सामाजिक एकता से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण

राजनीतिक स्वार्थ और सस्ती लोकप्रियता के लिए समाज में विभाजन पैदा करना लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतिकूल

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सामाजिक एकता और सद्भाव बनाए रखना केवल नैतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्थिरता की अनिवार्य शर्त है। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की विविधताओं के बावजूद भारतीय समाज की एकजुटता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति रही है। ऐसे में यदि राजनीतिक स्वार्थ, वोटों की लालसा और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए इन विविधताओं को विभाजन का आधार बनाया जाता है, तो यह देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने वाला कदम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए इसी विषय पर ध्यान आकर्षित किया। उनका यह कहना महत्वपूर्ण है कि समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन करना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलनों के माध्यम से समाज में फूट पैदा करना उचित नहीं है।

लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अपना महत्व है। जनता को शासन की नीतियों का विरोध करने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और व्यवस्था में सुधार की मांग करने का अधिकार है। लेकिन इन अधिकारों के उपयोग की भी संवैधानिक मर्यादा है। किसी आंदोलन की सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे समस्या के समाधान की दिशा में कितनी प्रगति हुई, न कि इस आधार पर कि उसने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच कितना तनाव उत्पन्न किया। दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई बार जनहित के मुद्दे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन जाते हैं और मूल समस्या पीछे छूट जाती है।

राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे जनभावनाओं को भड़काने के बजाय उन्हें रचनात्मक दिशा दें। चुनावी लाभ के लिए जातीय और धार्मिक पहचान को उभारना तत्काल राजनीतिक फायदा पहुंचा सकता है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम सामाजिक अविश्वास और कटुता के रूप में सामने आते हैं। लोकतंत्र में सत्ता प्राप्त करना महत्वपूर्ण हो सकता है, किंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक सौहार्द और नागरिकों के परस्पर विश्वास को बनाए रखना। शासन-प्रशासन पर भी यह दायित्व है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए निष्पक्षता से काम करे तथा प्रत्येक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे।

डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में भारत की विविधता के बीच एकता को राष्ट्रीय जीवन का आधार बताया। वास्तव में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्श इसी भावना को पुष्ट करते हैं। ‘हम भारत के लोग’ की अवधारणा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय राष्ट्र की पहचान किसी एक भाषा, क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं है। हमारी राष्ट्रीय एकता तभी मजबूत हो सकती है, जब विविधताओं का सम्मान हो और प्रत्येक नागरिक को समान गरिमा तथा अवसर प्राप्त हों। एकता का अर्थ मतभेदों का अभाव नहीं, बल्कि मतभेदों के बावजूद संवाद और सहअस्तित्व की भावना बनाए रखना है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि समाज की सभी समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी केवल सरकार पर नहीं छोड़ी जा सकती। शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में नागरिकों तथा सामाजिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। ग्रामीण विद्यालयों में समुदाय की सहभागिता से सुधार के उदाहरण इस बात को रेखांकित करते हैं कि स्थानीय स्तर पर सामूहिक प्रयास प्रभावी परिवर्तन ला सकते हैं। हालांकि, ऐसे प्रयासों की सफलता का वास्तविक आकलन उनके परिणामों, पारदर्शिता और समाज के सभी वर्गों तक पहुंच के आधार पर किया जाना चाहिए।

नई पीढ़ी के सामने डिजिटल माध्यमों से फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं और नशीले पदार्थों की बढ़ती प्रवृत्ति जैसी चुनौतियां भी गंभीर हैं। इनके समाधान के लिए केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं होंगे। शिक्षा, जागरूकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सही-गलत का विवेक विकसित करना भी जरूरी है। युवाओं में चरित्र-निर्माण का महत्व तभी सार्थक होगा, जब उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने, संविधान का सम्मान करने और सामाजिक विविधता को स्वीकार करने की प्रेरणा मिले।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर सामाजिक सेवा और संगठन की भूमिका पर दिया गया जोर इस व्यापक प्रश्न को भी सामने लाता है कि सामाजिक संगठनों का योगदान किस प्रकार राष्ट्र निर्माण को मजबूत कर सकता है। किसी भी संगठन के कार्यों का मूल्यांकन उसके वास्तविक सामाजिक योगदान, सेवा गतिविधियों और सार्वजनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। इसी प्रकार उसकी आलोचना भी तथ्यों और तर्कों पर आधारित होनी चाहिए। स्वस्थ लोकतंत्र में न अंधसमर्थन उचित है और न ही पूर्वाग्रहपूर्ण विरोध।

विजयादशमी का पर्व मर्यादा, कर्तव्य और अन्याय पर न्याय की विजय का संदेश देता है। आज इस संदेश को सार्वजनिक जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है। राजनीतिक नेतृत्व, सामाजिक संगठनों और नागरिकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके शब्दों और कार्यों से सामाजिक तनाव बढ़ने के बजाय आपसी विश्वास मजबूत हो। राष्ट्रहित को चुनावी लाभ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर रखना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है।

स्पष्ट है कि सामाजिक समस्याओं का समाधान विभाजन और वैमनस्य से नहीं, बल्कि संवाद, न्यायपूर्ण व्यवस्था और सामूहिक प्रयासों से संभव है। भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है और उसकी प्रगति का आधार उस विविधता के बीच कायम एकता है। समय की मांग है कि राजनीति समाज को बांटने का नहीं, जोड़ने का माध्यम बने। सस्ती लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, लेकिन सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता ही देश के उज्ज्वल भविष्य की स्थायी नींव हैं।

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