धर्म, लोकआस्था और आजादी के आन्दोलन की स्मृतियां को अपने भीतर समेटे एक शताब्दी पुराना मंदिर आज संरक्षण की बाट जोह रहा।

मनोज मोहंती — रामकृष्णनगर
असम के श्रीभूमि जिले के दुल्लभछड़ा में सिंगला नदी के किनारे खड़ा श्रीश्री राम-जानकी मंदिर आज केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, चाय-श्रमिक समाज के जीवन और भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक अनमोल विरासत है। एक शताब्दी से अधिक समय से इतिहास के उतार-चढ़ाव का साक्षी यह प्राचीन देवालय आज भले ही जर्जर अवस्था में अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहा हो, लेकिन इसकी दीवारों में इतिहास की ऐसी अनेक कहानियां दर्ज हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
सरकारी स्तर पर ऐतिहासिक स्थल के रूप में मान्यता मिलने के बाद इस प्राचीन मंदिर को नई पहचान मिली है। स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर जिला प्रशासन की पहल और समजिला प्रशासन के निर्देश पर इसी ऐतिहासिक मंदिर परिसर में ‘मुलुक चलो’ आंदोलन के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, दीप प्रज्ज्वलित किया गया और राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। जर्जर मंदिर के ऊपर जब तिरंगा लहराया, तो मानो अतीत और वर्तमान एक ही क्षण में एक-दूसरे से जुड़ गए।
आस्था की नींव पर खड़ा हुआ ऐतिहासिक देवालय
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से चरगोला वैली के विभिन्न हिस्सों में अंग्रेजों द्वारा चाय-बागानों का विस्तार शुरू हुआ। दूर-दराज से आए चाय श्रमिकों के लिए उस समय पूजा-अर्चना के स्थायी धार्मिक स्थल बेहद सीमित थे। कई स्थानों पर छप्पर, बांस और लकड़ी से छोटे-छोटे मंदिर बनाए गए थे।
इसी धार्मिक आवश्यकता को महसूस करते हुए पंडित यमुना प्रसाद चौबे की पहल पर तत्कालीन चरगोला वैली के विभिन्न चाय-बागान क्षेत्रों के श्रद्धालुओं के आर्थिक सहयोग से सिंगला नदी के तट पर श्रीश्री राम-जानकी मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू हुआ। उत्तर प्रदेश से आए कारीगरों ने मंदिर का निर्माण पूरा किया और 6 अप्रैल 1903 को रामनवमी के पावन अवसर पर श्रीराम और माता जानकी की प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा की गई।
इसके बाद यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं रहा, बल्कि पूरे इलाके के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। रामनवमी के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती थी। भक्तों द्वारा अर्पित स्वर्ण एवं रजत आभूषणों से राम-जानकी की प्रतिमाएं सुसज्जित रहती थीं। मंदिर परिसर में हनुमान, शिव और मनसा मंदिर भी थे।
हर वर्ष बारुणी के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता था। दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते, मंदिर से जुड़े पवित्र सरोवर में स्नान करते और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते थे। धार्मिक अनुष्ठान, लोकपरंपरा और सामाजिक मेल-मिलाप से पूरा परिसर कभी गुलजार रहा करता था।
मंदिर की भूमि भी अपने आप में इतिहास
राम-जानकी मंदिर से जुड़ी भूमि का इतिहास भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कृष्णनगर मौजा में पट्टा संख्या 204 के दाग संख्या 407, 408 और 410 तथा पट्टा संख्या 224 के दाग संख्या 409 में श्रीश्री राम-जानकी जिउ और श्रीश्री राधाकृष्ण जिउ के नाम पर कुल 12 बीघा 6 कठा भूमि दर्ज होने की जानकारी मिलती है।
