दीपावली के बाद पूरे देश में त्योहारों का अंत हो जाता है, मगर बिहार में दीपावली के बाद छठ महापर्व की तैयारियां शुरु होती है। चार दिनों तक चलने वाले लोक आस्था का महापर्व देश हीं नहीं विदेशों में भी अब काफी जाना जाता हैं। आधुनिकता के इस अंधी दौड़ में शायद हीं कोई पर्व या त्योहार अछूता रहा होगा। लेकिन सूर्योंपासना का महान पर्व आज भी आधुनिकता से काफी परे है। आज भी इस महापर्व को उसी परंपरा और विधि विधान से मनाने का प्रचलन जीवित है। इसी कारण लोग इसे महापर्व के उपाधि से सम्मानित करते हैं।

पंचाग के अनुसार प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर छठ का महापर्व मनाया जाता है। वैसे चैत माह के शुक्ल पक्ष को भी चैती छठ के रुप में मनाने का विधान है। लेकिन ज्यादातर लोग इसी माह के व्रत को करते हैं। कारण की सभी तरह के फल फलाहरी आसानी से मिल जाते हैं साथ हीं मौसम न ज्यादा गर्म और न हीं ज्यादा ठंठ रहती है। जिसके कारण उपवास करने में ज्यादा कठिनाई का सामना करना नहीं पड़ता है। छठ के इस खास मौके पर महिलाएं एवं पुरुष 36घंटों तक निर्जला उपवास रखते हैं। माना जाता है कि छठ पूजा करने से जीवन में सुख और सौभाग्य आता है। साथ हीं संतान के दीर्घायु होने एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति इस महापर्व के करने से हीं होता है। यह पर्व इस बार 17 नवंबर के दिन नहाय खाय से शुरु किया जाएगा। 18 नवंबर को खरना (खीर का प्रसाद), 19 को डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा मनाई जाएगी। अगले दिन 20 नवंबर को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पारण किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सीता ने सर्वप्रथम छठ पूजन बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर संपन्न किये थे। जिसके बाद इस पर्व की शुरुआत यहां से होकर पूरे देश सहित विदेशों तक फैल गई। वाल्मीकि रामायण के अनुसार ऐतिहासिक नगरी मुंगेर के सीताचरण में माता सीता ने छह दिनों तक रह कर छठ पूजा की थी। श्रीराम जब चौदह वर्ष वनवास के काटकर अयोध्या लौटे थे तो रावण के बध के पाप से मुक्ति के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसुय यज्ञ कराने का फैसला लिया। इसके लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रण पत्र दिया था लेकिन मुग्दल ऋषि अयोध्या न जाकर श्रीराम को अपने आश्रम में हीं बुला लिए।जिसके कारण श्रीराम और माता सीता को उनके आश्रम में आना पड़ा। उसी वक्त माता सीता ने यह महापर्व की व्रत रखकर भगवान सूर्य की उपासना के साथ पूजा अर्चना किए। साथ हीं वनवास के समय और ऋषि के आश्रम में जमीन पर हीं सोने के कारण इस महापर्व में व्रती जमीन पर हीं सोती है। वहीं महाभारत काल में सूर्य पुत्र कर्ण द्वारा पूरी श्रध्दा के साथ भगवान सूर्य की उपासना भागलपुर क्षेत्र में गंगा नदी में कमर तक पानी में रहकर करने का भी उल्लेख मिलता है। दानवीर कर्ण का किला आज भी मुंगेर में स्थापित है, जहां बिहार योग विद्यालय संचालित है। जबकि महाभारत काल में हीं द्रौपदी द्वारा इस व्रत को करने का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। वहीं एक अन्य मान्यता है कि प्राचीन समय में प्रियंवद नामक एक बहुत हीं प्रतापी राजा हुए जो बहुत हीं कुशल प्रजा पालक थे लेकिन उनका कोई संतान नहीं था। जिस कारण एक दिन वो अपनी प्राण त्यागने को लेकर नदी किनारे श्मशानघाट में लेट गए। इसी बीच उन्हें उसी वक्त भगवान की पुत्री षष्ठी प्रगट हुई और घर जाकर षष्ठी व्रत करने को कहा, उसके बाद उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसी कारण हीं लोग सूर्य षष्ठी के नाम से भी इस पर्व को बोलते हैं। यह महापर्व को छठ, सूर्य षष्ठी, डाला छठ, छठी मइया के पूजा, रनवो माय पूजा आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है। प्राचीन काल में यह महापर्व सिर्फ अविभाजित बिहार में मनाया जाता था। लेकिन इसका स्वरुप अब बदल गए हैं। बिहार के साथ-साथ झारखंड पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावे नेपाल के तराई क्षेत्र से लेकर पड़ोसी राज्य पं बंगाल, उडिसा, असम सहित दिल्ली और महाराष्ट्र तक इस पर्व को मनाने का सिलसिला चल पड़ा है। वहीं प्रवासी भारतीय खास कर बिहार सात समंदर पार अमेरिका, दुबई, सिडनी, बहरीन, न्यू जर्सी के साथ-साथ 54 फ्रेंच देशों में भी इस महापर्व को मनाया जा रहा है। जिसका उल्लेख बिहार कैडर के एक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी डाॅ आशीष कुमार ने 2006-2007 के अपनी स्टडी टूर पर फ्रांस जाने के बाद एक शोध परक लेख के माध्यम से कही है। भारत सरकार के भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद दिल्ली ने फ्रेंच भाषा में rencontre avoc in indo शीर्षक नाम से उनके लेख को किताब का रुप दिया है। जिसे 2013 में प्रकाशित किया गया है। इस लेख के माध्यम से छठ को पूरी तरह से समझाया गया है। इसमें बताया गया है कि चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, सामाजिक, मानसिक, आचारिक और व्यवहारिक कठोर शुद्धता रखी जाती है। उन्होने इसमें ये भी बताया है कि भगवान सूर्य के प्रखर किरणों की सकारात्मक उर्जा को हठ योग के छह अभ्यासों के जरिए मनुष्य सभी रोगों से मुक्त हो सकता है।

