सवाल, बहस और जवाबदेही के लिए जरूरी है संसद का सुचारू संचालन

– सूरज मोहन झा वरिष्ठ पत्रकार 

लोकतंत्र में संसद सिर्फ एक इमारत या सदन नहीं है। यह वह मंच है, जहां देश के करोड़ों लोगों की आवाज उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिए उठती है। सरकार की नीतियों पर चर्चा होती है, कानून बनाए जाते हैं, बजट पर विचार होता है और सरकार से सवाल पूछकर उसकी जवाबदेही तय की जाती है। यही वजह है कि संसद का सुचारू रूप से चलना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत माना जाता है। जब संसद लगातार हंगामे, नारेबाजी और स्थगन की वजह से बाधित होती है, तो इसका असर सिर्फ सदन की कार्यवाही तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कानून बनाने की प्रक्रिया, सरकार की जवाबदेही और जनता के मुद्दों पर भी पड़ता है।

संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका अहम

भारतीय संविधान के मुताबिक संसद राष्ट्रपति और दो सदनों-लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनती है। संसद की ताकत इस बात में है कि यहां सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष को भी जनता से जुड़े मुद्दे उठाने और सरकार से सवाल करने का अधिकार मिलता है। स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार का काम नीतियां बनाना है, जबकि विपक्ष उन नीतियों की समीक्षा करता है, सवाल उठाता है और जरूरत पड़ने पर सरकार की कमियां सामने लाता है। यही प्रक्रिया संसदीय लोकतंत्र को प्रभावी बनाती है।

प्रश्नकाल सरकार की जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम

संसदीय कार्यवाही का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रश्नकाल है। आमतौर पर लोकसभा में प्रश्नकाल सुबह 11 बजे से दोपहर 12 बजे तक होता है, जबकि राज्यसभा में यह दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक चलता है। इस दौरान सांसद अलग-अलग मंत्रालयों से सवाल पूछते हैं। ये सवाल उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े हो सकते हैं या फिर पूरे देश से जुड़े किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर।

सवालों के जरिए योजनाओं और नीतियों का हिसाब

प्रश्नकाल के जरिए सांसद यह जान सकते हैं कि सरकार किसी योजना पर कितना खर्च कर रही है, किसी नीति को लागू करने में क्या प्रगति हुई है, किसी समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं। इस लिहाज से प्रश्नकाल सरकार और जनता के बीच जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम है।

शून्यकाल में तत्काल जनहित के मुद्दे उठाने का अवसर

प्रश्नकाल के अलावा शून्यकाल भी सांसदों को तत्काल जनहित के मुद्दे उठाने का अवसर देता है। किसी क्षेत्र में सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार या किसी अन्य गंभीर समस्या से जुड़े मुद्दे सांसद सदन में उठा सकते हैं। ऐसे में सवाल सीधा है- अगर सदन ही नहीं चलेगा, तो ये सवाल कहां उठेंगे?

विरोध लोकतंत्र का हिस्सा, लेकिन लगातार व्यवधान चिंता का विषय

संसद में विरोध प्रदर्शन और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हैं। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और उसकी कमियों को सामने लाना भी है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विरोध इतना लंबा हो जाए कि सदन की कार्यवाही लगातार बाधित होने लगे। संसद का प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण है। इसी समय महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा हो सकती है, सांसद अपने क्षेत्रों की समस्याएं उठा सकते हैं और सरकार से जवाब मांग सकते हैं।

संसद चलाने में बड़ी प्रशासनिक व्यवस्था पर खर्च

संसद की कार्यवाही के पीछे सांसदों और कर्मचारियों के अलावा सुरक्षा, तकनीकी व्यवस्था, अनुवाद, बिजली, संचार और सचिवालय जैसी व्यापक व्यवस्थाएं काम करती हैं। इसलिए कार्यवाही का बार-बार बाधित होना केवल राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करता, बल्कि संसदीय संसाधनों के इस्तेमाल पर भी सवाल खड़ा करता है।

2012 का अनुमान बताता है कार्यवाही की लागत

साल 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने बताया था कि संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही चलाने की लागत करीब 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट थी। यानी दोनों सदनों को मिलाकर एक घंटे की कार्यवाही की लागत लगभग 1.5 करोड़ रुपये बैठती थी। हालांकि यह आंकड़ा एक दशक से अधिक पुराना है और आज की वास्तविक लागत इससे अधिक हो सकती है। सरकार की ओर से इस संबंध में कोई नया आधिकारिक प्रति-मिनट अनुमान उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे वर्तमान खर्च का सटीक आंकड़ा नहीं, बल्कि पुराने अनुमान के रूप में देखना उचित होगा।

