ईटभट्ठा से बराक के 15 लाख गरीब लोग लाभान्वित होते है, सरकार के 14 विभागों को राजस्व मिलता है, लेकिन कोयला ही बड़ी समस्या है – उदय शंकर गोस्वामी

यशवन्त पाण्डेय शिलकुड़ी १२ अक्टूबर। बराकघाटी में ईंटभट्ठों के चलते गरीब पुरुष और महिलाओं को रोजगार मिलता हैं, आयकर विभाग, वन विभाग, खनन विभाग सहित असम सरकार के 14 विभागों को ईटभट्ठा मालिक राजस्व देते हैं लेकिन ये विषय जनता के सामने नहीं आती है। लोगों को पता नहीं चल पाता कि ईटभट्ठा मालिकों द्वारा गरीब श्रेणी के लोगो को रोजगार देकर लाभान्वित किया जाता है, ईटभट्ठा पूरे बराकवैली में कुल 3 लाख गरीब लोगों को रोजगार मिलता है, अगर इनके घर में पांच लोग रहते हैं तो कुल 15 लाख गरीब लोग इटभट्ठा पर निर्भरशील है, इटभट्ठा द्वारा शीतकालीन समय में रोजगार मुहैया कराया जाता है, जब धान कटने के बाद गरीबों के पाश कोई काम नही रहता तब ईटभट्ठा से काम मिलता है और उनका परिवार चलता है, उपरोक्त बातें गुरुवार को मेहेरपुर में आयोजित पत्रकार वार्ता में बराक वैली ब्रिक्स इंडस्ट्रीज ओनर्स एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष उदय शंकर गोस्वामी ने कही ।उन्होंने कहा कि गुरुवार सुबह 10:30 बजे से ही ईंट भट्ठा से सबंधित विभिन्न समस्याओं को लेकर एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था, इसके पश्चात पत्रकार वार्ता में श्री गोस्वामी ने और कहा कि बराकवेली ब्रिक्स इंडस्ट्रीज ओनर्स एसोसिएशन की सम्मेलन में अखिल भारतीय ब्रिक्स इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक तिवारी, असम के अध्यक्ष जीतेंद्र शईकिया, असम के महासचिव बिपुल मालाकार, त्रिपुरा के अध्यक्ष परितोष साहा, बराक वैली के अध्यक्ष राधेश्याम विश्वास, बराक वैली के कार्यकारी अध्यक्ष उदय शंकर गोस्वामी, बराक वैली के महासचिव तारकेश्वर सिंह उपस्थित थे उपरोक्त पदाधिकारियों के उपस्थिति में श्रीगोस्वामी ने कहा कि ईंटों के बिना कोई भी निर्माण संभव नहीं होता, समाज में ईंटभट्ठा मालिकों का बहुत बड़ा योगदान है, किसी भी भवन, बाउंड्री, कार्यालय-अदालत, प्रधानमंत्री आवास, सड़क आदि के निर्माण के लिए ईंटों की जरूरत होती है, और इन इटो के निर्माण का कार्य इटभट्ठा मालिक करते आ रहे हं । ईंट भट्टों के माध्यम से लोगों को रोजगार मिलने के साथ-साथ विभिन्न दुकानदारों को भी इस व्यवसाय से लाभ होत है। उन्होंने कहा कि हमारी मुख्य समस्या यह है कि हमें नियमित कोयला नहीं मिल रहा है, हमारी सरकार के साथ बैठक हुई थी, जिसमें बराक घाटी में ईंट भट्टों के लिए सीजन के लिए कितने कोयले की आवश्यकता है, इसके लिए बराक उपत्यका के इटभट्ठों की सूची के साथ एक अनुमान दिया गया था, लेकिन ईंट भट्ठों को नियमित रूप से कोयला नहीं मिल रहा है। वहीं जब कोयला नही मिलता है तब दूसरे माध्यम से आसमान छूती अत्यधिक कीमतों पर कोयला लेेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जो कला प्रति. टनल 5,000 रुपया में मिलता है उसी कोयले को दूसरे के माध्यम से प्रति टन 15,000 रुपये चुकाने पड़ते हैं। इससे ईट का दाम भी बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि इटभट्ठा मालिकों पर ईंट भट्ठों से प्रदूषण बढ़ने का आरोप रहता है, प्रदूषण कम करने के लिए जिगजैग भट्ठों के निर्माण का आदेश है, लेकिन बराकवेली और ब्रह्मपुत्रवेली में जिगजैग भट्ठों के निर्माण में कई दिक्कतें हैं। बराक घाटी में भट्ठे निचले इलाकों में हैं, निचले इलाकों की मिट्टी नरम होती है और मानसून के मौसम में ये भट्ठे डूब जाते हैं, अगर हम उस मिट्टी पर जिगजैग ईंट भट्ठे बनाते हैं, तो समस्या यह है कि जिगजैग भट्ठों बिजली के पंखे लगते हैं, लेकिन सभी जगहों पर बिजली नहीं पहुंची है, अगर बिजली वाले स्थान पर जिगजैग ईंटभट्ठा बनाया गया तो वह बरसात में डूब जाएगा और यदि भूकंप आता है, तो ज़िगज़ैग चिमनी गिर जाएगी, ज़िगज़ैग भट्ठे बनाने में जो खर्च किया गया जायेगा वह पैसा पानी में डूब जाएगा, इसलिए सरकार बहादुर से हमलोगों का अनुरोध है कि विशेषज्ञों के साथ इन भट्ठों की जांच कर किस प्रकार का चिमनी निर्माण किया जा सकता है जिससे हमें नुकसान भी न हो और प्रदूषण कम हो। इस अवसर अखिल भारतीय इटभट्ठा एसोसियेशन के अध्यक्ष अशोक तिवारी, असम प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष जीतेन्द्र शईकिया, बराक उपत्यका के अध्यक्ष राधेश्याम विश्वास ने अपना बहुमुल्य जानकारी पत्रकारों को साझा किया।

  प्रेस कॉन्फ्रेंस में अन्य लोगों के अलावा डाॅ. रंजन सिंह, राजेश सिंह (लड्डू) वीरेंद्र सिंह, रामस्वार्थ सिंह, उमेश सिंह, शांतलाल सिंह, रामानंद सिंह, राजीव सिंह व अन्य मौजूद थे.

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