— अशोक वर्मा
जीवन एक संघर्ष है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ता है। गरीबी मानव जीवन का एक बड़ा अभिशाप कही जा सकती है। किंतु इसी गरीबी में आत्मविश्वासी और दृढ़ संकल्प वाले लोग अपनी मानवीय कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर स्वयं को स्थापित करने के लिए तैयार करते हैं।
शंभु कानू का जन्म इचाबिल चाय बागान में हुआ था। 15 अगस्त भारत के इतिहास का एक विशेष दिन है। वर्ष 1872 में विश्वविख्यात क्रांतिकारी एवं दिव्य दृष्टि-संपन्न महर्षि अरविंद का जन्म हुआ था। संयोगवश इचाबिल चाय बागान के प्रख्यात चाय-युवा-छात्र संगठक शंभु कानू का जन्म भी 15 अगस्त 1947 को हुआ, जिस दिन भारत स्वतंत्र हुआ। शायद इसी कारण उनके जीवन में देशभक्ति की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। बचपन में वे अन्य बच्चों की तरह ही थे। उनके विचार, व्यवहार और स्वभाव में बालसुलभ चंचलता थी, किंतु कई बार वे स्वयं में ही खो जाते थे और अपने मन की बात किसी से साझा नहीं करते थे।
वे मेधावी और अध्ययनशील थे। किशोरावस्था से ही नाटकों तथा जन-जागरण से जुड़े साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, फिर भी वे साहसी और जिद्दी स्वभाव के थे।
अपने हमउम्र मित्रों के साथ नाटक मंचित करने की प्रबल इच्छा को साकार करने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया। उनके नेतृत्व में इचाबिल चाय बागान में जयदुर्गा हिंदी ड्रामा पार्टी की स्थापना हुई। उसी समय सेफिनजुरी (मेदली), तिलभूम,चान्दखिरा और हाथीखिरा चाय बागानों के कुछ उत्साही युवाओं से उनका संपर्क हुआ, जो अपने-अपने क्षेत्र में नाट्य गतिविधियों से जुड़े हुए थे।
मुख्यतः चाय बागानों के विद्यार्थियों के रहने की सुविधा के लिए करीमगंज नगर में निम्बार्क आश्रम की स्थापना एक त्यागी एवं जनकल्याणकारी संन्यासी ने की थी।वे थे नन्द किशोर जी। अध्ययन के दौरान वहीं रहने वाले हीरालाल प्रजापति, सुभाष कोईरी, पुरुषोत्तम वर्मा, विजय स्वर्णकार तथा अन्य युवकों से शंभु की पहचान हुई। वहीं विचार-विमर्श के बाद उन्होंने चाय श्रमिक छात्र युवा समिति नामक संगठन का गठन किया। इस संगठन की स्थापना में शंभु कानू की प्रमुख भूमिका थी।इस संघर्ष के दौरान कछाड़ जिले (वर्तमान बराक वैली)का और भी युवा छात्र जैसे कि महादेव माल, जवाहरलाल राय, ब्रजमोहन सिन्हा, सीताराम कोइरी, सुरेश चंद्र द्विवेदी,सनातन मिश्र,दीनेश प्रसाद ग्वाला(जो बाद में लखीपुर के विधायक एवं असम सरकार में कैबिनेट मंत्री बने) हरिप्रसाद धोबी,रवि नोनिया, बंशीधर उपाध्याय,बीरेन पात्र,गुनो सिंह क्षेत्री,राम चन्द्र कोंहार,बोलाईचान्द साहू लोगों से परिचय हुआ।इचाबिल के महाबल कोइरी, हरिप्रसाद रजक, जगन्नाथ ग्वाला तो थे ही।सभी लोगों के सहयोग से समाज के प्रति अन्याय आचरण का प्रतिवाद होता रहा।
श्रमिक समाज से उभरकर आए नेता भजन लाल बरई समय-समय पर संगठन को मार्गदर्शन और सहयोग देते थे। संगठन का पंजीकरण तत्कालीन राजधानी शिलांग से स्वीकृत हुआ। बाद में असम के एक अन्य श्रमिक छात्र संगठन के अधिकारियों के आमन्त्रण पर शंभु कानू और हीरालाल प्रजापति शिलांग स्थित श्रमिक छात्रावास गए। वहाँ संगठन की कार्यप्रणाली पर विस्तृत चर्चा हुई। इसके बाद संगठन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से असम के छात्र संगठन के पदाधिकारी कछाड़(वर्तमान बराक घाटी) आए और अनेक चाय बागानों का दौरा किया। वर्ष 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान ब्रह्मपुत्र घाटी से जितेन सुंडी और सुखराम गोवाला भी करीमगंज आए थे।
