असम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की बड़ी उपलब्धि: पीसीओएस जांच के लिए ‘हॉर्मोन मैपिंग डायग्नोस्टिक रिंग’ को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से आईपीआर प्रमाणन

असम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की बड़ी उपलब्धि: पीसीओएस जांच के लिए ‘हॉर्मोन मैपिंग डायग्नोस्टिक रिंग’ को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से आईपीआर प्रमाणन

शिलचर, 7 मार्च: असम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एक अभिनव डायग्नोस्टिक उपकरण “हॉर्मोन मैपिंग डायग्नोस्टिक रिंग डिवाइस” को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से आईपीआर (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट) प्रमाणन प्राप्त हुआ है। यह नई तकनीक पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) जैसी जटिल हार्मोनल बीमारी की पहचान और उपचार के तरीके को अधिक सटीक और व्यक्तिगत बनाने में मदद कर सकती है।

यह महत्वपूर्ण शोध असम विश्वविद्यालय के जीवन विज्ञान एवं बायोइन्फॉर्मेटिक्स विभाग के वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास का परिणाम है। इस शोध टीम का नेतृत्व विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शुभदीप रॉयचौधरी ने किया, जबकि पीएचडी शोधार्थी अन्वेशा डे और संदीपन दास ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डॉ. रॉयचौधरी के अनुसार, वर्तमान में पीसीओएस की पहचान की प्रक्रिया कई बार औसत आंकड़ों पर आधारित होती है, जिसके कारण कई महिलाओं में हार्मोन के सूक्ष्म उतार-चढ़ाव का सही आकलन नहीं हो पाता। यही कारण है कि कई मामलों में बीमारी की सटीक पहचान देर से हो पाती है।

नव विकसित हॉर्मोन मैपिंग डायग्नोस्टिक रिंग तीन प्रमुख हार्मोन— ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH)फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन (FSH) और इंसुलिन—के स्तर को मापने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम है। इन महत्वपूर्ण बायोमार्करों के आधार पर यह उपकरण शरीर में होने वाले सूक्ष्म हार्मोनल परिवर्तनों का पता लगा सकता है, जो पारंपरिक जांच पद्धतियों में अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक पीसीओएस के निदान को अधिक सटीक और व्यक्तिगत बना सकती है, जिससे मरीजों को बेहतर उपचार योजना तैयार करने में सहायता मिलेगी।

आईपीआर प्रमाणन मिलने के बाद असम विश्वविद्यालय की शोध टीम अब क्लिनिकल ट्रायल और इसके व्यावसायिक उपयोग (कमर्शियलाइजेशन) के लिए संभावित साझेदारों की तलाश कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह तकनीक व्यापक स्तर पर लागू होती है तो पीसीओएस से जूझ रही लाखों महिलाओं के लिए यह एक नई उम्मीद और अधिक स्पष्ट निदान का रास्ता खोल सकती है।

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