आखिरी बार पिता ने बेटियों को पुकारा था… मगर कोई नहीं आया

शहर के पुराने कपड़ा बाजार में रघुनाथ अग्रवाल की छोटी-सी दुकान थी—“रघुनाथ वस्त्र भंडार।”

दुकान बड़ी नहीं थी, लेकिन रघुनाथ की मेहनत बहुत बड़ी थी।

सुबह दुकान खोलने से पहले वह अपनी पत्नी सरोज के साथ भगवान के सामने हाथ जोड़कर बस एक ही प्रार्थना करते—

“हे भगवान… मेरी बेटियों को हमेशा खुश रखना।”

रघुनाथ के तीन बेटियाँ थीं—नंदिनी, कविता और रिया।

बेटा नहीं था।🤷

रिश्तेदार अक्सर ताना मारते—

“अरे रघुनाथ, बेटा होता तो बुढ़ापे का सहारा बनता।”

रघुनाथ मुस्कुरा देते।

“मेरी बेटियां ही मेरा बेटा हैं।”

और सच में, उन्होंने बेटियों को बेटों से कम कभी नहीं समझा।

खुद पुराने कपड़े पहनते, लेकिन बेटियों की फीस समय पर भरते।

दुकान पर दिनभर बैठने के बाद रात को हिसाब करते-करते आंखें लाल हो जातीं, फिर भी बेटियों की किताबें देखकर चेहरे पर मुस्कान आ जाती।

एक रात सरोज ने कहा,

“इतना मत थको… तीनों की पढ़ाई हो गई है। अब थोड़ा अपने लिए भी जी लो।”

रघुनाथ हंस पड़े।

“अपने लिए ही तो जी रहा हूं सरोज… जिस दिन ये तीनों अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी, उस दिन समझूंगा मेरी जिंदगी सफल हो गई।”

समय बीतता गया।

नंदिनी सरकारी स्कूल में अध्यापिका बन गई।

कविता बैंक में नौकरी करने लगी।

सबसे छोटी रिया की शादी शहर के एक बड़े कारोबारी परिवार में हो गई।

तीनों की शादियां रघुनाथ ने अपनी हैसियत से कहीं ज्यादा बढ़कर कीं।

पुरानी दुकान गिरवी रख दी।

जमा पूंजी निकाल ली।

सरोज के गहने तक बिक गए।

शादी के बाद रिश्तेदारों ने कहा—

“अब तो तीन-तीन बेटियां हैं। बुढ़ापे में तुम्हें हाथों पर रखेंगी।”

रघुनाथ ने गर्व से कहा—

“मुझे पता है… मेरी बेटियां मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ेंगी।”

लेकिन जिंदगी कभी-कभी इंसान के सबसे मजबूत विश्वास की परीक्षा लेती है।

पहले सरोज की तबीयत खराब रहने लगी।

रघुनाथ दिन-रात उसकी सेवा करते।

एक दिन सरोज ने उनका हाथ पकड़कर कहा—

“अगर मैं पहले चली गई ना… तो बेटियों के पास चले जाना।”

रघुनाथ ने हंसकर कहा—

“तुम कहीं नहीं जाओगी।”

सरोज ने उनकी आंखों में देखा।

“बस वादा करो।”

रघुनाथ ने सिर हिला दिया।

“वादा।”

कुछ महीनों बाद सरोज चली गई।

घर में पहली बार रघुनाथ को अपने कदमों की आवाज सुनाई दी।

रसोई में रखी दो प्लेटों में से एक प्लेट हमेशा खाली रहने लगी।

रात को वह आदत से आवाज लगाते—

“सरोज… चाय बना दो।”

फिर खुद ही चुप हो जाते।

धीरे-धीरे उनका शरीर भी जवाब देने लगा।

घुटनों में दर्द, आंखों की रोशनी कम और हाथों में कंपन।

एक दिन उन्होंने बड़ी बेटी नंदिनी को फोन किया।

“बेटा… अगर कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास आ जाऊं?”

कुछ पल चुप्पी रही।

फिर नंदिनी बोली—

“पापा, स्कूल की नौकरी है… बच्चों की पढ़ाई है… घर छोटा है। आप समझ सकते हो ना?”

रघुनाथ ने तुरंत कहा—

“हां बेटा, मैं समझ सकता हूं।”🙆

उन्होंने फोन रख दिया।

दूसरे दिन कविता को फोन किया।

“बेटा… अगर मैं तुम्हारे पास रहूं तो?”

कविता ने कहा—

“पापा, मेरी सास की तबीयत भी ठीक नहीं रहती। घर में बहुत जिम्मेदारियां हैं। आप रिया से बात कर लो।”

तीसरे दिन रिया को फोन किया।☎️

“बेटी…”

रिया ने बिना पूरी बात सुने कहा—

“पापा, यहां आपको परेशानी होगी। हमारी लाइफस्टाइल अलग है। आप किसी अच्छे वृद्धाश्रम में क्यों नहीं चले जाते? वहां आपकी उम्र के लोग भी होंगे।”

रघुनाथ कुछ क्षण तक फोन कान से लगाए बैठे रहे।

फिर धीमे से बोले—🤷

“हां… शायद वहां मैं अकेला नहीं रहूंगा।”

कुछ दिनों बाद रघुनाथ शहर के एक वृद्धाश्रम में रहने लगे।

वहां उन्हें एक छोटा-सा कमरा मिला।

कमरे में एक पलंग, एक मेज और दीवार पर सरोज की तस्वीर थी।

हर रविवार वह तीनों बेटियों को फोन करते।

पहले पूछते—

“बेटी, खाना खाया?”

