजरातियों के प्रति वैमनष्‍य का भाव तेजी से पनप रहा है। प्रदेश सरकार के मुखिया योगी आदित्‍यनाथ हैं, लेकिन जनभावना ऐसी व्‍याप्‍त है कि वे ऐसे मुख्‍यमंत्री हैं, जिसका हाथ-पांव बांध नदी पार करने के लिए छोड़ दिया गया है। लोगों का मानना यही है कि सब कुछ कंट्रोल गुजरात से हो रहा है। जो भी असलियत हो लेकिन बेलगाम अफसरशाही और भयंकर भ्रष्‍टाचार से आम जनता भी दुखी है। ऐसे में जनसंघ से भाजपा के रूप में परिवर्तित पार्टी की दिशा व दशा क्‍या होगी यह गंभीर सवाल है?

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