डिस्क्लेमर – यह सच्ची घटना आपको विचलित कर सकती है।
अप्रैल 2016 की बात है। एक पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने एक कांस्टेबल से कहा— “जाओ, लकड़ी काटने वाली पावर आरी खरीद लाओ।” कुछ ही समय बाद उसने 25 किलो के धातु के वजन भी खरीद लिए।
किसी ने नहीं पूछा कि “साहब, इनकी जरूरत क्यों है?”
आखिर वह कोई आम आदमी नहीं था। वह एक सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर था और किसी को क्या पता था कि अगले साल इसी पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति पदक मिलने वाला है?
अब आइए इस तस्वीर और उस सीनियर पुलिस आफिसर के कारनामों पर। इस महिला का नाम था अश्विनी बिद्रे-गोरे। 37 साल की अश्विनी खुद एक पुलिस अधिकारी थीं। वह नवी मुंबई पुलिस में असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर थी। घटना के समय बेलापुर के कोंकण भवन में मानवाधिकार सेल में तैनात थी।
एक बेटी की माॅं, एक ऐसी महिला, जिसने खुद कानून की वर्दी पहनी थी लेकिन शायद उसे यह अंदाजा नहीं था कि एक दिन वही वर्दी उसके लिए इंसाफ पाने की सबसे बड़ी लड़ाई बन जाएगी।
अश्विनी का वैवाहिक जीवन टूट चुका था और वह अपने पति से अलग रह रही थीं। उनका रिश्ता अभय कुरुंदकर से था जो खुद ठाणे ग्रामीण पुलिस में सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर था जो कि पहले से शादीशुदा था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, अश्विनी उस पर शादी करने का दबाव बना रही थीं।
फिर आया 11 अप्रैल 2016 का शह मनहूस दिन..अश्विनी अभय के भयंदर स्थित फ्लैट पर गईं। उस दिन वह शायद आर पार की लड़ाई लड़ने गयी थी लेकिन वह वहां गईं तो जरूर… पर वापस कभी नहीं आईं। आरोप के मुताबिक, उसी फ्लैट में उनका गला घोंटकर हत्या कर दी गई और फिर शुरू हुआ वह काम, जिसे सुनकर भी रूह कांप जाती है।
जिस आरी को हत्या से सिर्फ 5 दिन पहले खरीदा गया था, उसी से उनके शव के टुकड़े किए गए। उन्हें ट्रंकों और बोरियों में रखा गया। फिर एक फ्रिज में छिपाया गया और बाद में वसई की खाड़ी में फेंक दिया गया। उनके साथ 25 किलो के धातु के वजन बांध दिए गए… ताकि शरीर पानी के ऊपर न आ सके। वह शरीर फिर कभी नहीं मिला। आज तक नहीं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अब बारी थी उस अपराध को छिपाने की। अभय ने अपने ड्यूटी रिकॉर्ड में हेरफेर किया। गश्त के गलत समय लिखे। वाहन की गलत रीडिंग दर्ज की। अश्विनी का फोन अपने पास रख लिया और उसी से उनके रिश्तेदारों और पुलिस विभाग को मैसेज भेजे कि वह उत्तर भारत में किसी ध्यान शिविर में गई हैं।
सोचिए… एक महिला रातों रात गायब हो गई। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि वह धरती में समा गयी या फिर उसे आसमान ने निगल लिया पर उसकी अपनी पुलिस फोर्स महीनों तक यही मानती रही कि वह किसी आध्यात्मिक शिविर में है।
तीन महीने के इंतजार के बाद आखिरकार अश्विनी के भाई आनंद बिद्रे ने जब पुलिस में शिकायत की तो 14 जुलाई 2016 को उनकी गुमशुदगी का मामला दर्ज हुआ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसी बीच कहानी में एक ऐसा मोड़ आया, जो इस कहानी को और भी कड़वा बना देता है।
जनवरी 2017 में, यानि हत्या के करीब 9 महीने बाद, अभय कुरुंदकर को राष्ट्रपति पदक मिला। सोचिए, जिस आदमी पर एक महिला पुलिस अधिकारी की हत्या का आरोप था… उसे उत्कृष्ट सेवा के लिए सम्मानित किया गया लेकिन कानून की पकड़ धीरे-धीरे उसके करीब आ रही थी। 7 दिसंबर 2017 को अभय कुरुंदकर गिरफ्तार हुआ। मुकदमा शुरू हुआ। लेकिन अदालत के सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि लाश कहां है?
