105वीं बरसी पर गूंजा “मुलुक चलो आंदोलन” का इतिहास

105वीं बरसी पर गूंजा “मुलुक चलो आंदोलन” का इतिहास

चरगोला एक्सोडस को स्वतंत्रता संग्राम का अभिन्न अध्याय बताते हुए स्थायी स्मारक निर्माण की उठी मांग

चंद्रशेखर ग्वाला, शिलचर, 21 मई।

1921 के ऐतिहासिक “चरगोला एक्सोडस” अथवा “मुलुक चलो आंदोलन” की 105वीं वर्षगांठ पर बुधवार को बराक घाटी में विभिन्न संगठनों द्वारा वीर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर बराक चाय श्रमिक यूनियन कार्यालय में आयोजित श्रद्धांजलि एवं वक्तृता सभा में आंदोलन के इतिहास, उसके बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम में उसके महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं चाय श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने अस्थायी शहीद वेदी पर पुष्प अर्पित कर आंदोलन के वीर शहीदों को नमन किया।

सभा को संबोधित करते हुए बराक चाय श्रमिक यूनियन के उपदेष्टा डॉ. संतोष रंजन चक्रवर्ती ने बराक घाटी के प्रमुख नगरों में “मुलुक चलो आंदोलन” के शहीदों की स्मृति में स्थायी स्मारक निर्माण की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि गिरमिटिया चाय श्रमिकों के इस ऐतिहासिक जनआंदोलन को उपेक्षित करना हमारी ऐतिहासिक चेतना की कमी को दर्शाता है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं प्रख्यात साहित्यकार-शोधकर्ता डॉ. अमलेंदु भट्टाचार्य ने 1921 में चरगोला में ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए दमन और हत्याकांड का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन की क्रूरता के कारण अनेक चाय श्रमिक गोलियों का शिकार हुए, जबकि कई महिलाएं, पुरुष और बच्चे मेघना नदी में डूबकर शहीद हो गए। उन्होंने कहा कि यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील अध्याय है।

सभा में बराक हिंदी साहित्य समिति, बराक चाय श्रमिक यूनियन, बराक वैली चाय युवा कल्याण समिति सहित जिले के विभिन्न चाय श्रमिक संगठनों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

इधर, लखीपुर विधानसभा क्षेत्र में भी बराक वैली चाय जनगोष्ठी उन्नयन समिति द्वारा “मुलुक चलो आंदोलन” के शहीदों को श्रद्धापूर्वक याद किया गया। लाबक चाय बागान स्थित जगन्नाथ मंदिर परिसर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में समिति के महासचिव प्रणज्योति मिश्रा ने आंदोलन की पृष्ठभूमि और शहीदों के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।

वक्ताओं ने कहा कि 21 मई असम के चाय बागान श्रमिकों के साहस, स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक दिवस है। उन्होंने बताया कि बराक घाटी के आनीपुर चाय बागान से शुरू हुए इस आंदोलन में हजारों श्रमिक ब्रिटिश अत्याचारों से तंग आकर अपने मूल स्थान लौटने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों देवसरण त्रिपाठी, गंगादयाल दीक्षित और राधाकृष्ण पांडेय के आह्वान पर एकजुट हुए थे।

सभा में वक्ताओं ने यह भी कहा कि इस ऐतिहासिक घटना को केवल “चरगोला एक्सोडस” तक सीमित कर देखना उचित नहीं है। देशबंधु चित्तरंजन दास ने स्वयं इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अभिन्न हिस्सा माना था। उस समय के कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने इस हत्याकांड की तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की थी।

वक्ताओं ने सरकार से मांग की कि “मुलुक चलो आंदोलन” के इतिहास को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए तथा शहीदों की स्मृति में स्थायी स्मारक स्थापित कर आने वाली पीढ़ियों को इस बलिदान गाथा से परिचित कराया जाए।

 

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