तिनसुकिया: बारेकुरी क्षेत्र की समृद्ध कृषि विरासत, स्वदेशी संसाधनों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से शनिवार को पुरोनी मोटापुंग में कृषि-जैव विविधता मेले का आयोजन किया गया। यह मेला असम कृषि विश्वविद्यालय (एएयू) के तिनसुकिया स्थित साइट्रस एंड प्लांटेशन क्रॉप्स रिसर्च स्टेशन (सीपीसीआरएस) के मार्गदर्शन में ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव कार्यक्रम (रावेप) के विद्यार्थियों द्वारा आयोजित किया गया।
मेले में ६० से अधिक किसानों ने भाग लिया। प्रदर्शनी में विभिन्न प्रकार की स्थानीय कृषि एवं जैविक संपदाओं को प्रदर्शित किया गया, जिनमें पारंपरिक पत्तेदार एवं जड़ वाली सब्जियां, औषधीय एवं सुगंधित पौधे, पारंपरिक और उन्नत धान की किस्में, मीठे पानी की मछलियां, केकड़े तथा पारंपरिक मछली पकड़ने के उपकरण शामिल थे।
प्रदर्शनी में स्थानीय खाद्य विरासत और ग्रामीण उद्यमिता को भी विशेष स्थान दिया गया। इस दौरान स्थानीय स्तर पर तैयार आम और बांस की कोपलों के अचार के साथ-साथ जलकुंभी से निर्मित हस्तनिर्मित मूल्यवर्धित उत्पाद प्रदर्शित किए गए। इसके अलावा जैस्मिन टी, मोरान खिलांग, ऑर्थोडॉक्स, ब्लू, ग्रीन और व्हाइट टी सहित चाय की विभिन्न किस्में भी प्रदर्शित की गईं। पारंपरिक वस्त्र निर्माण उपकरणों तथा कोमल नर्सरी द्वारा प्रदर्शित पुष्प एवं बागवानी पौधों ने भी प्रदर्शनी को आकर्षक बनाया।
मेले का एक प्रमुख आकर्षण खासी मंदारिन, असम लेमन, पोमेलो, रफ लेमन और एसिड लाइम सहित विभिन्न खट्टे फलों की किस्मों का प्रदर्शन रहा। विशेष रूप से खासी मंदारिन पर जोर दिया गया, जिसके लिए बारेकुरी क्षेत्र व्यापक रूप से जाना जाता है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से स्थानीय साइट्रस आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग के महत्व को रेखांकित किया गया।
कार्यक्रम में एएयू-सीपीसीआरएस, तिनसुकिया के वैज्ञानिक डॉ. मोनुज गोगोई, डॉ. प्रियंका बरबोरुआ और डॉ. जाह्नबी हजारिका, रेशम विभाग के अधिकारी नृपेन पाडी तथा पूर्व प्रधानाध्यापक खिरेश्वर चुटिया उपस्थित थे।
इस मेले ने किसानों, विद्यार्थियों और अन्य हितधारकों को पारंपरिक ज्ञान के आदान-प्रदान, स्वदेशी संसाधनों की संभावनाओं को समझने तथा ग्रामीण आजीविका को बेहतर बनाने में उनकी भूमिका पर विचार-विमर्श करने के लिए एक साझा मंच प्रदान किया।
इस पहल से रावेप के विद्यार्थियों को स्थानीय कृषि जैव विविधता, पारंपरिक कृषि पद्धतियों और सामुदायिक स्तर पर संरक्षण के तरीकों का दस्तावेजीकरण करने का व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम का समापन कृषि जैव विविधता के संरक्षण, संवर्धन और सतत उपयोग पर जोर देने के साथ हुआ। वक्ताओं ने इसे पारिस्थितिक संतुलन, ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा और कृषि विकास को अधिक सक्षम एवं टिकाऊ बनाने का महत्वपूर्ण आधार बताया।