विज्ञापन नीति को लेकर छोटे-मध्यम समाचार पत्रों में रोष, सरकार पर भेदभाव का आरोप

प्रेरणा प्रतिवेदन शिलचर, 25 सितंबर। असम के समाचार पत्रों के करीब 200 वर्षों के इतिहास में मौजूदा स्थिति को एक चिंताजनक अध्याय बताते हुए इंडियन फेडरेशन ऑफ स्मॉल एंड मीडियम न्यूजपेपर्स की असम राज्य समिति ने छोटे एवं मध्यम आकार के समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापन नहीं मिलने पर तीव्र नाराजगी जताई है।

संगठन के असम प्रदेश अध्यक्ष प्रभात चंद्र शर्मा और महासचिव एम. सैफुद्दीन अहमद द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि 2026 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने 15 मार्च से समाचार पत्रों में सरकारी विज्ञापन अस्थायी रूप से रोक दिए थे। संगठन का कहना है कि 5 मई को चुनाव संबंधी प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के बावजूद बराक एवं ब्रह्मपुत्र घाटी से प्रकाशित अनेक छोटे और मध्यम समाचार पत्रों को अब तक नियमित सरकारी विज्ञापन की अनुमति नहीं मिली है।

बयान में आरोप लगाया गया है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक राज्य सरकार की वर्ष 2008 की विज्ञापन नीति तथा सर्वोच्च न्यायालय के 13 मई 2015 के आदेश के अनुरूप समान अवसर सुनिश्चित नहीं कर रहे हैं। संगठन का दावा है कि कुछ दैनिक समाचार पत्रों को नियमित रूप से सरकारी विज्ञापन दिए जा रहे हैं, जबकि छोटे एवं मध्यम प्रकाशनों को इससे वंचित रखा गया है।

संगठन के अनुसार, इस स्थिति का सीधा असर छोटे और मध्यम समाचार पत्रों में कार्यरत पत्रकारों, संवाददाताओं, मुद्रण एवं अन्य समाचारकर्मियों पर पड़ रहा है। लगभग 1,500 पत्रकारों और समाचारकर्मियों की आजीविका प्रभावित होने का दावा करते हुए संगठन ने कहा कि इससे उनके परिवारों के सामने भी आर्थिक संकट पैदा हो रहा है।

बयान में यह भी कहा गया है कि जिला स्तर के समाचार पत्र और मासिक पत्रिकाएं केवल समाचार प्रकाशित करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय लेखकों, कवियों और साहित्यिक प्रतिभाओं को मंच देने के साथ-साथ स्थानीय भाषाओं, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

संगठन ने सरकार और संबंधित विभाग से विज्ञापन नीति को पारदर्शी एवं समान रूप से लागू करने तथा छोटे एवं मध्यम समाचार पत्रों को शीघ्र सरकारी विज्ञापन उपलब्ध कराने की मांग की है।

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