सम्वतसर की अंतिम महारात्रि पर विशेष प्रस्तुति — आनंद शास्त्री

होलिका माई के प्यारे दुलारे सभी को मेरा ह्रद्अंतस्थल की गहराइयों से प्यार शुभकामनायें एवं साधना पथ पर निरन्तर चलते रहने की इस परम पावन महारात्रि के शुभ प्रभात पर ढेरों बधाइयाँ ! यह एक अद्वितीय प्रश्न है कि दारुण रात्रि होलिकोत्सव आज की पूर्व रात्रि को क्यों कहते हैं।
आज इसी पर तुम सबसे कुछ चर्चा करने हेतु आया हूँ।
जैसा कि कल मैंने आप सभी को होलिका माई के अमर बलिदान की कथा सुनाई थी -आप सभी जानते हैं कि मृत्यु सबकी होनी है प्रत्येक शरीर जलने के लिये ही मिला है ! यह ईंधन है महाकाल का ! किन्तु-
“जननी जन तो तीन जन-भक्त दाता या शूर।
नहीं तो रह जा बाँझ तूं-मत गंवाना नूर॥
होलिका ने प्रह्लाद को बचाने के लिये आत्मदाह किया था ! उसने इस दृष्टिकोण को अपने प्राणों की बलि देकर अपनाया था कि-
शरणागत को त्यागते निज अनहित को जान।
ते नर नरके जायेंगे कोटिक युग परिमाण॥”
अर्थात-“हरि ने गजेन्द्र को बचा लिया” उसने अपने-आप को जलाकर भक्ती की रक्षा की उसने भगवान श्री कृष्ण के इन वचनों की मर्यादा रखी कि-
“अनन्याश्चिन्त यन्तो माॅ-यो जनाः पर्युपासते।
तेषां तेनाम् भि युक्तानाम योगक्षेम वहाम्यहम॥
“मैं अपने भक्तों का योगक्षेम वहन करता हूँ ” ये तो ठीक है कि भक्त प्रह्लाद की भक्ति ने भगवान को नरसिंह रूप धारण करने हेतु बाध्य कर दिया ! किन्तु इससे भी बड़ी सच्चाई और योगक्षेम होलिका का भी हुवा। सप्तम मन्वन्तर अर्थात वैवश्वत मन्वन्तर के सम्वत् २०८० की प्रथम-“दारुण” महारात्रि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की रात्रि है ! द्वितीय दारुण अर्थात उत्तम से भी उत्तम दारुण महारात्रि कार्तिकीय अमावस्या अर्थात दीपमालिका अर्थात महिषासुर के वध की महारात्रि है ! तृतीय दारुण महारात्रि भूतभावन शिव एवं जगतजननी पार्वती के विवाह की दारुण महारात्रि-“शिवरात्रि” है और इन तीनों ही रात्रियों से भी अधिकतम् महत्वपूर्ण सिद्ध करने हेतु- “होलिका बलिदान्तोस्व” की दारुण रात्रि को सम्वतसर की अंतिम-“महारात्रि” हमारे ॠषियों ने स्वीकार कर लिया।
अर्थात इस पर्व को ! इस महारात्रि को ! चारो युगों के सभी चौदह मन्वन्तरों के सभी सम्वतसरों की अंतिम रात्रि स्वीकार करना आप सभी विचार करना कितनी महान विचारधारा है ! दारुण का अर्थ होता है –“महानतम्” मैं समझता हूँ कि सभी को उनका उत्तर मिला होगा।
ॠषियों ने ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति से अंत तक की मानवीय सभ्यता के इतिहास में होलिका के आत्मोत्सर्ग की रात्रि को अमर कर दिया। यह श्रद्धांजलि की रात है ! यह ऐसी रात है जब हमआप बैठकर सोचें समझें कि-
“यह घर है गुरुदेव का खाला का घर नांहि ।
शीष उतारी भूंयी धरो फिर पैठो घर मांहि॥
प्यारे बच्चों -“सैकड़ों कुर्बानियां देकर ये दौलत पायी है ! अपनी आजादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं ! सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं।”
आज हमको तुम सबको जो ज्ञानमिला है ! जो परम्पराओं से चला आ रहा विज्ञान मिला है ! इसको हमारे एवं हमारी पीढियों तक पहुंचाने हेतु लाखों करोड़ों भक्तों और ॠषियों ने अपने प्राणों की आहुति दी है अन्यथा कब का यह ज्ञान विलुप्त हो चुका होता ! इसके लिये होलिका माई ने अपने प्राणों की आहुति दी ! किन्तु उसीके साथ-साथ हीरण्यकश्यप के राज्य में फैली जनक्रांति ने हीरण्यकश्यप की सत्ता की चूलें हिलाकर रख दीं।बच्चों ! क्रान्ति की बलिवेदी पर सत्तारूढ़ निरंकुश शाषनाधीष का विरोध करते हुवे जो बलिदान हो जाते हैं-
“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पे मरने वालों की बाकी यही निशां होगी॥”
और जो कुछ नहीं करते वे नपुंसक होते हैं ! उनका होना न होना निरर्थक है ! होलिका भष्म होकर भी अमर हो गयी ! आज भी होलिका की परिक्रमा लोग करते हैं ! अबीर-गुलाल से उसके बलिदान की वन्दना करते हैं ! उसे मृतक नहीं अमरत्व प्रदान करने वाली स्वीकार करते हैं।
वो मरकर भी अमर हो गयी हम जिवित रहते हुवे भी मृतक समान हैं ! यह स्मरण रखना कि जो ज्ञान हम सबको मिला है ! मिल रहा है ! इसके लिये लाखों ने अपने मस्तक कटवा दिये ! अपनी बहू बेटियों की लज्जा तार-तार होते देखी ! कोल्हू में पेर दिये गये ! कढाई में उबाल दिये गये ! गर्म तवे पर भूंज दिये गये ! सबकुछ दे दिया किन्तु अपना यह-“धर्म” नहीं दिया ! वे तो चले गये ! कोई सुख नही मिला उनको ! हम सब तो उनके बलिदान से आज सोने का चम्मच लेकर जन्मे हैं ! हमें आज अपने धर्म, शास्त्र,परम्परा,ज्ञान,समाज,राष्ट्र और सद्गुरू के लिये ये सोचना चाहिए कि हमारा उनके प्रति क्या कर्तव्य है।
इसी विचार को करने हेतु आज से १५ दिवस पर्यन्त तक ! आप ध्यान देना-“सम्वत् २०८० तो जल गया !”
किन्तु अभी पन्द्रह दिनों तक कोई भी सम्वतसर नहीं है ! ये पन्द्रह दिन बलिदानियों के नाम कर दिये गये ! अब पुनश्च पन्द्रह दिनों के बाद नवीन सम्वतसर प्रारम्भ होगा !
इन पन्द्रह दिनों तक हम सभी को ये सोचना है कि हम अपने धर्म के लिये ! राष्ट्र,समाज,पीढियों,शास्त्र,गुरुजनों के लिये क्या कर सकते हैं ?
आप सभी को ढेरों शुभकामनायें–“आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्क सूत्रांक 6901375971”

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