महामना के गोसंरक्षण के सपने को नई उड़ान: 1935 में स्थापित हासानन्द गौशाला बनेगी आत्मनिर्भर गोसंवर्धन का राष्ट्रीय मॉडल

वृंदावन/मथुरा से प्रेरणा भारती के विशेष प्रतिनिधि द्वारा: भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा वर्ष 1935 में स्थापित ऐतिहासिक हासानन्द गौशाला अब देश में गोसंरक्षण, जैविक कृषि, ग्रामीण आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक पशुपालन का राष्ट्रीय मॉडल बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लगभग नौ दशक पुरानी यह संस्था, जिसने हजारों निराश्रित गोवंश को संरक्षण दिया है, अब आधुनिक सुविधाओं से युक्त आत्मनिर्भर गोसंवर्धन केंद्र के रूप में विकसित होने जा रही है। हमारे प्रतिनिधि ने गौशाला संचालन में जुड़े प्रमुख पदाधिकारियों से बातचीत कर निम्न विवरण एकत्रित किया।

उद्योगपतियों, शिक्षाविदों और समाजसेवियों के सहयोग से मथुरा-वृंदावन हासानन्द गोचर भूमि ट्रस्ट ने गौशाला के व्यापक विकास की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। ट्रस्ट का उद्देश्य केवल गोवंश की सेवा तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय देशी नस्लों का संरक्षण, प्राकृतिक कृषि, जैविक उत्पादों का निर्माण, ग्रामीण रोजगार और गो-आधारित अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाना भी है।

महामना का सपना, आज भी प्रेरणा

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का विश्वास था कि भारत की समृद्धि का आधार कृषि, गोवंश और ग्रामीण अर्थव्यवस्था है। 1930 के दशक में जब ब्रज क्षेत्र में गोचर भूमि तेजी से घट रही थी और निराश्रित गायों की संख्या बढ़ रही थी, तब उन्होंने संतों, समाजसेवियों और गोभक्तों के सहयोग से “मथुरा-वृंदावन हासानन्द गोचर भूमि ट्रस्ट” की स्थापना की।

इस ट्रस्ट के माध्यम से धौरेरा क्षेत्र में विशाल गोचर भूमि सुरक्षित की गई, ताकि भारतीय देशी नस्लों का संरक्षण हो सके और गोवंश को प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। यही दूरदर्शी पहल आज ब्रज की सबसे प्रतिष्ठित गौशालाओं में से एक के रूप में पहचानी जाती है।

संत हासानन्द महाराज की प्रेरणा

गौशाला का नाम संत हासानन्द महाराज की स्मृति में रखा गया, जिनकी शिक्षाएँ गो-सेवा, करुणा और लोककल्याण पर आधारित थीं। उनके आदर्शों से प्रेरित होकर यह संस्था आज भी सेवा, संरक्षण और संस्कार की परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

1300 से अधिक गोवंश का विशाल परिवार

वर्तमान में हासानन्द गौशाला में लगभग 1300 गोवंश संरक्षित हैं। यहाँ साहीवाल, गिर, थारपारकर, राठी और हरियाणा जैसी श्रेष्ठ भारतीय देशी नस्लों का संरक्षण एवं संवर्धन किया जा रहा है।

इनमें लगभग 220 दुधारू गायें हैं, जिनसे प्रतिदिन औसतन 1200 से 1300 लीटर दूध प्राप्त होता है। यह दूध गुणवत्ता, शुद्धता और पोषण के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

700 एकड़ में विकसित हो रहा आत्मनिर्भर गोसंवर्धन केंद्र

गौशाला का विकास चरणबद्ध रूप से लगभग 700 एकड़ क्षेत्र में किया जा रहा है। वर्तमान में परिसर में—

  • 5.6 एकड़ में मुख्य गौशाला,
  • 100 एकड़ में गोग्राम,
  • 5 एकड़ में मालवीय मंडप,
  • 12–15 एकड़ में नंदी संवर्धन केंद्र,
  • तथा लगभग 500 एकड़ कृषि भूमि उपलब्ध है।

इसी कृषि भूमि में पशुओं के लिए चारा उगाया जाता है तथा गोबर आधारित जैविक खेती की जाती है, जिससे गौशाला आत्मनिर्भर बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही है।

अनुशासन और सेवा का अद्भुत उदाहरण

हासानन्द गौशाला की दिनचर्या अत्यंत व्यवस्थित और अनुशासित है।

प्रतिदिन सुबह 4:30 बजे पूरे परिसर की सफाई होती है। इसके बाद दुधारू गायों का दूध निकाला जाता है और उन्हें खुले वातावरण में घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है।