स्थानीय इतिहास से जुड़े लोगों का दावा है कि भगवान राम और भगवान कृष्ण के नाम पर सरकारी रूप से प्रदान की गई इतनी बड़ी भूमि का यह उदाहरण राज्य में अत्यंत दुर्लभ है। मंदिर और उससे जुड़ी संपत्ति के रखरखाव की जिम्मेदारी लंबे समय तक सेवायत परिवार के हाथों में रही।
लेकिन समय के साथ मंदिर की विशाल संपत्ति और ऐतिहासिक परिसर का स्वरूप বদलने लगा। स्थानीय लोगों के अनुसार, 1990 के दशक के बाद मंदिर से जुड़ी जमीन का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे समाप्त होता गया। कई हिस्सों में निजी भवन और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े हो गए। मंदिर का विशाल परिसर सिकुड़ता चला गया और कभी मौजूद रहे हनुमान, शिव तथा मनसा मंदिर भी धीरे-धीरे अपनी पहचान खो बैठे।
आज मूल राम-जानकी मंदिर का जर्जर ढांचा ही उस गौरवशाली अतीत का अंतिम प्रत्यक्ष साक्षी बनकर खड़ा है।
‘मुलुक चलो’ आंदोलन से भी जुड़ी है मंदिर की स्मृति
इस मंदिर का महत्व केवल धार्मिक इतिहास तक सीमित नहीं है। इसके साथ 1921 के ऐतिहासिक ‘मुलुक चलो’ आंदोलन की स्मृतियां भी जुड़ी हुई हैं।
तत्कालीन चरगोला वैली, जो आज रामकृष्णनगर समजिला क्षेत्र का हिस्सा है, असम के स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक थी। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान का प्रभाव जब देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचा, तो उसकी गूंज चरगोला वैली के चाय-बागानों तक भी पहुंची।
ब्रिटिश शासन के शोषण, अत्याचार और वंचना के खिलाफ चाय श्रमिकों ने संघर्ष का रास्ता अपनाया। हाथों में हथियार नहीं थे, लेकिन दिल में आजादी की आग और मन में मातृभूमि के लिए त्याग का संकल्प था। हजारों श्रमिकों ने अंग्रेजी शासन की बेड़ियों को चुनौती देते हुए ‘मुलुक चलो’ का नारा बुलंद किया।
स्थानीय जनश्रुतियों और इतिहास से जुड़े लोगों के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों में राम-जानकी मंदिर परिसर में भी स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकें होती थीं। आंदोलन की रणनीति और विभिन्न कार्यक्रमों को लेकर विचार-विमर्श किए जाने की बातें स्थानीय इतिहास में दर्ज हैं।
इस प्रकार जिस परिसर में कभी रामनाम और भक्ति के स्वर गूंजते थे, वही स्थान एक दौर में स्वतंत्रता की आकांक्षा से आंदोलित लोगों की गतिविधियों का भी साक्षी बना।
सरकारी मान्यता से मिली नई पहचान
लंबे समय तक इस ऐतिहासिक विरासत को वह सरकारी पहचान नहीं मिल सकी, जिसकी यह हकदार थी। ‘मुलुक चलो आंदोलन स्मृति रक्षा एवं प्रसार समिति’ के निरंतर प्रयास, शोध और पहल के बाद इस इतिहास को नए सिरे से सामने लाया गया।
इसी क्रम में राज्य सरकार की ओर से लातू मालेगढ़ और बदरपुर किले के साथ दुल्लभछड़ा के श्रीश्री राम-जानकी मंदिर को भी ऐतिहासिक स्थल के रूप में मान्यता दी गई।
यह मान्यता केवल एक प्राचीन मंदिर को सरकारी पहचान मिलना नहीं है। यह बराक घाटी के स्वतंत्रता संग्राम, चाय श्रमिकों के त्याग और 1921 के ‘मुलुक चलो’ आंदोलन से जुड़े उस इतिहास को सम्मान देना है, जो लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास के पन्नों से लगभग ओझल रहा।
