पांच साल में 38 हजार से अधिक लोकेशन दर्ज, वन्यजीव गलियारों और मानव-हाथी संघर्ष वाले क्षेत्रों की मिली महत्वपूर्ण जानकारी
प्रेरणा प्रतिवेदन गुवाहाटी, 7 अक्टूबर। असम वन विभाग और WWF-इंडिया के पांच वर्षीय जीपीएस ट्रैकिंग अध्ययन से राज्य में जंगली हाथियों की आवाजाही और उनके आवास उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। अध्ययन में हाथियों की जंगलों, चाय बागानों, कृषि क्षेत्रों और नदी तटीय इलाकों में मौसमी गतिविधियों का विस्तृत आकलन किया गया है।
वर्ष 2021 से 2026 के बीच उदालगुड़ी, सोनितपुर और बिश्वनाथ जिलों में चार मादा-नेतृत्व वाले हाथी झुंडों तथा एक अकेले नर हाथी को जीपीएस कॉलर लगाया गया। इस दौरान हाथियों की 38 हजार से अधिक जीपीएस लोकेशन दर्ज की गईं। इससे विभिन्न मौसमों में उनके आवागमन और अलग-अलग भू-उपयोग वाले क्षेत्रों के इस्तेमाल का उच्च-रिजॉल्यूशन डेटा प्राप्त हुआ।
अध्ययन के निष्कर्षों पर आधारित रिपोर्ट ‘Tracking the Giants: Movement and Habitat-Use Patterns of GPS-Collared Elephants in Assam’ का विमोचन बुधवार को गुवाहाटी में आयोजित 72वें वन्यजीव सप्ताह समारोह के दौरान असम के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने किया। इस अवसर पर वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और WWF-इंडिया के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
असम एशियाई हाथियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है, लेकिन आवासों के लगातार क्षरण और नुकसान के कारण हाथियों और स्थानीय समुदायों के बीच संघर्ष बढ़ा है। इसके चलते फसलों एवं संपत्ति को नुकसान, मानव जनहानि तथा हाथियों के घायल होने या मारे जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
असम के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डॉ. विनय गुप्ता ने कहा कि यह रिपोर्ट राज्य में हाथियों की मौजूदगी और उनके आवागमन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जानकारी की कमी को पूरा करती है। उन्होंने कहा कि अध्ययन से प्राप्त आंकड़े हाथियों के आवास और उनके आवागमन के मार्गों को समझने तथा मानव-हाथी सह-अस्तित्व के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने में मदद करेंगे।
WWF-इंडिया के हाथी संरक्षण कार्यक्रम के प्रमुख अरित्र क्षेत्री ने कहा कि जीपीएस टेलीमेट्री अध्ययन से हाथियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले प्रमुख प्राकृतिक एवं द्वितीयक आवासों की पहचान हुई है। अध्ययन में हाथियों की आवाजाही में स्पष्ट मौसमी बदलाव भी सामने आया है। उन्होंने कहा कि मानव-हाथी संघर्ष को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए यह समझना जरूरी है कि हाथी कहां और किस प्रकार के आवास एवं भू-उपयोग वाले क्षेत्रों से गुजरते हैं तथा मौसम के साथ उनकी गतिविधियां किस तरह बदलती हैं।
अध्ययन के अनुसार सोनई-रूपाई वन्यजीव अभयारण्य, बेहाली वन्यजीव अभयारण्य और बरनाडी वन्यजीव अभयारण्य हाथियों के लिए प्रमुख आवास के रूप में सामने आए हैं। वहीं, चाय बागान हाथियों के लिए महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग और द्वितीयक आवास के रूप में इस्तेमाल होते हैं। इसके कारण कई बार हाथियों का लोगों के साथ सीधा सामना भी होता है।
अध्ययन में पाया गया कि संरक्षित क्षेत्र और आरक्षित वन वर्ष के अधिकांश समय हाथियों के महत्वपूर्ण आवास बने रहे। धान की खेती के मौसम में मादा-नेतृत्व वाले झुंडों का विचरण क्षेत्र बढ़ गया। इसी अवधि में मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं भी अधिक होने की संभावना रहती है।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि हाथी नदी की धाराओं और नदी तटीय मार्गों का इस्तेमाल उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर आवागमन के लिए करते हैं। इन मार्गों के जरिए वे हिमालय की तलहटी के जंगलों और ब्रह्मपुत्र नदी के घासयुक्त चार क्षेत्रों (चापोरियों) के बीच आवाजाही करते हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि हाथियों के कई पारंपरिक आवागमन मार्ग सड़कों, रेलवे लाइनों और आबादी वाले क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। इससे मानव जीवन और हाथियों दोनों के लिए जोखिम बढ़ जाता है। रिपोर्ट में ऐसे संवेदनशील मार्गों पर सुरक्षा एवं शमन उपाय लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
इसके अलावा, शुष्क मौसम के दौरान उदालगुड़ी से भूटान के निकटवर्ती जोमोत्सांगखा वन्यजीव अभयारण्य तक हाथियों की अंतरराष्ट्रीय सीमा पार आवाजाही भी दर्ज की गई। इससे भारत और भूटान के बीच वन्यजीव गलियारों और हाथियों के संरक्षण के लिए बेहतर सीमा-पार समन्वय की आवश्यकता सामने आई है।
रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्ष असम में हाथियों के आवास एवं आवागमन मार्गों के संरक्षण, मानव-हाथी संघर्ष को कम करने और हाथियों तथा स्थानीय समुदायों के बीच सुरक्षित एवं टिकाऊ सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।