दोपहर 1 बजे पौष्टिक चारा दिया जाता है। 2:30 बजे पुनः उन्हें खुले क्षेत्र में छोड़ा जाता है और इसी दौरान गौशाला की दूसरी बार सफाई की जाती है। इसके बाद शाम को फिर चारा दिया जाता है तथा 3:30 से 4 बजे के बीच दूसरी बार दुग्ध उत्पादन किया जाता है।

यह अनुशासित व्यवस्था पशुओं के स्वास्थ्य, स्वच्छता और उत्पादन क्षमता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बछड़ों की देखभाल सर्वोच्च प्राथमिकता

गौशाला में जन्म लेने वाले प्रत्येक बछड़े की विशेष देखभाल की जाती है।

प्रसव के बाद पहले 6–7 दिन तक पूरा दूध बछड़े के लिए छोड़ा जाता है। इसके बाद ही दूध दुहना प्रारंभ किया जाता है। बछड़े दो से तीन महीने तक केवल दूध पीते हैं और धीरे-धीरे ठोस आहार ग्रहण करना शुरू करते हैं। लगभग सात से आठ महीने तक उन्हें दूध पिलाया जाता है, जिससे उनका स्वस्थ विकास सुनिश्चित हो सके।

वैज्ञानिक पशुपालन की आधुनिक व्यवस्था

गौवंश की श्रेष्ठ नस्लों के संरक्षण के लिए यहाँ कृत्रिम गर्भाधान की वैज्ञानिक तकनीक अपनाई जाती है। प्रत्येक पशु को उसकी आयु, स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता के अनुसार संतुलित आहार दिया जाता है।

गौशाला में स्थापित आधुनिक फीड प्लांट में उच्च गुणवत्ता वाला पशु आहार तैयार किया जाता है, जिससे गायों को आवश्यक पोषण मिल सके।

गौशाला से निकलने वाले गोबर का उपयोग जैविक खेती में किया जाता है, जिससे प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा मिलता है।

100 से अधिक लोगों को मिला रोजगार

इस विशाल गौशाला के संचालन में 100 से अधिक कर्मचारी प्रतिदिन कार्यरत हैं। पशुपालक, पशु चिकित्सक, तकनीकी विशेषज्ञ, कृषि कर्मी और अन्य सहयोगी मिलकर गोवंश की देखभाल, दुग्ध उत्पादन, चारा प्रबंधन और स्वच्छता व्यवस्था का संचालन करते हैं।

आधुनिक सुविधाओं से बनेगा राष्ट्रीय स्तर का गोसंवर्धन केंद्र

ट्रस्ट द्वारा तैयार विकास योजना के अंतर्गत यहाँ—

  • सीमन (वीर्य) बैंक,
  • भ्रूण प्रत्यारोपण केंद्र,
  • आधुनिक दूध प्रसंस्करण एवं चिलिंग प्लांट,
  • गोबर एवं गोमूत्र आधारित औषधीय उत्पाद निर्माण इकाई,
  • पंचकर्म एवं प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र,
  • 50 कमरों का अतिथि गृह,
  • सम्मेलन कक्ष,
  • यज्ञशाला एवं अष्टकोणीय यज्ञ स्तंभ,
  • पाँच लाख लीटर क्षमता की जल टंकी,
  • वर्षा जल संचयन प्रणाली,
  • आधुनिक गौ चिकित्सालय,
  • बायोगैस संयंत्र,
  • सौर ऊर्जा संयंत्र,
  • जैविक खेती एवं अभयारण्य केंद्र,
  • चारा उत्पादन इकाई

जैसी अत्याधुनिक सुविधाएँ विकसित की जाएँगी।

साथ ही डेयरी किसानों, पशुपालकों और गो-आधारित लघु एवं कुटीर उद्योगों से जुड़े युवाओं के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित किए जाएंगे, जिससे ग्रामीण रोजगार और आत्मनिर्भरता को नई गति मिलेगी।

सेवा, संस्कृति और सतत विकास का संगम

आज हासानन्द गौशाला केवल एक गौशाला नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, वैज्ञानिक पशुपालन, पर्यावरण संरक्षण, जैविक कृषि और ग्रामीण विकास का जीवंत केंद्र बन चुकी है। उत्तर प्रदेश सरकार की पंजीकृत गौशालाओं में इसका नाम दर्ज है और यह संस्था देशभर के गोसेवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने जिस गोसंरक्षण के स्वप्न को 1935 में ब्रज की पावन भूमि पर रोपा था, वह आज हजारों गोवंश की सेवा, आधुनिक प्रबंधन, जैविक कृषि और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रूप में एक विशाल वटवृक्ष बनकर समाज को नई दिशा दे रहा है। आने वाले वर्षों में हासानन्द गोसंवर्धन केंद्र न केवल ब्रज, बल्कि पूरे देश के लिए गो-आधारित समग्र विकास का एक आदर्श मॉडल बनने की ओर अग्रसर है।

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