कभी ये भी धुनें दिया करता था..

यूं ही बरसों से, धूल और गर्द के, साये में
खामोश पड़े, साज के तार, चुपके से हिला के
क्यूं तुमने याद दिला दिया कि…..
कभी ये भी धुनें दिया करता था,
कभी ये भी धुनें दिया करता था…
तंज कसते है, मुझपे, दूब के कांटे से
जख्मी हुए ये मोम के लोग, कि दर्द कितना सहा है उन्होंने,हम क्या जाने,
वे क्या जाने, मैं उफ्फ भी नहीं करता था
जब नश्तर, शमशीर और तकदीर सबके जख्मों के दर्द पिया करता था
कभी ये भी धुनें दिया करता था,
कभी ये भी धुनें दिया करता था..
खुशबू जैसे हर सू, बाकी ना कोई आरजू
मेरे अंदर एक कलंदर, झुका नहीं सामने चाहे कोई सिकंदर
हर कतरे में एक नदी, विष भी माना अमृत,मिल जाए यदि
था मैं अदना, ले आंखों में सपना, भिड़ गया हरेक से,
सामने चाहे हो कोई धुरंधर
यूं एक लम्हे में मैं सदियां जिया करता था
कि कभी मैं भी धुनें दिया करता था…

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