(कहानी) मां तो मां ही होती है……

माँ को वृद्धाश्रम छोड़कर बेटा खुश था… 11 महीने बाद माँ ने जो किया, बेटे की आँखों में आँसू आ गए

“माँ, यहाँ आपकी देखभाल मुझसे भी अच्छी होगी।”

अमित ने कार का दरवाजा बंद करते हुए कहा।

सामने शहर का एक साफ-सुथरा वृद्धाश्रम था।

माँ ने इमारत को देखा… फिर अपने बेटे को।

“तू भी कभी-कभी मिलने आएगा न?”

अमित ने नजरें चुराकर कहा—

“हाँ माँ… बिल्कुल।”

माँ मुस्कुरा दीं।

“ठीक है बेटा।”

अमित ने उनका सामान अंदर रखवाया और जल्दी से वापस मुड़ गया।

दरवाजे तक पहुँचकर माँ ने पुकारा—

“अमित…”

वह पलटा।

माँ ने बस इतना कहा—

“बेटा, मैं तुझसे नाराज़ नहीं हूँ… बस एक बात याद रखना, किसी को छोड़ना आसान होता है… लेकिन छोड़े हुए इंसान की जगह जिंदगी में खाली ही रहती है।”

अमित ने बात को भावुकता समझा।

“माँ, अपना ख्याल रखना।”

और चला गया।

माँ दरवाजे पर खड़ी उसे तब तक देखती रहीं, जब तक उसकी कार सड़क के मोड़ के पीछे गायब नहीं हो गई।

फिर उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं और अंदर चली गईं।


अमित की जिंदगी बहुत बदल गई।

नौकरी में प्रमोशन मिला।

नया फ्लैट लिया।

पत्नी रिया के साथ घूमने जाने लगा।

लोग पूछते—

“माँ कहाँ हैं?”

वह सहजता से कहता—

“वृद्धाश्रम में हैं। वहाँ उनकी बहुत अच्छी देखभाल होती है।”

उसे लगता था उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी।

लेकिन हर महीने की पहली तारीख को वृद्धाश्रम से एक फोन आता।

“अमित जी, आपकी माँ के लिए दवाइयाँ…”

अमित पैसे भेज देता।

कभी-कभी माँ खुद फोन करतीं।

“बेटा, व्यस्त हो?”

“हाँ माँ, ऑफिस में हूँ।”

“अच्छा… खाना खा लिया?”

“हाँ।”

“रिया कैसी है?”

“ठीक है।”

कुछ सेकंड खामोशी रहती।

फिर माँ कहतीं—

“ठीक है बेटा, काम कर।”

अमित फोन रख देता।

उसे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि माँ हर फोन में कुछ और कहना चाहती थीं।


एक दिन वृद्धाश्रम की संचालिका ने अमित को फोन किया।

“आपकी माँ आपसे मिलना चाहती हैं।”

अमित ने कहा—

“अभी थोड़ा मुश्किल है। इस रविवार शायद आ जाऊँ।”

संचालिका कुछ पल चुप रहीं।

फिर बोलीं—

“रविवार तक शायद देर हो जाए।”

अमित घबरा गया।

“क्या हुआ माँ को?”

“उनकी तबीयत बहुत खराब है।”

अमित उसी शाम पहुँच गया।

कमरे में माँ बिस्तर पर लेटी थीं।

चेहरा कमजोर हो चुका था।

अमित उनके पास बैठ गया।

“माँ…”

माँ ने आँखें खोलीं।

उसे देखकर मुस्कुराईं।

“आ गया बेटा?”

“हाँ माँ।”

“बहुत दिनों बाद आया।”

अमित की आँखें झुक गईं।

“माँ, काम बहुत था।”

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“कोई बात नहीं।”

कुछ देर बाद उन्होंने कहा—

“मेरी अलमारी में एक लाल कपड़े की पोटली है। वो तुम्हारे लिए है।”

अमित ने पोटली खोली।

उसमें कुछ पुराने कागज थे।

एक छोटी-सी चाबी।

और बैंक की एक पासबुक।

अमित हैरान था।

“माँ, इसमें क्या है?”

माँ ने कहा—

“घर।”

“कौन सा घर?”

माँ ने धीरे से कहा—

“तुम्हारा बचपन वाला घर।”

अमित के चेहरे पर हैरानी फैल गई।

“लेकिन वो घर तो मैंने बेच दिया था!”

माँ मुस्कुराईं।

“नहीं बेटा।”

“तुमने जिस घर को बेचा था, वह सिर्फ सामने का हिस्सा था।”

“पीछे का छोटा-सा आँगन और कमरा मैंने अपने नाम बचाकर रखा था।”

अमित कुछ समझ नहीं पाया।

माँ बोलीं—

“वहाँ तुम्हारे पिता की पुरानी दुकान भी है।”

“मैंने उसे किराए पर दे रखा था।”

“उससे जो पैसे आते थे, मैं बचाती रही।”

“क्यों?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हारे लिए।”

अमित की आँखें भर आईं।

“मेरे लिए?”

“हाँ।”

“क्यों?”

माँ ने मुस्कुराकर कहा—

“क्योंकि माँ बेटे को छोड़ती नहीं है बेटा…”

“चाहे बेटा माँ को कहीं भी छोड़ आए।”

अमित रो पड़ा।


लेकिन असली झटका अभी बाकी था।

माँ ने पासबुक उसकी तरफ बढ़ाई।

“इसमें पिछले ग्यारह सालों की बचत है।”

अमित ने पासबुक खोली।

खाते में 18 लाख रुपये थे।

वह अवाक रह गया।

“माँ… आपने इतने पैसे मेरे लिए बचाए?”

