“ प्रिय यक्ष, जाति के बारे में सुनो, ब्राह्मण पद का कारण न तो अध्ययन है और न ही विद्वता। आचरण ही ब्राह्मण का आधार है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं। फिर यदि जन्म से ही जाति का निर्धारण होता , तो सभी को ब्राह्मण होना चाहिए। क्यूंकी सभी मनुष्यों का एक ही पिता है – प्रजापति या भगवान, सबका स्वामी।” (महाभारत ३१२. १०६; शुक्र नीति अध्याय १ )
उपरोक्त आधार पर कहा जा सकता है सब के लिए एक संभावना समान रूप से उपलब्ध है कि आचरण के श्रेष्ठ होने मात्र से कोई भी उच्च अवस्था को प्राप्त कर सकता है।
अपने श्रेष्ठ आचरण से कोई कैसे ब्रह्मऋषि बन जाता है इसका उज्ज्वल उदाहरण हैं, श्री वाल्मीकि। महर्षि कश्यप के पुत्र वरुण इनके पिता; और भाई, भृगु ऋषि थे।
श्री वाल्मीकि का मूल नाम रत्नाकर था। वो अचूक निशाना साधने में पारंगत एक शिकारी थे। अपने परिवार के भरण पोषण के लिए जंगल के पशु-पक्षी का शिकार करते , डकैती डालते और जरूरत पड़ जाए तो सामने वाले को मौत के घाट भी उतार देते। गाँव से गुजरने वाले को मौका पाकर घात लगा के सब कुछ छीन लेने से नहीं चूकते ।
लेकिन नारद ऋषि से हुई भेंट , जीवन की दिशा बदल डालने वाली सिद्ध हुई। ब्रह्म चिंतन में ऐसे लीन हुए कि देह का भी आभास न रहा। यहाँ तक कि तपस्या पूर्ण हो जब बाहर निकले तो ‘दीमक के वाल्मीकि’ ने इन्हें घेर रखा था। तभी इनका नाम वाल्मीकि पड़ा।
अब वो धर्म अभिमुख तपस्वी के रूप में समाज के सामने थे। एक बार वाल्मीकि जी ने तपस्या और स्वाध्याय में लीन नारद जी से पूछा : ‘ समदर्शी , लोक- हितैषी , गुणवान, मर्यादाओं- कर्तव्यों के पालनकर्ता , वीर , धर्मज्ञ जैसे गुणों से वो कौन युक्त है जिस पर में लिखूँ ?’ नारद जी से जो उनको उत्तर मिला उसके परिणाम के रूप में उनके द्वारा रचित ‘रामायण’ हमारे सामने है . जिसे कि भूतल के प्रथम काव्य के रूप में मान्यता मिली। और जिसको तुलसीदास जी ने लोक भाषा में अनुवाद कर ‘रामचरित्र मानस’ के रूप में सर्व सुलभ बनाया.
दशमेश गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित दशम ग्रंथ में वाल्मीकि जी को ब्रह्मा का प्रथम अवतार कहा गया है । लक्ष्मण जी जब सीताजी को उनके आश्रम में छोड़ने आए तो वाल्मीकि जी ने आव्हान किया , ‘ मैं प्राचेतस का दसवां पुत्र हूँ । तुम और राम लोकनिंदा से डरते हो । सीता यहाँ गर्भवती आयी है। ये सर्वथा निर्दोष है। इसे मैं प्रमाणित करूंगा।’ आगे उन्होंने लव-कुश को अपने सानिध्य में शस्त्र-शास्त्र-संगीत से शिक्षित किया। महर्षि वाल्मीकि ने ही सर्वसमावेशक ‘मध्य-मार्ग’ को समाज- रचना में मान्यता प्रदान करी। इसी मार्ग को गौतम बुद्ध ने ‘मझिझम-प्रतिपदा’ कहकर उसे ‘स्वर्णिम-मार्ग’ के रूप में प्रतिपादित क्या है। आज स्वछता के अपरिहार्य कार्य में लगा वाल्मीकि समाज भगवान वाल्मीकिजी को अपना इष्ट-देव के रूप में पूजता है। इसलिए वाल्मीकि जी को समरसता के वाहक के रूप में भी याद किया जाता है।
रामायण के रचयिता वाल्मीकि जी के जीवन के इस प्रबल पक्ष को ध्यान में रख महर्षि वाल्मीकि मंदिर के साथ ही अयोध्या स्थित राम-मंदिर परिसर में निषादराज गुह , और माता शबरी का मंदिर प्रस्तावित हैं . इसी प्रकार रामजन्म भूमि पर विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा आयोजित शिलान्यास भी अनुसूचित जाति के श्रीपाल के द्वारा पूर्ण हुआ था
बाबासहाब अंबेडकर कहते हैं : ‘ब्रह्मवाद के तीन महावाक्य है ; एक , ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है ; दो, ईसलिए मैं बहम ही हूँ; तीन, इसलिए आप भी ब्रह्म हैं। ये सब एक जीविता अथार्थ समता व स्वतंत्रता के तत्व हैं। हिन्दू धर्म अन्य आस्थाओं से कई गुना समता का पोषक है। सब ईश्वर के रूप हैं, यह इस महान हिन्दू धर्म का ओजस-तत्व है।’ लेकिन पीढ़ा की बात ये है, जो समाज जिस हिन्दू धर्म का अपने को बताता है उसका सामाजिक आचरण जाति-भेद से ग्रस्त उसके बताए मार्ग से भिन्न रहा है। और देश के कुछ भाग और ज्यादातर गांव इस दुष्प्रवृति से आज भी अपना पीछा नहीं छुड़ा सके हैं। अपने-अपने स्तर पर इससे मुक्ति के प्रयत्न भी चल रहे हैं।
ऐसा ही एक प्रसंग भोपाल इंदोर मार्ग पर स्थित जिला केंद्र सीहोर में देखने में आया। पिछले वर्ष रामनवमी के अवसर पर यहाँ वाल्मीकि बस्ती के निवासीयों ने सहभोज (भंडारा) का आयोजन किया। इस बस्ती में ज्यादातर स्वच्छता-कर्मी निवास करते हैं। आयोजन को गरिमामय मनाने हेतु समाज के प्रमुख लोगों ने ‘रुद्राक्ष-पूजा’ और ‘शिव जल-अभिषेक’ के जन-प्रेरणा स्त्रोत अंतर्राष्ट्रीय कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्र से संपर्क किया। पंडित प्रदीप मिश्र ने आयोजन में शामिल होने की सहमति प्रदान करी। पंडित मिश्र वाल्मीकि बस्ती स्थित मंदिर में आरती में शामिल हो, समाज के लोगों से मिल-जुलकर प्रसाद ग्रहण कर वापस निकल गए। बाद में पंडित प्रदीप मिश्र के साथ आए डॉक्टर अमित मोदी, डॉक्टर गगन नामदेव, पांडित्य-कर्म को सम्पन्न करने वाले प. गणेश शर्मा सहित अन्य लोगो नें बस्ती में रुक कर मंदिर में कन्यायों की पूजा कर उन्हें भोजन ग्रहण करवाया। और अंत में सहभोज में शामिल हो स्वयं भोजन ग्रहण किया।
इंजी. राजेश पाठक
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