जिस बेटे को बचपन में चोट लगती थी तो पिता की आँखों में आँसू आ जाते थे, उसी बेटे ने एक दिन पिता को अस्पताल के बाहर बैठाकर कहा— “पापा, आप हर छोटी बात के लिए मुझे फोन मत किया कीजिए… मेरी भी अपनी जिंदगी है।” पिता ने उस दिन जो जवाब दिया, उसे सुनकर बेटा जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाया।
रात के करीब साढ़े दस बजे थे।
अस्पताल के गलियारे में 62 साल के रघुनाथ प्रसाद एक बेंच पर बैठे थे। उनके दाहिने हाथ में जाँच की पर्चियाँ थीं और बाएँ हाथ में एक पुराना कपड़े का थैला।
थैले में दो केले, घर की बनी चार रोटियाँ और एक छोटी-सी डिब्बी में अचार रखा था।
उनका बेटा अमन शहर के बड़े अस्पताल में डॉक्टर था। उसी ने पिता को जाँच के लिए बुलाया था।
सुबह से कई बार अमन के कमरे के बाहर बैठने के बाद भी जब मुलाकात नहीं हुई, तो रघुनाथ ने एक नर्स से पूछ लिया, “बिटिया, मेरा बेटा कब खाली होगा? बस पाँच मिनट मिलना था।”
नर्स ने कहा, “बाबा, डॉक्टर साहब बहुत व्यस्त हैं। आप फोन कर लीजिए।”
रघुनाथ ने फोन लगाया।
“बेटा, मैं बाहर बैठा हूँ। डॉक्टर ने कुछ जाँचें और लिखी हैं। जरा बता देता तो…”
दूसरी तरफ से अमन की थकी हुई आवाज आई।
“पापा, मैंने आपको कितनी बार कहा है कि हर छोटी बात के लिए मुझे फोन मत किया कीजिए। आप पर्ची काउंटर पर दिखा दीजिए। मेरी भी अपनी जिंदगी है, हर वक्त आपके पीछे नहीं लगा रह सकता।”
रघुनाथ कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले, “अच्छा बेटा, परेशान मत हो। मैं पूछ लेता हूँ।”
फोन कट गया।
पास बैठे एक आदमी ने उन्हें देखा। शायद वह उनकी बात सुन चुका था।
उसने पूछा, “बाबा, आपका बेटा डॉक्टर है?”
रघुनाथ ने गर्व से सिर हिलाया।
“हाँ, साहब। बहुत बड़ा डॉक्टर है। बचपन में जब इसे बुखार आता था, तो मैं सारी रात इसकी चारपाई के पास बैठा रहता था। आजकल इसे मरीजों से फुर्सत नहीं मिलती।”
यह कहते हुए उनके चेहरे पर शिकायत नहीं, गर्व था।
—
अमन की जिंदगी आसान नहीं थी।
मेडिकल की पढ़ाई के दौरान उसके पिता ने अपनी पुश्तैनी जमीन का एक हिस्सा बेच दिया था। माँ के गहने पहले ही बिक चुके थे। रघुनाथ गाँव में छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे।
कई बार दुकान पर उधार माँगने वालों को मना कर देते, लेकिन बेटे की फीस के लिए खुद उधार लेने में उन्हें कभी शर्म नहीं आई।
जब अमन डॉक्टर बना, तो पूरे गाँव में मिठाइयाँ बाँटी गई थीं।
रघुनाथ ने उस दिन अपने दोस्त से कहा था, “मैंने जिंदगी भर लोगों का हिसाब लिखा है। अब मेरा बेटा लोगों की जिंदगी बचाएगा।”
लेकिन समय के साथ अमन की दुनिया बदल गई।
अस्पताल, मरीज, मीटिंग, अपना परिवार और शहर की जिम्मेदारियाँ—इन सबके बीच पिता के फोन उसे अक्सर एक अतिरिक्त बोझ लगने लगे।
पिता कभी बिजली का बिल पूछ लेते, कभी बैंक से आया कोई कागज समझने के लिए फोन कर देते, तो कभी सिर्फ यह पूछने के लिए कि उसने खाना खाया या नहीं।
अमन हर बार सोचता, पापा को थोड़ा आत्मनिर्भर होना चाहिए।
उसे यह समझ नहीं आता था कि जिस आदमी ने उसे हर कदम पर सहारा दिया, वह अब छोटी-छोटी बातों में भी उसी सहारे को ढूँढ़ता था।
—
उस रात जाँच के बाद रघुनाथ को कुछ घंटे अस्पताल में रुकने के लिए कहा गया।
सुबह अमन अपने कमरे से निकला तो उसने देखा कि पिता उसी बेंच पर बैठे हैं। थैला उनकी गोद में था और सिर दीवार से टिका हुआ था।
“पापा, आप अभी तक यहीं हैं?”
