हाइलाकांदी पंचायत चुनाव: महिला उम्मीदवारों की तस्वीरें गायब, प्रचार पर छाए ‘प्रतिनिधि’

शंकरी चौधुरी, हाइलाकांदी, 22 अप्रैल:
आगामी पंचायत चुनावों को लेकर हाइलाकांदी जिले में प्रचार अभियान पूरे जोरों पर है, लेकिन इस बार प्रचार वाहनों और पोस्टरों पर एक असामान्य प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। अधिकांश राजनीतिक दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के प्रचार सामग्री पर असली उम्मीदवारों की बजाय उनके प्रतिनिधियों – खासकर पतियों और पिताओं – की तस्वीरें प्रमुखता से दिखाई दे रही हैं।

इस चलन की वजह से मतदाताओं में नाराजगी और असंतोष बढ़ रहा है। खासकर महिला उम्मीदवारों के मामले में यह प्रवृत्ति अधिक देखने को मिल रही है। चुनावी पोस्टरों और बैनरों में स्वयं महिला उम्मीदवारों की तस्वीरें नदारद हैं, लेकिन उनके पतियों या पिता की तस्वीरें प्रमुखता से प्रकाशित की जा रही हैं।

प्रचार में ‘प्रतिनिधियों’ की प्रधानता
उदाहरण के तौर पर, कांग्रेस की ओर से कालीनगर-पाईकान जिला परिषद सीट पर चुनाव लड़ रहीं नाछिमा फेरदौसी लस्कर की तस्वीर प्रचार वाहन पर नहीं है, जबकि उनके पति कबीर उद्दीन लस्कर की तस्वीर वहाँ चमक रही है।

ऐसा ही दृश्य भाजपा-अगप गठबंधन की एक जनसभा में देखने को मिला, जब असम गण परिषद की उम्मीदवार साहिना खानम लस्कर के स्थान पर उनके पति हुसैन अहमद लस्कर मंच पर प्रतिनिधि के तौर पर खड़े हो गए। इस पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप शइकिया तक हैरान रह गए और मंच पर असहज स्थिति उत्पन्न हो गई।

एजीपी की महिला उम्मीदवारें भी तस्वीरविहीन
जामिरा साहाबाद जिला परिषद सीट पर एजीपी की उम्मीदवार रहीमा बेगम लस्कर की जगह उनके पति रफीक अहमद लस्कर की तस्वीर प्रचार में है। इसी तरह, नारायणपुर-बंदूकमारा सीट से फिरुजा आमिन बड़लस्कर की जगह उनके पति मैनुल इस्लाम माझारभुइयां की तस्वीरें प्रचार सामग्री में दिखाई दे रही हैं।

महिला सशक्तिकरण पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम से यह सवाल उठता है कि क्या वाकई महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं, या सिर्फ नाम भर से वे उम्मीदवार हैं? मतदाताओं में यह धारणा गहराने लगी है कि पुरुष ही चुनावी राजनीति की कमान संभाले हुए हैं, और महिलाएं केवल एक औपचारिक चेहरा बनकर रह गई हैं।

यद्यपि सरकार महिला सशक्तिकरण की बात करती है, पर ज़मीनी हकीकत इससे उलट है। पिछली पंचायती व्यवस्था में भी कई बार देखा गया कि पुरुष प्रतिनिधियों ने महिला प्रतिनिधियों की ओर से अधिकारों का प्रयोग किया। वे न केवल फैसलों में भाग लेते हैं, बल्कि सरकारी बैठकों में भी सक्रिय रूप से उपस्थित रहते हैं।

जनता की नाराजगी और लोकतंत्र पर असर
इस तरह की घटनाएं स्थानीय लोकतंत्र की आत्मा को आहत करती हैं और महिला सशक्तिकरण को केवल सरकारी दस्तावेज़ों तक सीमित कर देती हैं। मतदाताओं का कहना है कि यह प्रवृत्ति बंद होनी चाहिए और हर उम्मीदवार, विशेषकर महिलाएं, खुद सामने आकर जनता से संवाद करें।

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