मानसून सत्र में शुरुआती दिनों में कार्यवाही प्रभावित

20 जुलाई से शुरू हुए मानसून सत्र में लगातार व्यवधान के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही प्रभावित हुई है। सत्र के शुरुआती 15 दिनों में दोनों सदनों को मिलाकर करीब 180 घंटे की कार्यवाही होनी थी, लेकिन वास्तविक कामकाज लगभग 39 घंटे ही हो सका। राज्यसभा करीब 23 घंटे, जबकि लोकसभा लगभग 16 घंटे ही चल सकी। यानी निर्धारित समय का बड़ा हिस्सा हंगामे और स्थगन की भेंट चढ़ गया।

जब सदन चला तो हुआ अपेक्षाकृत लंबा कामकाज

हालांकि कुछ दिन ऐसे भी रहे जब सदनों ने अपेक्षाकृत लंबा काम किया। उदाहरण के लिए, 28 जुलाई को लोकसभा ने करीब 8.83 घंटे और 30 जुलाई को करीब 6.65 घंटे काम किया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जब सदन सामान्य रूप से चलता है तो महत्वपूर्ण विधायी और संसदीय कामकाज के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध हो सकता है।

व्यवधान का अनुमानित आर्थिक मूल्य भी बड़ा

अगर 2012 में बताए गए 1.25 लाख रुपये प्रति मिनट प्रति सदन के अनुमान को आधार मानें, तो निर्धारित समय और वास्तविक कामकाज के बीच का बड़ा अंतर आर्थिक नुकसान की ओर भी इशारा करता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, राज्यसभा में लगभग 3,780 मिनट और लोकसभा में करीब 4,440 मिनट की कार्यवाही नहीं हो सकी। 2012 के अनुमान के आधार पर राज्यसभा के लिए यह राशि करीब 47.25 करोड़ रुपये और लोकसभा के लिए करीब 55.50 करोड़ रुपये बैठती है। दोनों को मिलाकर यह लगभग 102.75 करोड़ रुपये का अनुमानित मूल्य बनता है।

असली नुकसान पैसे से कहीं बड़ा है

दरअसल, संसद में व्यवधान का सबसे बड़ा नुकसान आर्थिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक है। मान लीजिए किसी सांसद के क्षेत्र में अस्पताल की कमी है, किसी गांव में सड़क नहीं बनी है, किसानों को किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है या किसी सरकारी योजना के क्रियान्वयन में समस्या है। सांसद इन मुद्दों को प्रश्नकाल या शून्यकाल में उठा सकता है। लेकिन अगर कार्यवाही लगातार स्थगित होती रहे तो सवाल सदन तक पहुंच ही नहीं पाता।

स्वस्थ बहस से कानून भी होते हैं बेहतर

संसद में स्वस्थ बहस का उद्देश्य सिर्फ सरकार को घेरना नहीं, बल्कि कानूनों को बेहतर बनाना भी है। विधेयकों पर चर्चा के दौरान अलग-अलग दलों के सांसद अपने अनुभव और सुझाव रखते हैं। इससे कानून में संभावित कमियों को दूर करने और उसे अधिक प्रभावी बनाने का अवसर मिलता है। इसलिए हंगामे के कारण चर्चा का समय कम होने पर नुकसान सिर्फ सरकार या विपक्ष का नहीं, बल्कि उस पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का होता है, जिसमें जनता के हित में कानून बनाए जाते हैं।

नए सांसदों के लिए संसद सबसे महत्वपूर्ण मंच

संसद में पहली बार चुनकर आए सांसदों के लिए सदन उनके क्षेत्र की आवाज को राष्ट्रीय मंच देने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होता है। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले जनप्रतिनिधियों के पास अपने इलाकों से जुड़े कई ऐसे मुद्दे होते हैं, जो राष्ट्रीय मीडिया या बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाते। संसद उन्हें इन मुद्दों को देश के सामने रखने का अवसर देती है।

व्यवधान से कमजोर आवाजों पर पड़ सकता है असर

अगर सदन लगातार बाधित रहता है तो नए सांसदों सहित ऐसे जनप्रतिनिधियों के पास अपनी बात रखने के अवसर कम हो जाते हैं। इसका असर उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जिनकी आवाज पहले से ही सार्वजनिक विमर्श में कम सुनाई देती है। संसद का प्रभावी संचालन इसलिए जरूरी है, ताकि देश के हर हिस्से और हर वर्ग से जुड़े मुद्दों को लोकतांत्रिक मंच मिल सके।

संसद का चलना लोकतंत्र की जीत

संसद सिर्फ कानून बनाने की जगह नहीं है। यह वह संस्था है जहां सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है, विपक्ष अपनी भूमिका निभाता है और जनता के प्रतिनिधि अपने मतदाताओं की आवाज देश के सामने रखते हैं। इसलिए संसद का चलना किसी एक पार्टी, सरकार या विपक्ष की जीत नहीं है। संसद का सुचारू रूप से चलना लोकतंत्र की जीत है।

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