करुणा : सुखी और सुंदर समाज की आधारशिला।

-सुनील कुमार महला

भारतीय संस्कृति अनेक सद्गुणों और जीवन-मूल्यों से समृद्ध है, लेकिन करुणा का स्थान उनमें सर्वोपरि है। वास्तव में, करुणा केवल किसी के दुःख को देखकर मन में संवेदना उत्पन्न होने का नाम नहीं है, बल्कि उस दुःख को समझकर उसे कम करने का प्रयास करना है। सच तो यह है कि जिस भी व्यक्ति के हृदय में करुणा का भाव जाग जाता है, वह वास्तव में संसार का सबसे सुखी और समृद्ध व्यक्ति बन जाता है, क्योंकि करुणा उसे भीतर से संतुष्टि और आत्मिक आनंद प्रदान करती है।

मनुष्य को अहंकार से मुक्त करती है करूणा:-

भारतीय चिंतन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना को सदैव महत्व दिया गया है। हमारी संस्कृति हमें केवल मनुष्यों के प्रति ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव-जंतु, पशु-पक्षी और प्रकृति के प्रति भी प्रेम, दया और करुणा रखने की प्रेरणा देती है। किसी असहाय की सहायता करना, भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना, घायल जीव की रक्षा करना या किसी दुःखी व्यक्ति के आँसू पोंछना-करुणा के यही सहज और वास्तविक रूप हैं। करुणा मनुष्य को अहंकार से मुक्त करती है और उसके भीतर प्रेम, सहानुभूति तथा सेवा की भावना पैदा करती है। मनुष्य अपने ज्ञान पर गर्व कर सकता है, शक्ति पर अभिमान कर सकता है और धन-संपत्ति से प्रसन्न हो सकता है। वह मधुर वाणी बोल सकता है, शास्त्रों का ज्ञाता हो सकता है, न्याय की बातें कर सकता है और समाज में सम्मान भी प्राप्त कर सकता है। लेकिन यदि उसके हृदय में दया नहीं है, तो उसके ये सभी गुण उस वृक्ष के समान हैं जिसकी शाखाएँ हरी तो दिखाई देती हैं, लेकिन जिसकी जड़ें सूख चुकी हैं। ऐसा वृक्ष कुछ समय तक खड़ा रह सकता है, लेकिन उसमें जीवन नहीं रहता।

भारतीय संस्कृति और इसमें निहित करूणा की भावना:-

भारतीय संस्कृति में करुणा और परोपकार की भावना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। हमारे यहां संस्कृत में बड़े ही सुंदर शब्दों में कहा भी गया है कि-‘परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥’ इसका सीधा सा मतलब यह है कि वृक्ष दूसरों के उपकार के लिए फल देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं, गायें दूसरों के लिए दूध देती हैं और यह शरीर भी दूसरों के उपकार के लिए है। वास्तव में दया केवल एक गुण नहीं, बल्कि सभी गुणों की आत्मा है। जैसे शरीर में प्राण न हों तो उसके सुंदर अंग भी निष्प्राण हो जाते हैं, वैसे ही करुणा के बिना विद्या अहंकार, शक्ति अत्याचार और न्याय कठोरता में बदल सकता है। इसलिए किसी व्यक्ति की महानता केवल उसकी संपत्ति, ज्ञान या पुस्तकों के अध्ययन से नहीं मापी जानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह देखना चाहिए कि किसी दूसरे के दुःख को देखकर उसका हृदय पिघलता है या नहीं। यही उसके चरित्र की सबसे बड़ी और सच्ची परीक्षा है। जो व्यक्ति दूसरों के आँसू देखकर भी विचलित नहीं होता, वह संसार को केवल अपने लाभ की दृष्टि से देखता है। इसके विपरीत, जिस हृदय में करुणा होती है, वह व्यक्ति दूसरों में स्वयं को देखना सीख जाता है। तब वह किसी की सहायता प्रशंसा पाने के लिए नहीं करता, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि उसे दूसरे का दुःख अपना दुःख लगता है। यही भावना मनुष्य को वास्तविक अर्थों में मानव बनाती है।

प्रकृति भी देती है करूणा और परोपकार का संदेश:-

प्रकृति भी हमें करुणा और परोपकार का संदेश देती है। सूर्य यह भेद नहीं करता कि किसे प्रकाश देना है और किसे नहीं। नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, बल्कि दूसरों की प्यास बुझाती हैं। प्रकृति का प्रत्येक तत्व किसी न किसी रूप में दूसरों के हित में योगदान देता है। यदि प्रकृति हमें देने में आनंद का संदेश देती है, तो मनुष्य केवल अपने लिए क्यों जिए? उसकी श्रेष्ठता इसी में है कि वह अपने विवेक को करुणा से जोड़कर अपने जीवन को दूसरों के लिए उपयोगी बनाए। करुणा केवल किसी की भौतिक सहायता करने तक सीमित नहीं है। कभी-कभी एक मधुर शब्द किसी भूखे व्यक्ति को भोजन देने से भी अधिक मूल्यवान हो सकता है। किसी परेशान व्यक्ति की बात धैर्यपूर्वक सुन लेना, किसी दुःखी को सांत्वना देना, किसी की भावनाओं को समझना और किसी के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना भी करुणा है। इसलिए करुणा हमारे हाथों से ही नहीं, बल्कि हमारी वाणी, दृष्टि और विचारों से भी प्रकट होती है। आज जब दुनिया में स्वार्थ, हिंसा और संवेदनहीनता बढ़ रही है, तब करुणा ही वह प्रकाश है जो मानवता को सही दिशा दिखा सकता है। कठोर होना आसान है, लेकिन परिस्थितियों के बीच भी कोमल और संवेदनशील बने रहना कठिन है। इसलिए यदि हम सच्चा ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने हृदय को निर्मल बनाना होगा। जिस ज्ञान से विनम्रता न आए, वह अधूरा है। जिस पूजा से दया न जागे, वह केवल कर्मकांड बनकर रह जाती है। इसी प्रकार जिस तपस्या से दूसरों के प्रति प्रेम न बढ़े, वह केवल शरीर को कष्ट देने तक सीमित रह जाती है।

धर्म का वास्तविक फल है करुणा:-

धर्म का वास्तविक फल करुणा है। यदि धर्म के आचरण से मन में दया और प्रेम उत्पन्न नहीं होते, तो समझना चाहिए कि उसका उद्देश्य अभी पूरा नहीं हुआ। इसी तरह विद्या का मूल्य इस बात से नहीं है कि उसने व्यक्ति को कितनी बहसें जिताई हैं, बल्कि इस बात से है कि उसने कितने हृदयों में प्रकाश पहुँचाया है। इसलिए हमें अपने जीवन में करुणा को केवल विचार के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार के रूप में अपनाना चाहिए। सभी जीवों के प्रति प्रेम, दया और संवेदना रखनी चाहिए। किसी के दुःख को समझना, उसके कष्ट को कम करने का प्रयास करना और बिना किसी स्वार्थ के सहायता करना ही सच्ची मानवता है।अंत में यही कहूंगा कि हम अपने भीतर करुणा का दीपक सदैव जलाए रखें। यही दीपक(करूणा का दीपक) हमारे जीवन को सार्थक बना सकता है और समाज को अधिक मानवीय तथा सुंदर बना सकता है। जिस हृदय में दया बसती है, वहाँ ईश्वर को अलग से खोजने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि करुणा ही वह स्थान है जहाँ मानवता और दिव्यता एक-दूसरे का स्पर्श करती हैं।

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