जर्जर मंदिर के सामने लहराया तिरंगा
स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ पर इस सरकारी मान्यता को एक भावपूर्ण ऐतिहासिक क्षण मिला। श्रीभूमि जिला प्रशासन की पहल पर लातू मालेगढ़ और बदरपुर किले के साथ दुल्लभछड़ा के जर्जर राम-जानकी मंदिर को भी रोशनी से सजाया गया।
समजिला प्रशासन के निर्देश और व्यवस्था के तहत स्वतंत्रता दिवस की सुबह करीब साढ़े सात बजे मंदिर परिसर में ‘मुलुक चलो’ आंदोलन के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई और दीप प्रज्ज्वलित किया गया। इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।
प्रशासनिक निर्देश पर सिविपी हायर सेकेंडरी स्कूल के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य ब्रज गोपाल सिन्हा ने मंदिर परिसर में तिरंगा फहराया। मंदिर के इतिहास और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए मंदिर प्रबंधन समिति के संगठन सचिव राजदीप राय ने महत्वपूर्ण बातें रखीं।
कार्यक्रम में प्रेमचंद राय शर्मा, कमल मारुति, जयप्रकाश उपाध्याय, चंद्रकांति सिन्हा, प्रदीप बरुआ, प्रदीप कुर्मी, रामकुमार सिंह सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
एक तस्वीर, जिसमें समाया पूरा इतिहास
जर्जर दीवारों के बीच जब मंदिर के ऊपर तिरंगा लहराया, तो वह दृश्य केवल स्वतंत्रता दिवस का एक कार्यक्रम नहीं था। वह इतिहास और वर्तमान के बीच खड़ा एक जीवंत प्रतीक बन गया।
एक ओर समय के थपेड़ों से क्षतिग्रस्त मंदिर की दीवारें थीं, तो दूसरी ओर स्वतंत्र भारत का गौरवशाली तिरंगा। एक ओर उस धार्मिक स्थल की स्मृतियां थीं, जहां पीढ़ियों ने राम-जानकी की आराधना की, तो दूसरी ओर उसी भूमि पर उन चाय श्रमिकों को नमन था, जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
यह दृश्य यह भी याद दिलाता है कि भारत की स्वतंत्रता की कहानी केवल दिल्ली, कोलकाता या देश के बड़े शहरों की कहानी नहीं है। आजादी का इतिहास चाय-बागानों की पगडंडियों, श्रमिकों की बस्तियों और दुल्लभछड़ा जैसे छोटे-छोटे जनपदों की मिट्टी में भी लिखा गया है।
अब संरक्षण की जरूरत
सरकारी मान्यता के बाद स्थानीय लोगों की उम्मीदें भी बढ़ी हैं। लोगों का कहना है कि अब इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण, जीर्णोद्धार और नियमित रखरखाव की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
क्योंकि इतिहास केवल सरकारी अधिसूचना से जीवित नहीं रहता। उसे बचाने के लिए उसकी इमारत, भूमि का इतिहास, पुराने दस्तावेज, धार्मिक परंपराएं, स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियां और स्थानीय लोगों की भावनाएं—सबको सुरक्षित रखना आवश्यक है।
सिंगला नदी के किनारे खड़ा यह जर्जर मंदिर आज मानो मौन होकर अपनी पूरी कहानी सुना रहा है—राम-जानकी की आराधना से लेकर बारुणी मेले तक, चाय श्रमिकों के धार्मिक जीवन से लेकर ‘मुलुक चलो’ आंदोलन तक और स्वतंत्रता संग्राम से लेकर स्वतंत्र भारत के तिरंगे तक।
सरकारी मान्यता मिलने के बाद इतिहास को सम्मान तो मिल गया है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इतिहास के इस अंतिम साक्षी को उसके अस्तित्व के अंतिम प्रहर में बचाया जा सकेगा?
यही सवाल आज दुल्लभछड़ा के लोगों के साथ-साथ इतिहास और विरासत को सम्मान देने वाले हर नागरिक के सामने खड़ा है।