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गंगा, यमुना और सरस्वती नदीयों के संगम-तीरे बसा है ‘प्रयागराज’. असम में बसा है काकोडांगा, मोकरोंग और गिलाधारी नदीयों के संगम- तीरे हमारा असम प्रसिद्ध नामघर ‘अठखेलिया ‘
( शहर गोलाघाट के नजदीक) .
कभी हरिमंदिर कहलाने वाला पूजा स्थल अब बन गया है,असम प्रसिद्ध “श्री श्री अठखेलिया नामघर.”।
माना जाता है कि “ल’रा राजा” से भयातुर एवं अपनी प्राण रक्षा हेतु ‘गदापानी’ ने यहीं जंगलों, हाबीयों एवं नजदीकी नगालैंड की पहाड़ियों में,छिपकर फिरते रहे एवं अपनी प्राण रक्षा की थी.(काल चक्र को देखते हुए यह घटना यही कोई १७००ई.के इस पास की लगती है ).
भय- मुक्त होने के पश्चात् आहोम राजा गदापानी ने ही हरि मंदिर के स्थान पर नये रुप से नामघर की स्थापना की जो वैष्णव धर्म के उपासकों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, उक्त हरि मंदिर आज अठखेलिया नामघर के नाम से संपूर्ण असम में विख्यात है.
अठखेलिया नाम के अंदर छिपा महत्व कुछ इस प्रकार है—आठ खेला,खेला अर्थात् आठ परिवार जो खेला करते थे, देखभाल एवं ब्यवस्था बनाये रखने का कार्य करते थे ये एक प्रकार से राजघरीया अर्थात् राजकीय प्रबन्धन से जुड़े लोग हुआ करते थे,इन आठ परिवार के लोगों के प्रबन्धन के चलते ही इस नामघर का “अठखेलिया नामघर” नाम हुआ.
नामघर के नजदीक ही यात्रीयों के लिए अतिथीशाला भी उपलब्ध है.
यात्रियों को वहां पूर्ण अनुशासन का पालन करना होता है, पोशाक भी पूर्ण अनुशासित है, हां लगे हाथों बताना चाहूंगा कि मर्दों के लिए किराये पर भी पोशाक उपलब्ध हैं फिर भी वहां जाने के लिए धोती कुर्ता, कुर्ता पायजामा पहनकर जाना ही ज्यादा श्रेयस्कर रहता है। महिलाओं को भी मर्यादित पोशाक ही धारण करनी होती है .
समयानुसार प्रसाद भी उपलब्ध है . संक्षेप में कहें तो यात्रियों की हर सुविधा की सुचारू व्यवस्था है.भादो माह में विशेष रूप से दर्शन,पूजन, प्रसाद आदि की ब्यवस्था अति सुन्दर एवं प्रशंसनीय है।
भादों मास के अलावा भी यात्रीयों का आवागमन पूर्ण ब्यवस्थित रहता है.
जब जी चाहे मानसिक शांति हेतु हम असमवासी रुख कर लेते हैं किसी भी नामघर की ओर एवं धन्य होते हैं जीवन में.
मुरारी केडिया
९४३५० ३३०६०.