बड़खला के मंच से गूंजा संदेश—सुर नहीं थमेंगे, भाषा-संस्कृति की मशाल लेकर आगे बढ़ता रहेगा बराक बंगाल

निहार कांति राय उधारबंद, 5 अक्टूबर। बराक घाटी बंग साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर रविवार को बड़खला के सेडो सांस्कृतिक प्रेक्षागृह में संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियों ने समूचे वातावरण को सुर-ताल से सराबोर कर दिया। सम्मेलन की कछार जिला समिति के तत्वावधान तथा बड़खला आंचलिक समिति के आयोजन में आयोजित क्षेत्रीय स्तर की संगीत एवं नृत्य प्रतियोगिता में विभिन्न वर्गों में कुल 79 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

यह आयोजन केवल प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बराक घाटी की भाषा, साहित्य, संस्कृति और परंपरा का जीवंत उत्सव बन गया। प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों में बंगाली समाज की जड़ों, भावनाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के विविध रंग देखने को मिले।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। बड़खला आंचलिक समिति के अध्यक्ष खलीलुर रहमान बड़ा भुइयां ने दीप प्रज्ज्वलित किया। इस अवसर पर बड़खला आंचलिक समिति के प्रभारी नीहार कांति राय, समिति के पूर्व अध्यक्ष तथा डलू हायर सेकेंडरी स्कूल के प्रधानाचार्य रजत कांति देव लस्कर, सेडो के अध्यक्ष सत्यव्रत दे, बड़खला आदर्श महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका रूपश्री पाल, लक्ष्मीपुर आंचलिक समिति के सह-सचिव राजदीप दास, सेडो के सचिव एवं बड़खला आंचलिक समिति के पूर्व अध्यक्ष अजीत दास तथा वर्तमान सचिव कंकन चक्रवर्ती सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

संगीत प्रतियोगिता में सोमा राय और कुमकुम राय ने निर्णायक की भूमिका निभाई, जबकि नृत्य प्रतियोगिता का मूल्यांकन अनिता चक्रवर्ती (पाल) ने किया।

भाषा और संस्कृति की विरासत को आगे ले जाने का आह्वान

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने बराक घाटी बंग साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन की पांच दशक लंबी यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बंगाली भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन तथा नई पीढ़ी तक इसकी विरासत पहुंचाने में सम्मेलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

बड़खला आंचलिक समिति के प्रभारी तथा उधारबंद आंचलिक समिति के उपाध्यक्ष नीहार कांति राय ने कहा कि संगीत और नृत्य प्रतियोगिता को केवल जीत-हार के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने, अपनी परंपराओं को समझने और भाषा-संस्कृति की मशाल अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर प्रदान करते हैं।

उन्होंने कहा कि किसी भाषा में केवल शब्द नहीं होते, बल्कि उसके साथ किसी समाज की पहचान, भावनाएं, स्मृतियां, संस्कृति और संवेदनाएं जुड़ी होती हैं। बराक घाटी बंग साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन की 50 वर्षों की यात्रा भी केवल समय का एक पड़ाव नहीं, बल्कि संघर्ष, साधना, सांस्कृतिक चेतना और रचनात्मक विचारों के विकास की लंबी यात्रा है।

नीहार कांति राय ने कहा कि बराक घाटी में मौजूद विभिन्न भाषाई समुदायों की संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करते हुए सम्मेलन अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने सम्मेलन को “बहुरंगी सांस्कृतिक मोजेक” बताते हुए स्वर्ण जयंती वर्ष में नई ऊर्जा और नए संकल्प के साथ सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

बड़खला आंचलिक समिति के अध्यक्ष खलीलुर रहमान बड़ा भुइयां तथा समिति के पूर्व अध्यक्ष और डलू हायर सेकेंडरी स्कूल के प्रधानाचार्य रजत कांति देव लस्कर ने भी अपने संबोधन में भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास में युवा पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया।

प्रस्तुतियों ने बांधा समां

इसके बाद बहुप्रतीक्षित संगीत एवं नृत्य प्रतियोगिता शुरू हुई। एक के बाद एक प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। कहीं मधुर गीतों ने दर्शकों को भावविभोर किया तो कहीं नृत्य की लय और ताल ने माहौल में उत्साह भर दिया। प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों को दर्शकों ने खूब सराहा।

प्रतियोगिता के बाद पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित किया गया। निर्णायकों ने प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों की समीक्षा करते हुए उनकी कमियों की ओर ध्यान दिलाया और भविष्य में उनमें सुधार के लिए आवश्यक सुझाव दिए।

विभिन्न वर्गों के विजेताओं को मंचासीन अतिथियों के अलावा बड़खला आंचलिक समिति के उपाध्यक्ष संतोष नाथ, कोषाध्यक्ष अशोक दत्त, सांस्कृतिक सचिव निवेदिता शर्मा मजूमदार, साहित्य सचिव अभिजीत दास, जिला समिति के सदस्य रघुनंदन शर्मा मजूमदार, उपाध्यक्ष गौरांग दास, शिक्षक ताराबुल कलाम बड़ा भुइयां तथा शिक्षक सुजय भट्टाचार्य ने पुरस्कार प्रदान किए।

कार्यक्रम का संचालन साहित्य सचिव अभिजीत दास ने किया। अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

बड़खला में आयोजित स्वर्ण जयंती वर्ष की यह क्षेत्रीय संगीत एवं नृत्य प्रतियोगिता एक बार फिर यह संदेश दे गई कि भाषा और संस्कृति का संरक्षण केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी है। पांच दशक की विरासत और अनुभव को साथ लेकर नई पीढ़ी को जोड़ते हुए बराक बंग की सांस्कृतिक यात्रा को आगे जारी रखने का संकल्प बड़खला के मंच से स्पष्ट रूप से सामने आया।

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