तिब्बत को चीनी भूभाग के रूप में मान्यता क्यों ?

 – ई0 प्रभात किशोर

अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक के भारतीय क्षेत्रों पर चीन का बेहयाई दावा और भारतीय नेताओं की सीमावर्ती क्षेत्रों की यात्राओं पर बार-बार पूर्व नियोजित आपत्तियां कोई नई बात नहीं हैं। चीनी साम्राज्यवादियों   का प्रोपेगेंडा सेल सिर्फ मामले को जीवित रखने की दृष्टि से ऐसा करती रहती है। चीन ने उपराष्ट्रपति की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर भी आपत्ति जताई और इस राज्य को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताते हुए तोता के रट्ट की भांति अपनी पूर्व के दावों को दोहराया । समय-समय पर चीन अपने मानचित्र में भारतीय क्षेत्रों का नाम बदलकर भी आत्मविभोर होते रहता है । हालाँकि, दुनिया कभी भी चीन और पाकिस्तान जैसे देशों से अपने पड़ोसी देशों के क्षेत्रों का सम्मान करने की उम्मीद नहीं करती है। परन्तु इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक भारत सरकार की नीति है।

यदि चीन भारतीय भूभाग के मौजूदा अभिन्न हिस्सों को मान्यता नहीं देता  है और खुले तौर पर उन पर दावा करता है, तो फिर भारत सरकार ने चीन द्वारा अवैध रूप से हथियाए गए तिब्बती क्षेत्रों को मान्यता क्यों प्रदान कर रखी है? यदि चीन ने अपने आधिकारिक मानचित्र में भारतीय क्षेत्रों को शामिल कर लिया है, तो भारत तिब्बती क्षेत्रों को एक स्वतंत्र राष्ट्र या सहयोगी राज्य के रूप में अपने मानचित्र में शामिल करने में पीछे क्यों है? यह सार्वभौमिक सत्य है कि तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र था जिसका भारत के साथ समृद्ध सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध रहा है । तिब्बती नागरिक महाभारत काल के कौरव सेनापति रूपाती के वंशज हैं। चूंकि तिब्बत स्वयं चीन का कभी हिस्सा नहीं रहा है, तो फिर चीन उन भारतीय क्षेत्रों पर दावा कैसे करता है, जो तिब्बत की सीमा के दूसरी ओर स्थित हैं? भारत का ल्हासा में राजनयिक मिशन था, जो सन् 1952 में एक वाणिज्य दूतावास के रूप में अवक्रमित कर दिया गया और अंततः 1962 के युद्ध के बाद बंद कर दिया गया। चीनी के खुनी पंजे से तिब्बत की स्वतंत्रता भारतीय सीमा की सुरक्षा, क्षेत्रीय शांति और भारी सैन्य व्यय की बचत के हित में है। सन् 1950 से पहले, व्यापार मार्गों की रक्षा के लिए तिब्बत में भारतीय सैन्य बलों की तैनाती की जाती थी। सन् 1950 में, नव स्थापित चीनी कम्युनिस्ट शासन ने तिब्बती भूभाग को  चीन का स्थायी हिस्सा बनाने के लिए उसपर आक्रमण किया, जिसके कारण भारत को अपनी सीमाओं की रक्षा हेतु इसके सैन्यीकरण के लिए मजबूर होना पड़ा।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अपनी मृत्यु से एक महीने पहले, 7 नवंबर 1950 को अस्पताल की शय्या से अपने पत्र में सरदार पटेल ने नेहरू और राष्ट्र को तिब्बत में चीनी हस्तक्षेप और भारत-तिब्बत सीमाओं की सुरक्षा के बारे में आगाह किया था। उन्होने अपने सारगर्भित पत्र में लिखा है कि तिब्बती लोगों ने सदैव हम पर विश्वास किया है, उन्होंने हमारे द्वारा बताए मार्ग पर चलना पसंद किया है, परन्तु आज हम उन्हें चीनी कूटनीति और चीनी द्वेष के जाल से बाहर निकालने में असमर्थ रहे हैं। उत्तर और उत्तर-पूर्व में, कम्युनिस्ट चीन की निश्चित महत्वाकांक्षाएँ और रणनीतियां हैं, जो हमारे प्रति उनके मित्रवत व्यवहार का परिचायक नहीं हैं। इसलिए भारत को चीनी से संभावित खतरे से निबटने हेतु सशक्तं सैन्य नीति बनानी होगी । लेकिन उनकी मृत्यु के बाद, नेहरू और उनके साथी एक दशक से अधिक समय तक चीन के झुठे आडम्बर से तब तक मोहित रहे, जब तक कि सन् 1962 में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए)  ने बेखबर  भारतीय सीमा को रौंद नहीं दिया।