यह उल्लेखनीय है कि कछाड़ चाय श्रमिक यूनियन के अध्यक्ष रामप्रसाद चौबे, इटखोला के शंकर सिंह तथा डॉ. विवेकानंद भवाल की प्रेरणा और मार्गदर्शन में तत्कालीन श्रमिक यूनियन के साधारण सचिव जगन्नाथ सिंह के विरुद्ध कुछ युवाओं ने आंदोलन प्रारंभ किया, जिससे पूरे कछाड़ जिले में जागृति की लहर फैल गई। शंभु कानू का दल भी इस आंदोलन से जुड़ गया।
गरीबी के कारण उनकी कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। आजीविका की तलाश में वे व्यग्र थे। उसी समय वयस्क शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास शुरू हुआ और शिक्षकों की नियुक्ति भी हुई। संसाधन भले सीमित थे, लेकिन उत्साह की कमी नहीं थी। हालांकि ‘रात्रि विद्यालय’ को लेकर स्वार्थी तत्वों की अनेक प्रकार की बाधाएँ भी सामने आईं।पर शंभु ने अपने चाय बागान में ” रात्रि विद्यालय” की शुरुआत की।
उस समय मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा को लेकर व्यापक चर्चा चल रही थी। विधायक विश्वनाथ उपाध्याय के प्रयासों से बराक घाटी के अनेक चाय बागानों और हिंदीभाषी गांवों में सरकार की स्वीकृति से सौ से अधिक हिंदी विद्यालय स्थापित किए गए। दुर्भाग्यवश बाद के समय में किसी अज्ञात कारणवश—चाहे वह राजनीतिक हो या संकीर्ण सांप्रदायिक—इनमें से अनेक विद्यालयों की शिक्षा का माध्यम बदल दिया गया। यह विषय विस्तृत चर्चा का है, किंतु यहाँ उसका प्रसंग नहीं है। इसी बीच शंभु को एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिल गई, जिससे परिवार की आर्थिक कठिनाइयाँ कुछ हद तक दूर हुईं।
इस दौरान उनकी संगठन क्षमता, प्रभावशाली वक्तृता कला और स्पष्टवादिता के कारण वे व्यापक रूप से लोकप्रिय हुए, हालांकि विरोधियों की भी कमी नहीं थी। उनके साथी युवा उन्हें सम्मानपूर्वक “शंभुजी” कहकर संबोधित करते थे।
बाद के वर्षों में शंभु कानू अपनी संघर्षशील आवाज़ को पहले की तरह व्यापक रूप से आगे नहीं बढ़ा सके। शारीरिक अस्वस्थता और अन्य अनेक कारणों से वे धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से दूर होते गए। अंततः 21 फ़रवरी 1996 को उनका निधन हो गया।
उनके ज्येष्ठ पुत्र डॉ. स्वपन कुमार कानू आज बराक घाटी के चाय समुदाय के प्रतिष्ठित चिकित्सकों में गिने जाते हैं। रोग की सही पहचान करने में उनकी विशेष दक्षता की चर्चा लोगों में होती है। वे अनेक रोगियों का निःशुल्क उपचार ही नहीं करते, बल्कि आवश्यक दवाइयाँ भी उपलब्ध कराते हैं।
मृत्यु तो अवश्यंभावी है, किंतु किसी व्यक्ति के विचार और लोककल्याणकारी कार्यों की स्मृतियाँ लोगों के हृदय में सदैव जीवित रहती हैं। वे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती हैं, उनका उत्साह बढ़ाती हैं और उन्हें समाजहित में कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं।
मेरा मानना है कि श्रमिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को शंभु कानू के साहस, संघर्षशीलता और संगठन कौशल से युवाओं को परिचित कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। जिन्होंने इस समाज की जागृति और अधिकारों के लिए निर्भीक होकर हर कठिनाई का सामना किया, उनकी व्यक्तिगत कमियाँ हो सकती हैं, परंतु समाज के व्यापक हित में उनके गुणों का ही अनुसरण आवश्यक है। प्रत्येक समाजसेवी व्यक्ति को स्वयं को इसी दिशा में प्रेरित और तैयार करना चाहिए।
(साभार श्रमिक पाक्षिक)