फिर कहते—

“अपना ध्यान रखना।”

कभी यह नहीं कहते—

“मुझे अपने पास बुला लो।”

शायद उन्हें डर था कि बेटियां फिर मना कर देंगी।

एक दिन वृद्धाश्रम के संचालक ने पूछा—

“बाबूजी, आपकी तीन बेटियां हैं ना?”

रघुनाथ मुस्कुराए।

“हां।”

“कोई मिलने नहीं आता?”

रघुनाथ ने तस्वीर की तरफ देखते हुए कहा—

“आती हैं… फोन पर।”

संचालक की आंखें भर आईं।

सर्दियों की एक रात रघुनाथ को तेज बुखार हो गया।

उन्होंने कांपते हाथों से अपनी तीनों बेटियों को संदेश भेजा—

“बेटियों, अगर संभव हो तो एक बार मिलने आ जाना। बहुत दिनों से तुम्हें सामने बैठकर नहीं देखा।”

नंदिनी ने संदेश पढ़ा, लेकिन जवाब नहीं दिया।

कविता ने अगले दिन फोन करने का सोचा, फिर काम में व्यस्त हो गई।

रिया ने संदेश देखा और अपने पति से कहा—

“पापा फिर भावुक हो रहे हैं।”

उधर वृद्धाश्रम में रघुनाथ दरवाजे की तरफ देखते रहे।

हर बार जब बाहर गाड़ी रुकती, उनकी आंखें चमक उठतीं।

“शायद मेरी बेटी आई है…”

लेकिन हर बार कोई और निकलता।

उस रात उन्होंने अपनी डायरी खोली।

आखिरी पन्ने पर लिखा—

“आज बेटियों से मिलने की बहुत इच्छा थी। शायद वे व्यस्त होंगी। कोई बात नहीं। पिता बच्चों से नाराज नहीं होता।”

अगली सुबह रघुनाथ नहीं उठे।

उनका सिर सरोज की तस्वीर के नीचे रखा था।

हाथ में वही पुरानी डायरी थी।

वृद्धाश्रम के संचालक ने तीनों बेटियों को फोन किया।

“आपके पिताजी नहीं रहे।”

उधर कुछ सेकंड की चुप्पी रही।

फिर बड़ी बेटी ने पूछा—

“अंतिम संस्कार कितने बजे है?”

“आप आ जाएं तो बेहतर होगा।”

नंदिनी बोली—

“मैं कोशिश करूंगी।”

कविता ने कहा—

“मेरे ऑफिस में जरूरी काम है।”

रिया ने कहा—

“हम वीडियो कॉल से जुड़ जाएंगे।”

शाम को वृद्धाश्रम के चार कर्मचारी और कुछ बुजुर्ग रघुनाथ की अर्थी के पास खड़े थे।

कोई अपना नहीं था।

संचालक ने वीडियो कॉल लगाया।

मोबाइल स्क्रीन पर तीनों बेटियों के चेहरे दिखाई दे रहे थे।

अर्थी उठाने में थोड़ा समय लग रहा था।

तभी स्क्रीन पर रिया की आवाज आई—

“इतना समय क्यों लग रहा है? मुझे भी घर का काम करना है।”

वह शब्द वृद्धाश्रम की खामोशी में हथौड़े की तरह गूंज गए।

वहां खड़े एक बूढ़े व्यक्ति ने मोबाइल की तरफ देखा और फूट-फूटकर रो पड़ा।

“जिस आदमी ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए बचाकर रखी… उसके पास मरने के बाद चार कंधे भी नहीं बचे।”

अर्थी उठी।

रघुनाथ की डायरी संचालक के हाथ में रह गई।

अंतिम पन्ने पर एक और बात लिखी थी, जिसे किसी बेटी ने नहीं पढ़ा।

“मेरी बेटियों ने मुझे अपने पास जगह नहीं दी, फिर भी मैं उन्हें बद्दुआ नहीं दूंगा। आखिर मैंने उन्हें प्यार करना सिखाया है… हिसाब मांगना नहीं।”

उस दिन चिता जल रही थी।

और तीनों बेटियां मोबाइल स्क्रीन पर अपने पिता की अंतिम यात्रा देख रही थीं।

लेकिन शायद उन्हें पता ही नहीं था—

जिस पिता को उन्होंने जिंदगी में समय नहीं दिया, वह मरते समय भी उन्हें दोषी नहीं मान रहा था।

रघुनाथ की चिता की आग बुझ गई।

मगर उस वृद्धाश्रम के बुजुर्गों के मन में एक सवाल हमेशा के लिए जलता रह गया—

“अगर माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दें, तो क्या बुढ़ापे में उन्हें बदले में सिर्फ इतना चाहिए होता है कि कोई उनके पास बैठकर कह दे—‘पापा, अब आप अकेले नहीं हैं।’?”

और शायद यही सबसे बड़ा दुख है…

माता-पिता बच्चों से कभी उनका बचपन वापस नहीं मांगते।

वे बस अपने बुढ़ापे में थोड़ा-सा अपनापन मांगते हैं।

इसलिए अगर आपके माता-पिता आज आपके घर में हैं…

तो उनके साथ बैठ जाइए।

उनसे बात कर लीजिए।

उनका हाथ पकड़ लीजिए।

क्योंकि एक दिन उनके कमरे की कुर्सी खाली होगी…

उनका चश्मा मेज पर पड़ा होगा…

उनकी आवाज सुनाई नहीं देगी…

और तब आपके पास दुनिया भर का पैसा होगा,

लेकिन उनसे यह कहने का मौका नहीं होगा—

“पापा… उस दिन मेरे पास आपके लिए थोड़ा समय नहीं था, मुझे माफ कर देना।”

वंदना त्रिपाठी ✍️

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