सन् 1950 के दशक में, नेहरू के नेतृत्व में भारत संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट पर माओ के नेतृत्व में नवागंतुक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) के प्रवेश के लिए एक कट्टर समर्थक की भूमिका में था । उस समय यह सीट  काई शेक च्यांग के नेतृत्व वाले चीन गणराज्य (ताइवान) के कब्जे में था और संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश माओ के पीआरसी को संयुक्त राष्ट्र की सीट से वंचित करने हेतु प्रयासरत थे । परन्तु अपनी व्यक्तिगत आभामंडल के चक्कर में नेहरू ने माओ के कम्युनिस्ट चीन का असली चेहरा पढ़ने से इनकार कर दिया। एक तरफ पीएलए के सैनिक तिब्बत में तबाही मचाने में व्यस्त थे, दूसरी तरफ कांग्रेस सरकार चीनी सरकार के अनुरोध पर ल्हासा को हजार टन चावल की आपूर्ति कर रही थी, जिसका इस्तेमाल हमलावर सैनिकों के द्वारा किया गया।

प्रारंभ में तिब्बत में चीन के पैर जमाने के लिए कांग्रेस और कम्युनिस्ट दलों के राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदार थे। तिब्बत पर चीन की संप्रभुता को भारत की मान्यता सबसे बड़ी सुरक्षा भूल थी। भारतीय कम्युनिस्टों का एक बड़ा वर्ग चीन की विचारधारा को आत्मसात करने हेतु इस कदर पागल था कि सन् 1962 में भारत पर चीनी के विश्वासघाती हमले की उन्होंने निंदा तक नहीं की और बाद में सन् 1964 में चीनी समर्थक नए राजनीतिक संगठन सीपीआई (माक्सवादी) का गठन किया। आज की पीढ़ी इस तथ्य से अनजान है कि कैलाश पर्वत के पास एक भारतीय क्षेत्र “मीनेसर” है, जो चारों ओर तिब्बती क्षेत्रों से घिरा हुआ है और लद्दाख का हिस्सा रहा है। तिब्बत के विलय के बाद इस क्षेत्र पर भी चीन का कब्जा हो गया, लेकिन न तो केंद्र सरकार और न ही किसी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन ने इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाने का कष्ट किया। इस ऐतिहासिक क्षेत्र को अपने आधिकारिक मानचित्र में शामिल करना भारत सरकार का कर्तव्य है।

चीन एक भूमि-अतिक्रमणकारी देश है जिसने न केवल भारत के 38000 वर्ग किमी से अधिक भूभाग पर कब्जा कर रखा है, बल्कि अपने 18 पड़ोसी देशों के कुछ हिस्सों पर या तो धोखे से हड़प चुका है या चीनी भूभाग होने का दावा कर रहा है। इस कारण भारतीय सीमा के एक-एक पग पर सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था की जानी चाहिए तथा भारत के राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक नेताओं को अपने मूल निवासियों के साथ लगातार संपर्क में बने रहना चाहिए। अंतहीन बातचीत से कुछ होने वाला नहीं है तथा चीन एवं पाकिस्तान हथियाए गए भारतीय भूभाग को चाय के एक प्याले की तरह आतिथ्य-सत्कार के तौर पर परोसने वाले नहीं हैं। सम्पूर्ण वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्रों के लिए एक प्रभावी नीति समय की आवश्यकता है, जिसमें मूल निवासियों को आवश्यक सैन्य प्रशिक्षण के साथ-साथ सेवानिवृत्त सैनिकों की बस्तियां बसाना भी शामिल होना चाहिए।

भारतीय क्षेत्रों के प्रति चीन की साजिश से निबटने के लिए  भारत को जैसे को तैसा की रणनीति अपनानी होगी  और तिब्बती भूभाग को चीनी हिस्से के रूप में मान्यता समाप्त करते हुए इसे पाकिस्तान-अधिकृत- कश्मीर (पीओके) की तर्ज पर चीन-अधिकृत-तिब्बत (सीओटी) के नाम से बफर स्टेट के रूप में मान्यता प्रदान करनी होगी।  साथ हीं, आधिकारिक भारतीय मानचित्र को अब तक भूला दिए गए “मीनेसर “ क्षेत्र को भी सम्मिलित करते हुए परिमार्जित किया जाना चाहिए। हमारे साथ मूल समस्या यह है कि चीन और पाकिस्तान जैसे देश कार्रवाई करते हैं, लेकिन भारत केवल प्रतिक्रिया भर देता है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जब भी भारतीय शासकों ने आक्रामक नीति अपनाई, उन्होंने लगभग सभी वर्तमान पड़ोसी देशों पर शासन किया । लेकिन जब कभी उन्होंने रक्षात्मक नीति अपनायी, तो आंतरिक और बाहरी ताकतों ने उन पर काबू पा लिया। तदनुसार देश की संप्रभुता के लिए, भारत को नेहरू की वर्तमान रक्षात्मक नीति के बजाय पटेल की आक्रामक रणनीति के साथ अपने कदम आगे बढ़ाना होगा।

(लेखक एक अभियंता और शिक्षाविद हैं। उन्होंने एम.एन. रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, इलाहाबाद/प्रयागराज से इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की है)

Leave a Comment