माँ ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

अमित ने चौंककर देखा।

“तो?”

माँ ने कहा—

“मैंने ये पैसे उन लोगों के लिए बचाए हैं, जिन्हें अपने बच्चों ने अकेला छोड़ दिया।”

अमित की आँखों से आँसू गिरने लगे।

माँ ने आगे कहा—

“जब तुम मुझे यहाँ छोड़कर गए थे न…”

“उस रात मैं बहुत रोई थी।”

“लेकिन अगले दिन मैंने देखा कि यहाँ मुझसे भी ज्यादा अकेले लोग हैं।”

“कोई बेटा छोड़ गया था।”

“किसी की बेटी विदेश चली गई थी।”

“किसी के बच्चे पैसे भेजते थे, लेकिन मिलने नहीं आते थे।”

“तब मैंने फैसला किया कि मैं अपने बुढ़ापे को रोते हुए नहीं बिताऊँगी।”

“मैंने अपनी पेंशन और किराए के पैसे बचाने शुरू किए।”

“और अब…”

उन्होंने पासबुक उसकी तरफ बढ़ाई।

“इस पैसे से इस वृद्धाश्रम में एक छोटा-सा कमरा बनवाना है।”

“ऐसा कमरा जहाँ कोई बुजुर्ग अकेलेपन में रात को रोए तो उसके पास कोई बैठने वाला हो।”

अमित माँ को देखता रह गया।

जिस माँ को वह समझता था कि वह खुद असहाय है…

वह इतने लोगों का सहारा बनने की तैयारी कर रही थी।


माँ ने उसका हाथ पकड़कर कहा—

“एक बात और है।”

“क्या?”

“मुझे घर मत ले जाना।”

अमित चौंक गया।

“माँ!”

“नहीं बेटा।”

“अब मैं यहीं रहूँगी।”

“लेकिन क्यों?”

माँ मुस्कुराईं।

“क्योंकि यहाँ मुझे मेरी जरूरत महसूस होती है।”

“और तुम्हारे घर में?”

अमित के पास कोई जवाब नहीं था।

माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“तुम मुझे लेने आए हो, यह देखकर खुशी हुई।”

“लेकिन मुझे अपने साथ ले जाकर फिर मेरी जिंदगी अपने हिसाब से मत चलाना।”

“अगर कभी सच में माँ को घर लाना…”

“तो मुझे मेहमान बनाकर नहीं…”

“मेरी मर्जी से लाना।”

अमित फूट-फूटकर रोने लगा।

“माँ, मैंने आपको बहुत अकेला कर दिया।”

माँ ने उसे गले लगा लिया।

“बेटा, तुमने मुझे अकेला नहीं किया।”

“तुमने बस मुझे यह सिखा दिया कि माँ का प्यार बच्चों के साथ खत्म नहीं होता।”

“वह दूसरों के काम भी आ सकता है।”


अगले महीने वृद्धाश्रम के पीछे एक नया कमरा बनना शुरू हुआ।

दरवाजे पर एक छोटी-सी पट्टी लगाई गई—

“माँ का आँगन”

यह नाम अमित ने रखा था।

उस कमरे में हर शाम बुजुर्ग बैठते।

कोई अपनी पुरानी कहानी सुनाता।

कोई अपने बच्चों की तस्वीर दिखाता।

कोई चुपचाप खिड़की से बाहर देखता।

और जमुना देवी सबके बीच बैठकर कहतीं—

“बच्चों को दोष मत देना।”

“उन्हें बस इतना सिखाना कि बुजुर्गों को पालना और बुजुर्गों के साथ जीना—दो अलग बातें हैं।”

एक दिन अमित अपनी माँ के पास आया।

उसने पूछा—

“माँ, मैं अब हर रविवार आपके पास आऊँ?”

माँ ने मुस्कुराकर कहा—

“हर रविवार नहीं।”

अमित हैरान हुआ।

“क्यों?”

माँ बोलीं—

“जब मन करे तब आना।”

“लेकिन एक शर्त है।”

“क्या?”

“जब भी आओगे…”

“मेरे साथ बैठकर खाना खाओगे।”

अमित मुस्कुराया।

“पक्का।”

माँ ने कहा—

“बस यही तो चाहिए था बेटा।”


कई महीने बाद अमित ने अपने घर की दीवार पर एक तस्वीर लगाई।

उसमें वह बच्चा था…

और उसकी माँ उसे गोद में उठाए हुए थीं।

तस्वीर के नीचे उसने सिर्फ एक लाइन लिखी—

“मैंने माँ को वृद्धाश्रम नहीं भेजा था… मैंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बाहर छोड़ दिया था।”

और शायद यही सच है।

हम अक्सर कहते हैं—

“हम अपने माता-पिता की बहुत देखभाल करते हैं।”

लेकिन कभी खुद से पूछिए—

क्या हम उनकी जरूरतें पूरी कर रहे हैं…

या उनकी इच्छाएँ भी सुन रहे हैं?

क्योंकि बुजुर्गों को सिर्फ दवा, पैसा और खाना नहीं चाहिए।

कभी-कभी उन्हें बस कोई ऐसा चाहिए होता है जो उनके पास बैठकर कहे—

“माँ, आज आपकी बात सुनने के लिए मेरे पास पूरा समय है।”

और याद रखिए—

जिस दिन माँ आपसे कुछ माँगना बंद कर दे…
जरूरी नहीं कि उसकी जरूरतें खत्म हो गई हों।
हो सकता है उसने उम्मीद करना छोड़ दिया हो।
वंदना त्रिपाठी ✍️
साभार फेसबुक 

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