– वीरेन्द्र कुमार जैन
अगर कल्पना कीजिए, यदि अमेरिका और ईरान एक दुसरे के समक्ष खड़े होकर कहे- हमसे जो कोई भी भूल हुई हो उसके लिए हृदय से क्षमा मांगते हैं और दुसरा पक्ष कहे हम आपको क्षमा करते हैं और आपसे भी क्षमा चाहते हैं।
यदि इन दो राष्ट्र में युद्ध रूक जाय तो मिसाइले शान्त हो जाएँ, माताओं की आँखो के आंसू थम जाएँ और बच्चे सुकून की नींद सो सके तो इससे बड़ी क्षमा की शक्ति क्या हो सकती है।
अगर ऐसा हर विवादास्पद स्थिति में हो जाए तो हर तरफ खुशियां ही होगी। क्या विश्व में एक दिन पूरे वर्ष में ऐसा मनाया जा सकता है कि हम एक दुसरे से क्षमा मांग सके और पुराने सारे गिले शिकवों को मिटा सके? ऐसा अवश्य हो सकता है। अगर पुरा विश्व इसकी अहमियत को समझ पाय तो जैन धर्म की यह परम्परा पूरी मानवता के लिए कल्यानकारी होगी। क्षमा दिवस जैन धर्म की एक आध्यात्मिक परम्परा है। यह दिन आत्मचिंतन कर अहंकार, क्रोध, आपसी वैमनस्य समाप्त करने का अवसर है।
जैन धर्म परम्परा में प्रसिद्ध भाव है “मिच्छामि दुक्कड़म” अर्थात मेरे द्वारा मन, वचन या कर्म से जाने अनजाने में जो भी गलत हुआ हो, उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।
इसका वास्तविक अर्थ केवल माफ कर दीजिए, ये नहीं है।
इसके तीन पक्ष हैं-
अपनी भूलों को स्वीकार करना
दुसरो की भूल को मन में न रखना
भविष्य में वैसी गलती न दोहराने का संकल्प लेना।
भगवान महावीर की शिक्षाओं में अंहिसा, संयम, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि के साथ क्षमा का भाव गहराई से जुड़ा है। क्षमा मनुष्य के क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को दूर करने में सहायक होता है। यह शब्द बोलने में छोटा है किन्तु इसके भीतर संसार को बदलने की अपार शक्ति छिपी है।
हम प्रायः यही सोचते है कि क्षमा केवल परिवार में, मित्रों
के बीच या व्यक्तिगत संबंधो में आवश्यक है। ऐसा नहीं है। यह दो समाजों के बीच, दो देशो के बीच भी उतना ही आवश्यक है क्योंकि पूरी मानवता को क्षमा और शान्ति की आवश्यकता है। आज संसार में अनेक स्थानों पर संघर्ष और युद्ध मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में जैन धर्म का क्षमा का संदेश और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
अगर दो देश जो युद्ध से ग्रस्त है कहे कि अब युद्ध नहीं, संवाद का रास्ता चुनेंगे तो क्या होगा?
शायद मिसाइले रूक जाएँगी, बंदुके शान्त हो जाएंगी, शायद सैनिक अपने घरो को लौट सकेंगे। तब शायद किसी माँ को अपने बेटे को खोने का डर नहीं सतायगा। शायद हमसे परिवारों के जीवन में फिर से शान्ति और खुशी लौट आएगी। यही तो क्षमा की शक्ति है। क्षमा हार नहीं है। क्षमा कायरता नहीं है। क्षमा अपने अहंकार पर विजय है।
अकसर हमारे रिश्तों में ऐसा होता है। पहले वो माफी माँगे, फिर में माफ करूंगा यहाँ पर जैन दर्शन हमें अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है।।
जैन दर्शन कहता है कि हमें अपने आप से पूछना चाहिए-
क्या मैंने कभी किसी की दुःख दिया है? क्या मेरे शब्दों से किसी के हृदय को चोट पहुंची है?
