नई दिल्ली, 8 अक्टूबर। WWF की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026 के अनुसार 1970 से 2022 के बीच निगरानी में शामिल वन्यजीव आबादी के औसत आकार में 73 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक गिरावट मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में 85 प्रतिशत, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में 69 प्रतिशत और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में 59 प्रतिशत रही।
लंदन की जूलॉजिकल सोसायटी (ZSL) द्वारा तैयार लिविंग प्लैनेट इंडेक्स (LPI) में 5,790 कशेरुकी प्रजातियों की 35,803 आबादी के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है। आवासों का नुकसान एवं क्षरण वन्यजीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसके अलावा अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, आक्रामक प्रजातियां और बीमारियां भी प्रमुख कारण हैं।
हालांकि रिपोर्ट में उम्मीद की महत्वपूर्ण किरण भी सामने आई है। LPI में शामिल लगभग आधी वन्यजीव आबादियां स्थिर हैं या बढ़ रही हैं। हरे कछुए, ब्लूफिन टूना, बाघ और दक्षिणी अफ्रीकी हाथियों की आबादी में सुधार संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाता है।
वैश्विक स्तर पर बाघों की संख्या 2010 में लगभग 3,200 से बढ़कर 2025 में करीब 5,700 हो गई। भारत में 2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना के अनुसार बाघों की संख्या 3,682 है। भारत में एक सींग वाले गैंडे की संख्या 3,300 से अधिक, तेंदुओं की 13,874 और एशियाई शेरों की संख्या 2020 के 674 से बढ़कर 2025 में 891 हो गई है। देश में 2021-23 के दौरान 28 नदियों में किए गए पहले व्यापक नदी डॉल्फिन आकलन में गंगा नदी डॉल्फिन की संख्या 6,324 आंकी गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जैव विविधता संरक्षण के साथ-साथ खाद्य, ऊर्जा और वित्तीय प्रणालियों में व्यापक बदलाव जरूरी है। नवीकरणीय ऊर्जा, टिकाऊ कृषि और प्रकृति-अनुकूल वित्तीय निवेश सकारात्मक बदलाव के महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं।
WWF-India के महासचिव एवं CEO रवि सिंह ने कहा कि रिपोर्ट जैव विविधता संकट की गंभीरता के साथ उम्मीद का संदेश भी देती है। बाघों सहित कई प्रजातियों की वापसी साबित करती है कि दीर्घकालिक संरक्षण, सहयोग और निरंतर निवेश से सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि केवल अलग-अलग प्रजातियों का संरक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं में व्यापक बदलाव लाना आवश्यक है।