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भूमिहार ब्राह्मण को लेकर अपनी ही सरकार का विरोध किया भाजपा विधायकों ने,उप मुख्यमंत्री ने भ्रमित करने वाले शब्दों पर तत्काल रोक लगाई जाने की भी बात कही
अनिल मिश्र/पटना
आज शुक्रवार को बिहार विधानसभा में सरकार ने सरकारी दस्तावेजों और रिकॉर्ड में भूमिहार जाति के आगे ‘ब्राह्मण’ शब्द जोड़ने पर रोक स्पष्ट करते हुए कहा है कि केवल ‘भूमिहार’ शब्द ही दर्ज किया जाएगा। बिहार विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सरकार ने स्पष्ट किया कि जाति के नाम में ‘ब्राह्मण’ शब्द जोड़ने से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, जिस पर सत्ता पक्ष के विधायकों ने भी सदन में विरोध दर्ज कराया।इस संबंध में बिहार के उपमुख्यमंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने स्पष्ट किया कि सरकारी अभिलेखों में जाति का नाम केवल ‘भूमिहार’ ही लिखा जाएगा। वहीं भारतीय जनता पार्टी के दो विधायकों जीवेश मिश्रा और विशाल प्रशांत ने सदन में अपनी ही सरकार के इस रुख का कड़ा विरोध किया। इस संबंध में ऐतिहासिक हवाला देते हुए विधायक पक्ष का तर्क है कि 1931 की जनगणना और कई पुराने राजस्व दस्तावेजों में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ दर्ज रहा है, इसलिए कागजातों में एकरूपता होनी चाहिए।बिहार में भूमिहार ब्राह्मण विवाद ने एक बार फिर सियासी तूल पकड़ लिया है। विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि भूमिहार जाति को सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ भूमिहार ही लिखा जाएगा। भूमिहार ब्राह्मण शब्द पर रोक लगा दी गई है। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों ने अपनी ही सरकार को घेरना शुरू कर दिया। इससे आज शुक्रवार को सदन में गहमागहमी का माहौल नजर आया।इस बीच मिथिलांचल के नाम से मशहूर दरभंगा के जाले विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक जिवेश कुमार उर्फ जीवेश मिश्रा ने ध्यान आकर्षण के तहत भूमिहार ब्राह्मण का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के अभिलेखों और गजट आदि में संबंधित जाति का नाम भूमिहार ब्राह्मण दर्ज है। जबकि वर्तमान में बिहार सरकार की जाति सूची और जाति प्रमाण पत्रों में सिर्फ भूमिहार ही लिखा जा रहा है। इससे दस्तावेजों में विसंगति और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। वहीं इस बहस के दौरान तरारी से भाजपा विधायक विशाल प्रशांत ने कहा कि अगर सरकार भूमिहार ब्राह्मण नहीं लिखना चाहती तो भूमिहार समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा देने पर विचार करे। उनका कहना था कि 1931 के बाद के कई सरकारी रिकॉर्ड में भी भूमिहार ब्राह्मण दर्ज है और सरकार को इसकी जांच करानी चाहिए। इसके बाद विशाल प्रशांत ने बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी अपनी बात दोहराई। उन्होंने कहा कि अगर सरकार की यही नीति है तो भूमिहार समाज को एससी का दर्जा देने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उनके मुताबिक समाज का बड़ा वर्ग सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, इसलिए इस विषय को केवल औपचारिक जवाब देकर खत्म नहीं किया जा सकता। जबकि बिहार के उपमुख्यमंत्री एवं सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने इस पर टिप्पणी करते हुए भूमिहार जाति को भूमिहार ब्राह्मण लिखे जाने के प्रस्ताव पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उच्च जाति आयोग ने साल 2015- 2019 में स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनमें हिंदु समुदाय के अंतर्गत सवर्ण वर्ग में चार जातियां अंकित की गई थीं। इनके नाम- ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ है। इसलिए आगे इस पर किसी तरह का विचार करने का सवाल नहीं उठता है।इस बीच भाजपा विधायक ने डिप्टी सीएम को टोका कि उन्होंने उनके सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद उपमुख्यमंत्री फिर सदन में खड़े हुए और कहा कि विभिन्न सामाजिक संगठनों से मिले आवेदन के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने 10 अक्टूबर 2025 को उच्च जाति आयोग से मंतव्य मांगा था। आयोग ने 19 दिसंबर 2025 को इसका जवाब देते हुए बताया कि जनवरी 2025 में आयोग की बैठक हुई थी। उसमें सर्वसम्मिति से यह फैसला लिया गया कि भूमिहार जाति का नाम बदलने का कोई विचार नहीं है। ना ही आयोग ने ऐसी कोई अनुशंसा की है।इस बीच बिहार के उपमुख्यमंत्री विजेन्द्र प्रसाद यादव ने कहा कि “भूमिहार ब्राह्मण” जैसे भ्रमित करने वाले शब्दों पर तत्काल रोक लगाई जाए, संभव हो तो जरूरी सुधार किए जाएं। हालांकि बिहार विधानसभा में आज सरकार द्वारा और इस जाति से ताल्लुक रखने वाले विधायकों से तकरार होने के साथ -साथ कुछ सामाजिक और ऐतिहासिक मत भी हैं। जैसे –कृषक ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण) इतिहासकारों- (जैसे महापंडित राहुल सांकृत्यायन) के अनुसार, भूमिहार मूलत- ब्राह्मण ही थे, जिन्होंने दान लेने (याचक) और पुरोहिताई का कार्य त्यागकर कृषि (अयाचक) को अपना मुख्य व्यवसाय बना लिया। वहीं पौराणिक मत- इस समुदाय के लोग खुद को भगवान परशुराम का वंशज और ब्रह्मर्षि मानते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान परशुराम ने क्षत्रियों का नाश किया, तब पृथ्वी के संचालन के लिए उन्होंने ब्राह्मणों को भूमि का स्वामित्व सौंपा।राजा हर्षवर्धन का काल-कई इतिहासकारों का मानना है कि सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल (606-647 ईस्वी) के दौरान, जिन ब्राह्मणों को अग्रहार (दान में दी जाने वाली भूमि या गाँव) प्राप्त हुए और वे कृषि व जमींदारी से जुड़ गए, वे कालांतर में भूमिहार के रूप में पहचाने गए।