विपक्ष में बिखराव से भाजपा को फायदा  

राधा रमण 

देश में कमरतोड़ महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, आर्थिक दिवालियापन के हालात और पिछले 12 वर्षों के दौरान 150 से अधिक पेपरलीक की घटनाएं होने के बावजूद सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं दिखना हमारे विपक्ष के मृतप्राय होने का संदेश देता है। आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) 4.82% और 15 वर्ष से ऊपर की बेरोजगारी दर 5% थी। इसी अवधि में युवा बेरोजगारी 15.1% बताई गई है। ऐसे में क्या विपक्ष के नेता जनता की समस्याओं को समझने में चूक कर रहे हैं, सुविधाभोगी हो गए हैं अथवा जनता से उनका जुड़ाव नहीं रह गया है। 

 तीन साल पहले 18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में विपक्ष के 26 दलों के नेताओं ने इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्ल्युसिव एलायंस (इंडिया) के नाम से एक गठबंधन बनाया था। इसके शिल्पकार बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल, राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालूप्रसाद यादव, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, डीएमके अध्यक्ष एम के स्टालिन, राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद) के अध्यक्ष शरद पवार, शिवसेना (उद्धव गुट) प्रमुख उद्धव बालासाहेब ठाकरे, झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष हेमंत सोरेन, सीपीआई के डी राजा, जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूख अब्दुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती और सीपीएम के सीताराम येचुरी समेत कई नेता शामिल थे। तय किया गया कि गठबंधन की सभी पार्टियां आनेवाले दिनों में मिलकर चुनाव लड़ेंगी और विपक्षी वोटों का बंटवारा रोकेंगी। लेकिन देश ने देखा कि चुनाव के समय सीटों के बंटवारे पर गैर भाजपा दलों में मतैक्य नहीं बन पाता है, इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी लगातार उठाते रही है। यह पहली बार नहीं है। डेढ़ दशक पहले तक कांग्रेस भी यही करती रही थी।  

इंडिया गठबंधन के गठन के कुछ माह बाद ही चुनाव आयोग द्वारा राजस्थान, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ के विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई। इसमें राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें थीं और मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के दलबदल के कारण सत्ता कांग्रेस के हाथ से फिसलकर भाजपा के पाले में आ गई थी। लेकिन इंडिया गठबंधन के दलों खासकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी में सीटों पर सहमति नहीं बन पाने और प्रदेश कांग्रेस नेताओं के आपसी खींचतान के कारण तीनों राज्यों में भाजपा अपने बूते पर सरकार बनाने में कामयाब रही। ज्ञात हो कि राजस्थान में तब के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट, छत्तीसगढ़ में तब के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और तत्कालीन मंत्री टी. एस. सिंहदेव के आपसी विवाद ने कांग्रेस की कामयाबी में पलीता लगाने में अहम रोल निभाया। इसी तरह मध्यप्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच आतंरिक दरार के कारण कांग्रेस भाजपा के एंटी इनकंबेंसी का फायदा नहीं उठा सकी। अगर, तब कांग्रेस दोनों दलों को 8-8 सीटें भी दे देती तो बात नहीं बिगड़ती और गठबंधन की एकता बनी रहती। उस समय कांग्रेस नेताओं ने तर्क दिया कि गठबंधन लोकसभा चुनाव के लिए है। शायद मतदाताओं को विपक्ष के नेताओं की यह बात नागवार गुजरी।

लोकसभा चुनाव में तो विपक्ष अधिकांश सीटों पर मिलकर लड़ा। इसका फायदा भी उसे मिला। कांग्रेस पार्टी नेता विपक्ष के लायक सांसदों की संख्या (99) जुटा पाई। बाद में हरियाणा, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा के चुनाव हुए। इसमें झारखंड एकमात्र राज्य रहा जहां हेमंत सोरेन की सूझबूझ से गठबंधन के दलों में समन्वय हो पाया। वहां इंडिया गठबंधन को 56 सीटें मिली।  इससे वहां झामुमो की अगुवाई में सरकार भी बनी। बाकी राज्यों में आपसी सहमति नहीं बन पाने के कारण इंडिया गठबंधन के दल धराशाई हो गए। बाद के दिनों में दिल्ली, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में भी गठबंधन के दलों की खूब दुर्गति हुई। पश्चिम बंगाल में तो ममता की तृणमूल का तिनका-तिनका बिखर गया। पार्टी तीन धड़ों में बंट गई। चुनाव आयोग ने पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर रोक लगा दी है। उधर, हरियाणा में सीटें नहीं दिए जाने से नाराज अरविन्द केजरीवाल इंडिया गठबंधन से अलग हो गए और दिल्ली में अकेले मैदान में उतरे। नतीजतन, सरकार तो गई ही, खुद चुनाव हारकर घर बैठ गए। तमिलनाडु के चुनाव परिणाम में किसी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति के कारण कांग्रेस और वाम दल सत्ता की लालसा में विजय की पार्टी टीवीके के साथ चले गए। इससे नाराज स्टालिन ने इंडिया गठबंधन से अलग होने का ऐलान कर दिया। लड़ाई बहुकोणीय होने से भाजपा को फायदा मिलता रहा है। कहने का मतलब यह कि विपक्ष की एकजुटता दिखावटी है। ऐसे में मन मिले बगैर सिर्फ हाथ मिला लेने से मतदाता विपक्षी दलों पर भरोसा करें तो कैसे करें।        

अगले साल उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के नेताओं की एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी से तो यही लगता है कि विपक्ष के लिए दिल्ली अभी दूर है। पार्टी के बड़े नेताओं को इसमें दखल देना चाहिए और विवाद को शांत कराना चाहिए। वोट के लिए एकजुट होकर जनता के पास जाना होगा। सपने में सरकार और कल्पना का बालू बांटने से किसी दल का भला नहीं होगा। उधर, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIAMIM) और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) पहले से विपक्ष की एकता में पलीता लगा रही है। विपक्षी मतों के विभाजन का सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिल रहा है।  

ताजा मामला मुख्य चुनाव आयुक्त के विरोध का है। अंग्रेजी के एक अखबार में चुनाव आयोग में मतभेद की खबरें और दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और डॉ विवेक जोशी की असहमतियों को दरकिनार करने से उपजे हालात का है। विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का यह बढ़िया मौका है। लेकिन इंडिया गठबंधन की अगुवाई करने वाली कांग्रेस इस मुद्दे का श्रेय अकेले ही लेना चाहती है। गठबंधन के बाकी दल अलग-थलग दिखाई दे रहे हैं। पटना में तेजस्वी का अलग मोर्चा है तो दिल्ली में केजरीवाल की अलग राह है। दरअसल, क्षेत्रीय दलों को मालूम है कि उनकी असली ताकत कांग्रेस से अलग हुए वोटरों से है। अगर, कांग्रेस मजबूत हो गई तो क्षेत्रीय दलों का पुरसाहाल नहीं बचेगा। इसलिए वह भाजपा का विरोध तो करना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस को मजबूत करना नहीं चाहते। ऐसे में देश की सियासत किस करवट बैठेगी, समय बताएगा।

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