क्या मेरे अहंकार से कोई रिश्ता कमजोर हुआ है? क्या मेरे क्रोध ने किसी के घर को उजाड़ा है। जैन दर्शन में क्षमा दिवस का यही सबसे बड़ा संदेश है कि हम दुसरो की गलतियों को देखने के बजाय अपनी गलतियों को स्वीकार करने का साहस रखें।
अगर परिवारों में क्षमा, भाव आ जाए तो कितने रिश्ते बच सकते है। यदि समाज में क्षमा, भाव आ जाए तो कितने विवाद पनपने से पहले समाप्त हो जाए, यदि राष्ट्रों के बीच संवाद और क्षमा की भावना मजबूत हो पाए तो कितने संघर्ष टाले जा सकते हैं। और यदि पूरी मानवता इस बात को समझ कर मान ले कि जीतने से अधिक महत्वपुर्ण है जीवन को बचाना, तो दुनिया शान्तिपूर्ण बन सकती है।
भगवान महावरी का मार्ग हमें अंहिसा, अनेकांत और आत्मसंयम की ओर ले जाता है। अनेकांत हमें यह समझने में सहायता करता है कि सत्य को देखने का दृष्टिकोण हमेशा हमारा ही पूर्ण नहीं होता, दुसरो का दृष्टिकोण भी उतना ही महत्वपूर्ण है समझने के लिए। जब यह भावना आती है तो कट्टरता कम होती है और संवाद के लिए स्थान बनता है। क्षमा मांगने और क्षमा करने के समय यह भाव होना चाहिए मैं अपने भीतर के क्रोध को कम करूंगा, मैं अपने अहंकार को नियंत्रित करूंगा और जहाँ संभव हो, विवाद के स्थान पर संवाद को चुनूँगा क्योंकि एक क्षमा एक रिस्ते को बचा सकती है। एक क्षमा एक समाज को बचा सकती है और कभी-कभी एक क्षमा हजारों जिन्दगी को बचाने की शुरुआत बन सकती है।
दुनिया ने विज्ञान में अभूतपूर्व प्रगति की है। हमने अंतरिक्ष की सीमाएं पार की है, लेकिन आज भी मनुष्य के मन में क्रोध, घृणा बदले और संघर्ष की भावनाएं मौजूद है ऐसे समय में हमें एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता है जो हथियारो से नहीं, हृदय परिवर्तन से शांति स्थापित करें।
वह शक्ति है-क्षमा
आप हमारा विनम्र प्रस्ताव है कि विश्व समुदाय प्रत्येक वर्ष एक दिन को “विश्व क्षमा दिवस” World Forgiveness Day के रूप में समर्पित करने पर विचार करे। यह दिवस किसी धर्म का दिवस न हो, बल्कि मानवता का दिवस हो। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक विवाद को मिटाना नहीं बल्कि भविष्य के लिए निरंतरता को रोकना है। क्षमा इतिहास को बदल नहीं सकती लेकिन भविष्य की दिशा बदल सकती है।
क्षमा का अर्थ अन्याय को सही ठहराना नहीं है। क्षमा का अर्थ सत्य को भूल जाना नहीं है। क्षमा का अर्थ है-बदले की भावना से ऊपर उठकर शांति और मानवीय गरिमा को प्राथमिकता देना।
आज हम विश्व समुदाय से प्रार्थना करते हैं कि “विश्व क्षमा दिवस की अवधारना पर विचार किया जाए और इसे मानवता शांति, अहिंसा, संवाद तथा मेल मिलाप को बढ़ावा देने वाले अंतरराष्ट्रीय दिवस के साथ में विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जाए-
एक दिन क्षमा के नाम
एक दिन मानवता के नाम
एक दिन शांति के नाम
जैन दर्शन में केवल मनुष्यों से नहीं बल्कि धरती के प्रत्येक जीव-जंतु और प्रकृति के रूप से भी क्षमा मांगा जाता है।
हम जाने अनजाने में धरती में उपलब्ध संसाधनों का अधिक दोहन करते है। जल को गंदा करना, व्यर्थ जल बहाना और जीवों का जीवन कठिन करना, धूओं और विषैली गैस से वायु को दूषित करना। वृक्ष वनस्पतियों को अजाड़ना-काटना। पशु पक्षियों के आसियानों को उजाड़ना।
जैन धर्म का संदेश है हर जीव को जीने का हक है। इसलिए क्षमा केवल शब्दों में न रहे। हमारे जीवन में ऐसी सावधानी आए कि किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचे। इसलिए हमें सबसे क्षमा मांगनी चाहिए।
जहाँ बदलने की भावना होती है, वहीं शक्ति का जन्म होता है। जहाँ अहंकार झुकता है, वहीं क्षमा भाव जन्म लेती है और क्षमा का वास होता है, वहीं मानवता जीवित रहती है।
आइए पूरे हृदय से कहें
“मिच्छामि दुक्कड़म”
सबसे क्षमा, सबको क्षमा।