अपना देश भारत प्राचीन काल से हीं प्रकृति की पूजा करते आ रहा है। इस सूर्य के महा पर्व में भी उ न्हीं चीजों को दर्शाता है। जहां हमें नित्य रोज सूर्य नई उर्जा सूर्योदय होकर भरते हैं, वहीं साक्षात भगवान का स्वरुप दर्शाते हैं। एक ओर इनकी जहां हम उपासना करते हैं, वहीं इस महापर्व में प्राकृतिक वस्तुओं को प्रसाद के रुप में भोग लगाते हैं। (1)ठेकुआं इस महापर्व में प्रसाद के रूप में पहले स्थान पर है जो गेहूं के आटे और गुड़ के साथ-साथ देसी घी से बनता है। सर्दी के मौसम के शुरुआत में गुड़ और घी सेहत के लिए बहुत हीं फायदेमंद है। (2) महतावा निंबु जो काफी बड़े आकार का होता है जिसको कोई पशु पक्षी नहीं खा सकता। इसका स्वाद खट्टे मिठा होता है। (3) केला जो भगवान विष्णु को परम प्रिय है। (4) नारियल जलदार छठ के त्योहार में चढाने का विधान है। यह माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है। (5) गन्ना भी नारियल के तरह पवित्र है। जिसका गुड़ बनता है। (6) सुथनी जो मिट्टी से निकलता है। इसे शुद्ध माना गया है। (7) सुपारी जो हिन्दु धर्म में सभी पूजा-पाठ में काम आता है, इसके बिना संकल्प अधुरा है।( 8) सिंघाडा यानी पानी फल जो पानी में रहने के कारण काफी सशक्त होता है। इसको कोई पशु पक्षी नहीं खा सकता यानी जुठा नहीं कर सकता, इसलिए ये सब प्रसाद के रुप में चढ़ाया जाता है। अधिकांश पूजा का सामान प्रकृति से संबंधित है।

वर्ष मे दो बार होने वाले इस सूर्योपासना के महान पर्व में सुप, दउरा, ढाकी का निर्माण बिहार के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में हाथों से किया जाता है। इन सुप और दउरा बांस से बनी होती है जिसका सप्लाई पूरे बिहार सहित अन्य प्रदेशों के साथ-साथ अब आनलाईन मार्केटिंग के कारण अमेजन और फिलीपकार्ड़ के माध्यम से विदेशों में हो रहा है। अब विदेश में बैठे लोग सुप, दउरा के साथ-साथ आम की सूखी लकड़ी, गोइठा (उपले)के अलावे मिट्टी के चुल्हे तक मंगाकर छठ पूरी पवित्रता के साथ कर रहे हैं। जिसके कारण स्वदेशी और हस्त निर्मित सामान की विक्री में इजाफा हुआ है, वहीं लोगों के रोजगार के अवसर बढ़े हैं । जिसके कारण यह कारोबार हजारों सें बढ़ाकर लाखों में पहुंच गया है। वहीं इस पूजा में नारियल कि अनिवार्यता केरल और तमिलनाडु से मंगाया जाता है। वहीं सेव हिमाचल प्रदेश और कश्मीर से भारी मात्रा में इस अवसर पर आता है जबकि संतरा महाराष्ट्र के नागपुर और नासिक से मंगाकर बेचा जाता है। बिहार में हाजीपुर केला के लिए काफी प्रसिद्ध है लेकिन छठ महापर्व में इसकी सैकड़ो गुणा डिमांड बढने के कारण करीब पांच से छह सौ ट्रक आंध्र प्रदेश और पं बंगाल से मंगाया जाता है। इसी तरह सुथनी, शकरकंद झारखंड से तो अमरूद इलाहाबाद और कोलकता से मंगाकर छठ व्रतियों तक पहुँचाया जाता है। इस संबंध में फल के कारोबारी संजय मालाकार और शहजाद खान बताते हैं कि छठ में फलों कि मांग लगभग सौ गुणा बढ जाता है। छह महिना में जितना फल का बिक्री करतें हैं उससे ज्यादा छठ के इस पावन मौके पर मात्र तीन दिन में करते है। इससे इस पर्व में लगभग तीन सौ करोड़ रुपए का कारोबार होने का अनुमान इस बार छठ के मौके पर होने का अनुमान है। छठ महापर्व में परंपरा की प्रधानता होती है। मन की शुद्धता व सात्विक के साथ प्रकृति व मिट्टी से जुड़ाव इस महापर्व में देखी जा सकती है। समय के साथ इस पर्व में आधुनिकता का समागम हुआ है लेकिन परंपरा आज भी पुरानी है। भले हीं हम रोजाना ब्रश और टूथपेस्ट से मुँह धोते हैं पर इस महापर्व के दौरान ब्रती दातुन से हीं मुँह धोती हैं। आम दिनों में हम घर में नल और आर ओ का पानी इस्तेमाल करते हैं। पर छठ में नदी, तालाब और कुंए का पानी प्रसाद बनाने में करते हैं। घरों में रोटी पैकेट बंद आटा की बनाते हैं। मगर छठ में गेहूं धोकर, सुखाकर और पीसकर हीं मिट्टी के चुल्हे यर बनाते हैं।