रघुनाथ तुरंत उठ खड़े हुए।
“हाँ बेटा। सोचा, तुम्हारी ड्यूटी खत्म हो जाएगी तो तुम्हारे साथ घर चला जाऊँगा।”
“आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
पिता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “रात को तुम परेशान थे न। सोचा, सुबह बात करूँगा।”
अमन ने उनकी रिपोर्ट देखी। डॉक्टर ने कुछ और जाँचें लिखी थीं और अगले सप्ताह फिर आने को कहा था।
अमन ने जल्दी में कहा, “ठीक है पापा, ये जाँचें करवा लीजिएगा। मुझे अभी राउंड पर जाना है।”
वह जाने लगा, तभी पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बेटा, एक बात पूछूँ?”
अमन ने घड़ी देखते हुए कहा, “पूछिए पापा।”
रघुनाथ ने धीमी आवाज में पूछा, “तुम्हारे अस्पताल में कोई ऐसा डॉक्टर है, जो बूढ़े लोगों को यह भी समझा दे कि बीमारी से ज्यादा डर उन्हें किस बात का लगता है?”
अमन रुक गया।
“क्या मतलब?”
पिता ने नजरें झुका लीं।
“बीमारी का डर तो है ही बेटा। लेकिन उससे ज्यादा डर इस बात का है कि कहीं मैं अपनी किसी जरूरत के लिए तुम्हें फोन करूँ और तुम्हें लगे कि तुम्हारा बूढ़ा बाप तुम्हारी जिंदगी में परेशानी बन गया है।”
अमन के पास कोई जवाब नहीं था।
रघुनाथ ने उसका हाथ छोड़ दिया।
“जाने दो बेटा। तुम अपना काम करो। मैं अब बिना जरूरत फोन नहीं करूँगा।”
वह धीरे-धीरे अस्पताल के दरवाजे की ओर बढ़ने लगे।
अमन उन्हें जाते हुए देखता रहा।
उसके सामने रोज ऐसे मरीज आते थे, जिनकी बीमारी का इलाज वह कर सकता था। लेकिन आज पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसके अपने पिता एक ऐसी तकलीफ लेकर लौट रहे थे, जिसे उसने खुद पैदा किया था।
—
उस शाम अमन घर पहुँचा तो उसकी पत्नी मीरा ने बताया कि पिता की रिपोर्ट में कोई गंभीर बीमारी नहीं निकली थी। बस उम्र के कारण कुछ नियमित जाँचों की जरूरत थी।
अमन ने राहत की साँस ली।
तभी उसकी आठ साल की बेटी परी स्कूल बैग लेकर उसके पास आई।
“पापा, आज मैंने आपको तीन बार फोन किया था।”
“क्यों बेटा?”
“मुझे अपनी ड्राइंग दिखानी थी। आप हर बार बोले कि बाद में बात करेंगे।”
अमन ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, पापा काम में थे। कल दिखा देना।”
परी ने कुछ नहीं कहा। वह अपना बैग उठाकर कमरे में चली गई।
थोड़ी देर बाद अमन उसके कमरे में पहुँचा। परी सो चुकी थी। तकिए के पास एक कागज रखा था।
उस पर तीन लोगों की तस्वीर बनी थी—एक छोटी बच्ची, एक लंबा आदमी और एक बूढ़ा आदमी।
नीचे टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
“मेरे पापा, मेरे दादाजी और मैं। पापा हमेशा काम करते हैं, इसलिए मैंने तस्वीर में उन्हें घर पर बना दिया।”
अमन के हाथ काँप गए।
उसे अपने पिता की बात याद आई—बीमारी से ज्यादा डर इस बात का है कि मैं तुम्हारी जिंदगी में परेशानी बन गया हूँ।
उसने उसी समय गाँव फोन लगाया।
काफी देर बाद पिता ने फोन उठाया।
“हाँ बेटा, सब ठीक है?”