कोई शव नहीं। कोई पोस्टमार्टम नहीं। मौत की मेडिकल पुष्टि नहीं। कोई सीधा फोरेंसिक टाइमलाइन नहीं। ऐसे में हत्या साबित करना बेहद मुश्किल था। लेकिन अभियोजन पक्ष ने हार नहीं मानी।
स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर प्रदीप घराट ने एक-एक छोटे सुराग को जोड़ना शुरू किया और फिर वही चीजें, जिन्हें हत्यारा मामूली समझकर पीछे छोड़ गया था… उसके खिलाफ खड़ी होने लगीं। आरी की खरीद,
25 किलो के वजन, कांस्टेबल की गवाही,
फोन रिकॉर्ड, लोकेशन, झूठे ड्यूटी रिकॉर्ड।
हर टुकड़ा दूसरे टुकड़े से जुड़ता गया और बिना लाश के भी कहानी अदालत के सामने पूरी होती गई।
अदालत ने अभय कुरुंदकर को हत्या का दोषी मानते हुए उसे उम्रकैद की सजा सुनाई।
उसके दोस्त और ड्राइवर को सबूत नष्ट करने के मामले में 7-7 साल की सजा मिली। अदालत ने माना कि अपराध बेहद जघन्य था, लेकिन मौत की सजा के लिए जरूरी “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” श्रेणी में यह मामला नहीं आता।
फैसले के बाद अश्विनी के परिवार ने कहा कि वे खुश हैं। क्योंकि कम से कम… उन्हें इंसाफ मिला। लेकिन इस कहानी में एक खाली जगह हमेशा रहेगी। अश्विनी की बेटी अपनी माॅं की आखिरी विदाई नहीं देख सकी। परिवार उन्हें अंतिम बार मुखाग्नि नहीं दे सका। कोई अंतिम संस्कार नहीं हुआ कोई अस्थियां नहीं मिलीं।
क्योंकि… जलाने के लिए अश्विनी का शरीर ही नहीं था और इस पूरी कहानी की सबसे डरावनी बात शायद हत्या नहीं है। सबसे डरावनी बात यह है कि हत्यारा पुलिस में था। उसे पता था कि रिकॉर्ड कैसे बनाए जाते हैं। फोन कैसे इस्तेमाल किए जाते हैं। कहानी कैसे गढ़ी जाती है और जांच को कैसे भटकाया जाता है।
लेकिन वह एक चीज भूल गया कि हर अपराधी कोई न कोई निशान जरूर छोड़ जाता ता है। अभय कुरुंदकर ने भी छोड़ा था।कोई बड़ी चीज नहीं। कोई लाश नहीं। कोई वीडियो नहीं। बस… एक पावर आरी की खरीद की रसीद। वह आरी हत्या से 5 दिन पहले खरीदी गई थी।
जिस दिन अश्विनी उसके फ्लैट में जिंदा गई थीं… उसे शायद यह नहीं पता था कि पांच दिन पहले खरीदी गई एक आरी की छोटी-सी रसीद… एक दिन उसकी हत्या का सबसे अहम सुराग बन जाएगी।
लाश नहीं मिली…..लेकिन सच मिल गय और कभी-कभी… इंसाफ को सिर्फ एक छोटी-सी रसीद की जरूरत होती है। आपका क्या विचार है?!!
साभार फेसबुक