(लेकिन इस निषेध की कीमत कितनी होती है, यह किसी ने कभी नहीं पूछा।)
पुरुष केवल एक शरीर की तलाश में नहीं रहता। पुरुष होने का अर्थ है परिवार की जिम्मेदारी उठाने योग्य होना, कमाने वाला होना, सक्षम होना।
एक नौकरी, और उससे भी कहीं अधिक…
सीने में दबे हुए दुःख को गैस्ट्रिक का नाम देकर, लोगों की नजरों से छिपाकर या स्वयं भी उसे अनदेखा करने का अभिनय करते हुए आंखों के आंसू पोंछ लेने वाले पुरुष क्या सचमुच कभी किसी स्त्री के साथ विश्वासघात करते हैं? किसी विशाल कंक्रीट के घर के आंगन में किसी प्रियजन द्वारा लगाए गए फूलों के बीच उसी प्रियजन की स्मृतियों को खोजते हुए अकेले उदास बैठा पुरुष क्या केवल शरीर का ही आनंद लेना जानता है?
एक शांत नदी की तरह गहरे और स्थिर होकर जीवन के समतल पर बहने वाले पुरुष ही अच्छी तरह जानते हैं कि पत्थर जैसी भारी वास्तविकताएं क्या होती हैं, हृदय का बोझ क्या होता है, परिवार की उम्मीदें क्या होती हैं और प्रेम क्या होता है।
कुछ लोगों की नजर में महंगे सूट-बूट पहनने वाला, प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला युवक, एक शानदार कार, बड़ा घर और जेब में भरा पैसा ही पुरुष की पहचान है। लेकिन माथे के पसीने और संघर्ष की असली परिभाषा से दूर रहने वाले लोग नहीं जानते कि सीमित कपड़ों को धोकर बार-बार पहन लेने में भी एक पुरुष का संतोष छिपा होता है; अपने बच्चे की शिकायत दूर करने के लिए अपनी भूख को नजरअंदाज कर देना क्या होता है; प्रेमिका की सांसारिक अपेक्षाएं पूरी करने के लिए स्वयं को खपा देना क्या होता है; परिवार की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों में इतना उलझ जाना कि स्वयं की ओर देखने का भी समय न मिले; या केवल नौकरी न होने के कारण मिलने वाली आलोचनाओं की कड़वी आवाजों को चुपचाप अपने भीतर संजोकर रखना कितना पीड़ादायक होता है।
प्रेम को बांटना कितना कठिन है—एक हिस्सा मां के लिए, एक हिस्सा पत्नी के लिए!
स्वाभाविक है कि कोई भी पिता अपनी बेटी का हाथ किसी अयोग्य व्यक्ति के हाथ में नहीं सौंपना चाहता। वह स्वयं भी एक पुरुष है। वह अपनी संतान के प्रति उत्तरदायी है। हालांकि कई लोग इस “अयोग्यता” को केवल नौकरी न होने के अर्थ में देख लेते हैं।
पुरुषों की भी आंखों में आंसू होते हैं। अंतर केवल इतना है कि वे हिमनदों की तरह भीतर ही भीतर जमे रहते हैं।
पुरुषों का भी एक विशाल हृदय होता है…
किसी पुरुष ने ही मुझसे कहा था, “महिलाओं की तुलना में पुरुषों में हृदय रोग से मृत्यु की दर अधिक होती है।”
टिप्पणी:
एक स्त्री होकर पुरुष को पूरी तरह समझ पाना, या एक पुरुष होकर स्त्री को पूरी तरह महसूस कर पाना अत्यंत कठिन है। जिस प्रकार स्त्री का जीवन केवल मासिक धर्म या गर्भधारण तक सीमित नहीं है, उसी प्रकार पुरुष भी केवल सरकारी नौकरी और प्रेम-विछोह की कहानियों तक सीमित नहीं है।
जिस तरह समाज स्त्री को रहस्यमयी कहता है, उसी तरह एक पुरुष भी गहरे नीले समुद्र के समान है, जिसकी सतह भले शांत दिखाई दे, लेकिन उसके भीतर अनगिनत तूफान, त्याग, पीड़ाएं और अनकही कहानियों की लहरें छिपी रहती हैं।
समुद्र की गहराई जैसे आंखों से दिखाई नहीं देती, वैसे ही पुरुष की अनेक पीड़ाएं भी शब्द न पाकर उसके भीतर ही डूब जाती हैं।
(यहां “पुरुष” शब्द का प्रयोग केवल पुरुष लिंग के संदर्भ में किया गया है।)
— बबिता बोरा
लेखिका एवं असम पुलिस में उप-निरीक्षक