इको-फ्रेंडली बाँस की राखियों के माध्यम से महिला आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश…
नई दिल्ली। रक्षाबंधन के पावन पर्व को महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण आजीविका और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए पूर्वोत्तर भारत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं द्वारा इको-फ्रेंडली बाँस की राखियाँ तैयार की जा रही हैं। इन महिलाओं द्वारा अपने हुनर और मेहनत से तैयार की जा रही ये राखियाँ भाई-बहन के प्रेम के साथ-साथ आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन की भावना का भी प्रतीक बन रही हैं।
पूर्वोत्तर की इन ग्रामीण बहनों के सामने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने परिवार की आजीविका को मजबूत करने की चुनौती है। इसी दिशा में उन्होंने अपने पारंपरिक हुनर और रचनात्मकता को रोजगार के अवसर में बदलते हुए बाँस से आकर्षक एवं पर्यावरण-अनुकूल राखियाँ तैयार करने का कार्य शुरू किया है।
सूर्या फाउंडेशन द्वारा इन महिलाओं को राखी निर्माण के लिए आवश्यक मशीन, कच्चा माल, प्रशिक्षण हेतु स्थान तथा तकनीकी प्रशिक्षण जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। संस्था का उद्देश्य इन महिलाओं के कौशल को निखारकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना तथा उनके लिए स्थायी रोजगार एवं आजीविका के अवसर विकसित करना है।
इस पहल के माध्यम से स्थानीय संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण को एक साथ बढ़ावा दिया जा रहा है। बाँस से निर्मित राखियाँ प्लास्टिक एवं अन्य गैर-पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों के बेहतर विकल्प के रूप में भी सामने आ रही हैं।
सूर्या फाउंडेशन के आ. जे.पी. सर के निर्देशानुसार अगस्त के प्रथम सप्ताह में प्लांट परिसर में इन इको-फ्रेंडली बाँस की राखियों की बिक्री के लिए विशेष स्टॉल लगाया जाएगा। प्लांट के अधिकारी एवं कर्मचारी अपने परिवारजनों, मित्रों एवं परिचितों के लिए अधिक से अधिक राखियाँ खरीदकर इस पहल को सफल बनाने में सहयोग करेंगे।
इस अवसर पर सभी से अपील की गई है कि इस रक्षाबंधन पूर्वोत्तर की बहनों द्वारा अपने हाथों से तैयार की गई बाँस की राखियों को अपनाएँ और उनके आत्मनिर्भरता के प्रयास में सहभागी बनें।
एक राखी की खरीद केवल एक उत्पाद खरीदना नहीं है, बल्कि किसी बहन की मेहनत को सम्मान देना, उसके परिवार की उम्मीद को मजबूत करना और उसके आत्मनिर्भर भविष्य की ओर एक कदम बढ़ाना है।