फकीरटीला में संपन्न श्रीराम कथा के दौरान प्रेरणा भारती न्यूज़ नेटवर्क से विशेष बातचीत
शिलचर | 4 फरवरी | प्रेरणा भारती न्यूज़ नेटवर्क
एनआईटी शिलचर के समीप फकीरटीला में आयोजित तीन दिवसीय श्रीराम कथा, यज्ञ एवं संत सम्मेलन भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा के वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर भगवान श्रीराम की कथा का भावपूर्ण श्रवण किया। सुबह से देर शाम तक भजन, प्रवचन और आरती के क्रम से पूरा इलाका राममय बना रहा।
इस भव्य आयोजन में काशी से दीक्षित 16 वर्षीय बाल संत श्री रामेश्वरानंद जी ब्रह्मचारी ने श्रीराम कथा का वाचन किया। अल्प आयु में गहन आध्यात्मिक ज्ञान, संयमित जीवनशैली और ओजस्वी वाणी के कारण वे देशभर में श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान बना चुके हैं। उनकी सरल अभिव्यक्ति और गूढ़ विचारों ने श्रोताओं को विशेष रूप से प्रभावित किया।
“आत्मा अमर है, केवल शरीर बदलता है”
कार्यक्रम के दौरान प्रेरणा भारती न्यूज़ नेटवर्क से विशेष बातचीत में बाल संत रामेश्वरानंद जी ने गीता के संदर्भ में कहा कि “आत्मा का न जन्म होता है और न ही मृत्यु, केवल शरीर का परिवर्तन होता है।”
उन्होंने बताया कि संभवतः पूर्व जन्मों के पुण्य के कारण उन्हें कम उम्र में ही आध्यात्मिक मार्ग अपनाने का सौभाग्य मिला।
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि उनकी दीक्षा शंकर मठ के परम पूज्य अध्यक्ष स्वामी तपनानंद गिरिजी महाराज से हुई है तथा वर्तमान में उनका अध्ययन काशी में चल रहा है। काशी को उन्होंने ज्ञान और साधना की भूमि बताते हुए कहा कि वहां का वातावरण साधकों को आत्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।
श्रीराम के आदर्श आज भी प्रासंगिक
भगवान श्रीराम के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बाल संत ने कहा कि श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और उनका जीवन अनुशासन, संयम, सेवा, त्याग और बड़ों के सम्मान का सर्वोत्तम उदाहरण है। आज के युवाओं को चाहिए कि वे श्रीराम के आदर्शों को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई “प्रातःकाल उठिके रघुनाथ…” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान राम प्रतिदिन माता-पिता और गुरु को प्रणाम करते थे। इससे यह सीख मिलती है कि ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी विनम्रता बनाए रखना आवश्यक है।
रामकथा चरित्र निर्माण का माध्यम
बाल संत रामेश्वरानंद जी ने कहा कि रामकथा केवल कथा श्रवण नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण का सशक्त माध्यम है। मनुष्य और पशु में मुख्य अंतर धर्म और संस्कार का होता है, और रामकथा मनुष्य को सही मार्ग दिखाकर उसे एक अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देती है।
रामचरितमानस की चर्चित चौपाई “ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी…” पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा कि इसका गलत अर्थ निकाला जाता है। गोस्वामी तुलसीदास नारी या शूद्र विरोधी नहीं थे। शबरी और अहिल्या जैसे पात्रों के माध्यम से उन्होंने समाज में समानता और करुणा का संदेश दिया। शास्त्रों का सही अर्थ गुरु के मार्गदर्शन में ही समझा जाना चाहिए।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति—एकता
देश के विभिन्न हिस्सों में कथा वाचन के अनुभव साझा करते हुए बाल संत ने कहा कि भारत विविधताओं का देश होते हुए भी एकता, इंसानियत और धर्म की भावना से जुड़ा हुआ है, जो इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
भविष्य की दिशा
भविष्य को लेकर उन्होंने कहा कि वे अपने गुरुजी के निर्देशानुसार साधना, भजन और समाज सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ते रहेंगे। उनका उद्देश्य आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
श्रद्धा और व्यवस्था का संगम
तीन दिवसीय इस आयोजन में आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। स्थानीय समिति एवं स्वयंसेवकों ने सुरक्षा, स्वच्छता और प्रसाद वितरण की व्यवस्थाएं सुचारु रूप से संभालीं।
3 फरवरी को वैदिक मंत्रोच्चार, पूर्णाहुति और आरती के साथ यज्ञ एवं हवन का विधिवत समापन हुआ। अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर आयोजन समिति की सराहना की।

श्रीराम कथा के समापन के बाद 4 फरवरी को प्रेरणा भारती न्यूज़ नेटवर्क से हुई विशेष बातचीत में बाल संत श्री रामेश्वरानंद जी के विचारों ने श्रोताओं और दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।
फकीरटीला में आयोजित यह श्रीराम कथा, यज्ञ एवं संत सम्मेलन न केवल धार्मिक आस्था को सशक्त करने में सफल रहा, बल्कि समाज में संस्कार, नैतिकता और सद्भाव की भावना को भी मजबूती प्रदान करने वाला सिद्ध हुआ। श्रद्धालुओं ने इसे एक यादगार और प्रेरणादायक आयोजन बताया।
