जनगणना में विष्णुपुरिया जातीय समुदाय की वास्तविक पहचान स्थापित करनी होगी : कंकन सिंह
शिलचर, 10 अक्टूबर: भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके भीतर किसी जातीय समुदाय की संस्कृति, पहचान और सदियों पुराना इतिहास छिपा होता है। भाषा किसी समुदाय का प्राण होती है, जिसकी कमी की भरपाई किसी अन्य माध्यम से नहीं की जा सकती। विष्णुपुरिया लैंग्वेज डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (BLDO) की त्रिपुरा राज्य समिति के अध्यक्ष कंकन सिंह ने शुक्रवार को शिलचर में यह बात कही।
उन्होंने कहा कि भारत सरकार प्रत्येक दस वर्ष में होने वाली जनगणना के माध्यम से विभिन्न भाषाई समुदायों के इतिहास, अस्तित्व और विकास की स्थिति का आकलन करती है। इसके साथ ही इन समुदायों की पहचान और अधिकारों को भी स्थापित करने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि आगामी जनगणना में विष्णुपुरिया भाषा का कोड 0.33000, मातृभाषा का कोड 043 तथा जनगणना क्रमांक 11 का निर्धारित प्रावधानों के अनुसार अनुसरण किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, केंद्र सरकार ने इस समुदाय की भाषा और इतिहास को गंभीरता से संरक्षित किया है, जो आधिकारिक अभिलेखों में भी दिखाई देता है।
इतिहास का उल्लेख करते हुए कंकन सिंह ने कहा कि 16वीं और 17वीं शताब्दी में विष्णुपुर साम्राज्य के शासक महाराजा वीर हम्बीर मल्ल एक शक्तिशाली राजा थे और वे मुगल सम्राट अकबर के समकालीन थे। श्रीनिवास आचार्य के मार्गदर्शन में उन्होंने गौड़ीय वैष्णव धर्म स्वीकार किया और इसे राजधर्म घोषित किया। बाद के समय में इस धर्म का विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार हुआ।
उन्होंने बताया कि मणिपुर के महाराजा भाग्यचंद्र, जिन्हें चिंग-थांग खोम्बा के नाम से भी जाना जाता है, अपने शासनकाल में महाराजा वीर हम्बीर के उत्तराधिकारी धनपति राजकुमार के माध्यम से वैष्णव धर्म से जुड़े। इसके बाद वर्ष 1779 में मणिपुर में पहली बार भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का आयोजन किया गया।
धर्म के प्रचार-प्रसार के क्रम में मणिपुर और विष्णुपुर साम्राज्य के बीच विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के माध्यम से आपसी संबंध विकसित हुए। मणिपुर के विष्णुपुर जिले सहित राज्य के विभिन्न गांवों में विष्णुपुरिया समुदाय के लोग निवास करते थे। समय के साथ विभिन्न परिस्थितियों के कारण समुदाय के कई लोगों ने अपनी मूल पहचान छिपाकर स्वयं को एक नए नाम ‘विष्णुप्रिया मणिपुरी’ के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।
शिलचर के BLDO के आयोजक दिलीप सिंह ने कहा कि किसी भी जातीय समुदाय की वास्तविक पहचान उसकी भाषा में निहित होती है और इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि ‘विष्णुप्रिया मणिपुरी’ समुदाय की भाषा विष्णुपुरिया है, जिसे भारतीय भाषाई परंपरा से जुड़ी एक आर्य भाषा बताया जाता है।
दिलीप सिंह के अनुसार, केंद्र सरकार ने विभिन्न पहलुओं और ऐतिहासिक तथ्यों की समीक्षा के बाद इस समुदाय को विष्णुपुरिया भाषा के अंतर्गत दर्ज किया है, जिसका उल्लेख जनगणना संबंधी अभिलेखों में मिलता है। उन्होंने कहा कि असम और त्रिपुरा के सभी वर्गों के लोगों को विष्णुपुरिया समुदाय के इस इतिहास की पूरी जानकारी नहीं है। हालांकि, बड़ी संख्या में लोग आज भी इस समुदाय की पहचान और परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। विष्णुपुर के पारंपरिक राजपरिवार के उत्तराधिकारी भी इस दिशा में जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि असम की दो संस्थाएं—BLDO तथा राष्ट्रीय विष्णुपुरिया साहित्य एवं संस्कृति परिषद—और त्रिपुरा की दो संस्थाएं—BLDO तथा BSDO—कई वर्षों से इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के साथ संपर्क बनाए हुए हैं।
दिलीप सिंह ने आशा व्यक्त की कि वर्ष 2027 की जनगणना में विष्णुपुरिया समुदाय भारत में अपनी विशिष्ट पहचान और अस्तित्व को मजबूती से स्थापित करने में सफल होगा। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य से जागरूकता अभियान और सरकारी स्तर पर संवाद की प्रक्रिया निरंतर जारी रखी जाएगी।