वर्तमान असहिष्णुता के दौर में अधिक प्रासंगिक हो गया है स्याद्वाद– सीताराम गुप्ता

यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि आज से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व एक ही युग मेंमहावीर, बुद्ध और कन्फ़्यूशियस जैसे युग प्रवर्तक महापुरुष एक साथ ही विश्व फलक पर उभरे जिन्होंने अपने विचारों द्वारा पूरे विश्व में एक क्रांति सी ला दी। संभवतः समय की ज़रूरत ने ही महावीर, बुद्ध अथवा कन्फ़्यूशियस को युग प्रवर्तक महापुरुष बना दिया। ये वो समय था जब धर्म के नाम पर कर्मकांड तथा आडंबर, पशुबलि के रूप में हिंसा व वैचारिक जड़ता के रूप में असहिष्णुता अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। भारतभूमि पर महावीर और बुद्ध दोनों ने ही इन बुराइयों को समझा। उन्होंने हिंसा व असहिष्णुता आदि दुर्गुणों से मुक्ति के लिए चित्त की निर्मलता पर बल दिया। आज विश्व के अनेक भागों में जो वैचारिक जड़ता व उसके फलस्वरूप जो असहिष्णुता व्याप्त है ऐसे में महावीर स्वामी के जीवन व उनकी शिक्षाओं को जान-समझकर उन्हें आत्मसात करना अनिवार्य प्रतीत होता है। महावीर स्वामी का बचपन का नाम था वर्द्धमान। वे राजकुमार वर्द्धमान से महावीर कैसे बने? कहा जाता है कि उन्होंने एक भयानक सिंह को काबू में करने के बाद ये उपाधि प्राप्त की थी। वास्तव में इंद्रियों को वश में करने वाला सबसे बड़ा योद्धा है। यही किया था राजकुमार वर्द्धमान ने और महावीर की उपाधि प्राप्त की थी। आज हम बात-बात पर आपे से बाहर हो जाते हैं। सिर्फ अपना पक्ष देखते हैं अपनी विचारधारा के पूर्वाग्रही हैं। जैन धर्म में एक सिद्धांत या तत्त्व है स्याद्वाद जिसका सामान्य-सा अर्थ है हो सकता है या संभव है। इसमें किसी की किसी भी प्रकार की विचारधारा का खंडन नहीं किया जाता चाहे वह हमारी विचारधारा से कितनी भी अलग या विपरीत क्यों न हो। मान लीजिए हम पूर्णतः शाकाहारी हैं और कोई ये कहे कि मांस खाना अच्छी बात है तो भी हम तत्क्षण उसकी बात का विरोध अथवा खंडन करने की बजाय मात्र ये कह दें कि भाई हो सकता मांस खाना अच्छी बात हो लेकिन मैं तो पूर्णतः शाकाहारी हूँ। यदि हम ऐसा कह देते हैं तो इसका ये अर्थ कदापि नहीं कि इससे हमारे लिए मांसाहार करना अनिवार्य हो जाएगा लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि इससे कोई विवाद उत्पन्न नहीं होगा और हम किसी भी प्रकार के टकराव से बचे रहेंगे। कई बार हमें वास्तविकता का पता भी नहीं होता और हम निरर्थक विवाद में उलझ जाते हैं। आज प्रायः अधिकांश डॉक्टर मांसाहार व अंडे लेने पर बल देते हैं। हम यदि शुद्ध शाकाहारी हैं तो डॉक्टर के कहने के बावजूद मांसाहार नहीं करते लेकिन डॉक्टर का विरोध भी नहीं करते। जीवन में अन्यत्र भी हम ऐसा कर सकते हैं लेकिन नहीं करते। हम ऐसी बातों को लेकर भी उलझ पड़ते हैं जिनकी वास्तविकता से भी हम परिचित नहीं होते। अपने सिद्धांतों पर अटल रहना अच्छी बात है लेकिन दूसरों के सिद्धांतों को समझने का प्रयास करने में भी कोई दोष नहीं है। दूसरों की विचारधारा जानने- समझने के प्रयास में संभव है उसमें हमारे लिए भी कोई उपयोगी सूत्र निकल आए। लेकिन यदि हम दूसरों के विचारों को सुनेंगे ही नहीं तो कुछ नया उपयोगी सीखना और जीवन में लागू करना भी असंभव होगा। आज के समय की सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम दूसरों की विचारधारा को महत्त्व नहीं देते जिससे उसे धैर्यपूर्वक सुनना भी संभव नहीं होता। वास्तव में ये जितना सरल लगता है उतना सरल है भी नहीं। दूसरों की विचारधारा को धैर्यपूर्वक सुनना व उसे महत्त्व देना बड़ा मुश्किल काम है और इस मुश्किल काम को कोई बहादुर व्यक्ति ही कर सकता है। यही सबसे बड़ी वीरता है। जिसने दूसरे के विचारों को महत्व देना सीख लिया उसने अहिंसा का पाठ भी सीख लिया। मैत्री का सबक़ भी याद कर लिया। मन की सकारात्मक वृत्ति द्वारा हम संसार रूपी युद्ध और बाहरी शत्रुओं को स्थायी रूप से जीत कर निर्द्वंद्व जीवन व्यतीत कर सकते हैं। यही सुखी और सफल जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण व उपयोगी सूत्र है। महावीर स्वामी ने इस जीवन सूत्र को पुष्टि प्रदान की। स्वतंत्रता, आत्मज्ञान, आत्मनियंत्रण, नम्रता और क्षमाशीलता ही वीरता के लक्षण हैं बाहुबल नहीं। जो हिंस्र पशु का वध करने की अपेक्षा उसको पालतू बना कर उसे हिंसा से विरत कर सके वही वास्तविक बाहुबली है। महावीर स्वामी कहते हैं कि अपने अंदर व्याप्त सभी प्रकार के विकारों से मुक्त हो जाओ। अपने नकारात्मक भावों को दूर करो। अपने अंदर की नकारात्मकता को परास्त करो। युद्ध ही करना है तो भौतिक स्तर पर नहीं अपितु मानसिक स्तर पर करो। युद्ध ही करना है तो अपने मन की भावभूमि पर करो। अपने मन की संकीर्णता और नकारात्मकता पर चोट करो। यही वास्तविक युद्ध है। जिसने ऐसा युद्ध करना सीख लिया वही सबसे बड़ा योद्धा है। यही संदेश है महावीर स्वामी का। जिसने अपने नकारात्मक भावों, घृृणा, द्वेष, अलगाव, क्रोध, अहंकार आदि को देखकर उन पर प्रहार करने की क्षमता उत्पन्न कर ली है वही है आज का वास्तविक महावीर। इस महावीर जयंती पर हम कम से कम दूसरों की विचारधारा का आदर करने का संकल्प अवश्य लें। इसी में निहित है महावीर जयंती मनाने की प्रासंगिकता।

सीताराम गुप्ता,
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