अमन की आवाज भर्रा गई।
“पापा, आप मुझसे नाराज हैं?”
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
फिर पिता हँसकर बोले, “अरे पगले, बाप भी कभी बेटे से नाराज रहता है? तू खुश रह, बस।”
अमन की आँखें भर आईं।
“पापा, मैं अगले रविवार गाँव आ रहा हूँ। आपको अपने साथ शहर ले जाऊँगा। आपकी सारी जाँचें भी करवाऊँगा।”
पिता ने तुरंत कहा, “नहीं बेटा, रहने दे। मैं ठीक हूँ। तेरी ड्यूटी खराब होगी।”
इस बार अमन ने उनकी बात बीच में काट दी।
“मेरी ड्यूटी बाद में, पापा। पहले आप।”
पिता चुप हो गए।
फिर धीमे से बोले, “बेटा, मुझे शहर नहीं आना। बस कभी-कभी ऐसे फोन कर लिया कर, जैसे पहले करता था। जब तू पूछता था न कि पापा, दुकान पर क्या बना रहे हो, खाना खाया कि नहीं… तब मुझे लगता था कि मैं आज भी तेरी जिंदगी का हिस्सा हूँ।”
अमन रो पड़ा।
“पापा, मैं आपसे मिलने आऊँगा। सिर्फ आपकी जाँच करवाने नहीं… आपके साथ बैठने, आपकी बातें सुनने और आपके साथ चाय पीने।”
—
अगले रविवार अमन गाँव पहुँचा।
रघुनाथ दुकान के बाहर बैठकर पुराने ग्राहकों से बातें कर रहे थे। बेटे को देखकर उठे तो अमन ने आगे बढ़कर उन्हें गले लगा लिया।
काफी देर तक दोनों कुछ नहीं बोले।
फिर अमन ने पिता के कंधे पर सिर रखकर कहा, “पापा, आपने मुझे दूसरों की जिंदगी बचाना सिखाया। लेकिन मैं अपने ही रिश्ते को समय देना भूल गया।”
रघुनाथ ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“बेटा, मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं। बस इतना याद रखना, जिस दिन माँ-बाप बार-बार फोन करना छोड़ दें, जरूरी नहीं कि उनकी जरूरतें खत्म हो गई हों। कभी-कभी वे सिर्फ इसलिए चुप हो जाते हैं कि उन्हें अपने ही बच्चों को परेशान करने से डर लगने लगता है।”
अमन ने पिता का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
उस दिन उसने कोई बड़ा वादा नहीं किया। उसने बस पिता के साथ बैठकर चाय पी, दुकान के पुराने किस्से सुने और शाम को उनके साथ टहलने चला गया।
जाते समय रघुनाथ ने पूछा, “बेटा, अगले रविवार भी आएगा?”
अमन मुस्कुराया।
“पापा, अगला रविवार आने का इंतजार मत कीजिएगा। मैं आपको बीच-बीच में फोन भी करूँगा और मिलने भी आता रहूँगा।”
रघुनाथ ने कुछ नहीं कहा। बस बेटे का हाथ पकड़कर घर की ओर चल पड़े।
उस दिन अमन को समझ आया कि पिता को महँगे उपहारों से ज्यादा उस भरोसे की जरूरत होती है, जिसमें वे बिना झिझक अपने बेटे से कह सकें—“बेटा, मुझे तुम्हारी जरूरत है।”
क्योंकि माँ-बाप जब बूढ़े होते हैं, तो वे हमेशा बच्चों से उनका पैसा नहीं माँगते। कई बार वे बस यह यकीन माँगते हैं कि उनकी आवाज सुनकर बच्चों को परेशानी नहीं, अपनापन महसूस होता है।
लेखिका: वंदना त्रिपाठी
अगर आपके माता-पिता आज भी आपको छोटी-छोटी बातों के लिए फोन करते हैं, तो अगली बार झुँझलाने से पहले एक पल रुकिएगा। हो सकता है, उन्हें उस सवाल का जवाब पहले से पता हो—वे तो बस आपकी आवाज सुनना चाहते हों।
आपकी राय में, क्या माता-पिता की जिम्मेदारी सिर्फ उनकी जरूरतें पूरी करना है, या उन्हें यह एहसास दिलाना भी कि वे आज भी हमारी जिंदगी में उतने ही जरूरी हैं?