अद्भुत अलौकिक, अविस्मरणीय 

जगन्नाथ धाम में मातृशक्तियों का अद्भुत दृश्य 

– भावना सक्सेना 

कल एकादशी की शाम जगन्नाथ पुरी में थी। भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने मंदिर पहुँचे तो अत्यंत भीड़ थी। लेकिन उस भीड़ के बीच भी न जाने कैसे, बहुत देर तक प्रभु के सम्मुख खड़े रहने का अवसर मिला। मन तृप्त था और हृदय में एक अनकहा संतोष था।

दर्शन के बाद प्रसाद लिया। आनंद बाज़ार के एक ओर मंदिर के सिंहद्वार के पास की दीवार की ओर देखा तो कुछ लोग एकत्र दिखाई दिए। दीवार के उस पार से ढोल-नगाड़ों की आवाज़ आ रही थी। उत्सुकतावश मैं भी उस ओर चली गई…और फिर जो देखा, वह अविस्मरणीय था!

जहाँ तक दृष्टि जा रही थी मेरे सामने एक के बाद एक पच्चीस से अधिक भव्य प्रतिमाएँ कतारबद्ध खड़ी थीं। माँ दुर्गा का तेजस्वी स्वरूप, माँ सरस्वती की सौम्यता, शक्ति स्वरूपा की अद्भुत छवियाँ। सभी प्रतिमाएँ इतनी भव्य, इतनी सुंदर और इतनी रमणीय थीं कि दृष्टि बंध गई। उनकी सज्जा, उनके रंग, उनके स्वरूप और वातावरण में गूँजते ढोल-नगाड़ों और महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के स्वरों ने मिलकर एक ऐसा दृश्य रच दिया था, जिसकी भव्यता को शब्दों में बाँधना कठिन है। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। आँखों में पानी था… सामने आस्था का विराट उत्सव साकार हो रहा था। वह दृश्य किसी स्वप्नलोक-सा अलौकिक, अद्भुत था, मानो स्वर्गिक सौंदर्य से सजा हुआ।

कुछ देर तक उस दृश्य को अपलक देखती रही। फिर पास खड़ी एक ओड़िया महिला से पूछा, “यह कौन-सा उत्सव है?”

उन्होंने बताया कि इसे गोशाणी जात्रा कहते हैं। दुर्गा पूजा के बाद, एकादशी के दिन, पुरी की गलियों और मोहल्लों में स्थापित देवियों की प्रतिमाएँ विसर्जन से पहले यहाँ एकत्र होती हैं। वे सभी भगवान जगन्नाथ के सिंहद्वार के सामने आती हैं, अपने आराध्य को प्रणाम करती हैं और फिर विसर्जन के लिए जाती हैं।

उन्होंने इसे बहनों का मिलन बताया, मातृशक्ति का अपने आराध्य के सम्मुख एकत्र होना और भगवान जगन्नाथ की महिमा तथा उनके स्वामित्व को नमन करना।

यह सुनकर उस दृश्य का अर्थ मेरे लिए और भी गहरा हो गया।

विचार उठा, कितनी अद्भुत है यह परंपरा! एक ओर शक्ति के इतने भव्य, तेजस्वी स्वरूप; दूसरी ओर जगत के नाथ, जिनके सम्मुख वे सभी नतमस्तक होने आई हैं। यह दृश्य केवल प्रतिमाओं का एकत्र होना नहीं था। इसमें बहनों के मिलन की आत्मीयता थी, अपनी परंपरा के प्रति श्रद्धा थी और अपने आराध्य के प्रति समर्पण का भाव।

मंदिर के भीतर मोबाइल फोन और कैमरे ले जाने की अनुमति नहीं है। इसलिए इस अद्भुत दृश्य को कैमरे में कैद करने का तो प्रश्न ही नहीं था। लेकिन शायद कुछ दृश्य तस्वीरों में कैद होने के लिए होते भी नहीं। वे सीधे हृदय में उतर जाते हैं और वहीं हमेशा के लिए अंकित हो जाते हैं। गोशाणी जात्रा का यह अलौकिक, स्वर्ग-सा सुंदर दृश्य भी मेरे हृदय-पटल पर सदा के लिए अंकित हो गया है।

कभी-कभी प्रभु हमें बिना माँगे कुछ ऐसा दे देते हैं, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। भगवान जगन्नाथ के दर्शन के बाद यह जो देखने का अवसर मिला, वह ऐसा ही अप्रत्याशित प्रसाद था। जैसे जगन्नाथ धाम ने अपने वैभव का एक और द्वार मेरे सामने खोल दिया हो।

उस क्षण मन में बस एक ही भाव था- कितनी समृद्ध हैं हमारी आस्थाएँ, कितनी विराट हैं हमारी परंपराएँ और कितने विविध रूपों में हमारी संस्कृति अपने आराध्य से जुड़ती है!

जगन्नाथ पुरी से लौटते हुए मन में भगवान के दर्शन की स्मृति तो है ही, लेकिन सिंहद्वार के सामने कतारबद्ध खड़ी उन मातृशक्तियों का दृश्य सदा के लिए मन में अंकित हो गया है।

कल की शाम मैंने केवल देवियों की भव्य प्रतिमाएँ नहीं देखीं; मैंने आस्था को अपने आराध्य के सम्मुख नतमस्तक होते देखा। वह दृश्य अद्भुत था, अविस्मरणीय था और मेरे लिए किसी स्वर्गिक अनुभूति से कम नहीं था।

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