पूरे देश में आजादी के अमृत महोत्सव का नारा गुंज रहा हैं | हम आजाद देश है और हमारी आजादी के ७७ साल हो गए | देश में अब प्रजातंत्र है। यह कहते हुए बार-२ मन में संदेह होता हैं कि क्या वाकई हम आजाद और प्रजातंत्र है ? हाल ही में असम में घटे कुछ घटनाओ से यह सवाल बार-२ मन में आता है। जहां एक तरफ लोग अपनी भाषा मे शिक्षा की मांग कर रहे हैं, वही राजभाषा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए सरकार को ज्ञापन देना पड़ रहा हैं | एक आजाद देश की राजभाषा की ऐसी दशा के बारे में शायद ही हमारे पूर्वज एवं स्वाधीनता सेनानियों ने कल्पना की हो | यह काम स्वत़: ही होना चाहिए था | लेकिन स्वाधीनता के इतने सालो बाद भी हम भाषा को लेकर उलझे हुए हैं या हमे उलझाकर रखा गया हैं? एक ही देश के नागरिक भाषा के नाम पर आपस में भीड़ जाते हैं और वौद्धिक वर्ग मौन हैं | यह सबकुछ कैसे हो पाता हैं? क्या आज भी हमे आपस में उलझाकर हमारा ध्यान भटकाया जा रहा हैं? ताकि हम देश के विकास संबन्धी सवाल पुछ न पाये | वैसे पूरे देश की बात करे तो एक और विषय पर मन में सवाल उठते हैं, वह है पेंशन | हाल ही में पूरे देश से सरकारी कर्मचारी दिल्ली के जंतर-मंतर पर पूरानी पेंशन वहाली के मांग को लेकर धरना प्रदर्शन किए | ऐसे में मेरा मन में सवाल उठता हैं की आखिर पूरे देश में सरकारी कर्मचारियों के लिए कोई पेंशन योजना नही है क्या? वाद में पता चला २००४ साल से जो लोग सरकारी सेवा में आये है उनके लिए नई पेंशन योजना सरकारों ने लागु किया है | ऐसे में पुरानी पेंशन बहाली की मांग कयों? पता चला सेना में कार्यरत जवानों के लिए अभी भी पूरानी पेंशन योजना लागु हैं | हमारे देश के विधायकों एवं सासदों को भी पेंशन दी जाती है | वर्तमान समय के ज्यादातर विधायक एवं सांसदों की आर्थिक स्थिति अच्छी होने के वावजूद उन्हें पेंशन की जरूरत है जबकि देश के लाखो कर्मचारियों को नई पेंशन योजना के तहत पेंशन दी जायेगी जो पूरी तरह बाजार निर्भर है एवं पेंशन की राशि क्या होगी किसको पता नंही| जबकि पूरानी पेंशन योजना में सेवानिवृत्ति पर पेंशन कितना होगी वह निर्धारित रहती है | जीवन के अनमोल ३०-३५ साल देश की सेवा में सर्मपित ईन कर्मचारियों को सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के वाद बाजार भरोसे छोड़ देना एवं एक आजाद देश में दो पेंशन योजना कही न कही संविधान द्वारा दी गई बराबरी के अधिकार के विपरीत है। अनिश्चित भविष्य के साथ कर्मचारी देश सेवा में अपना योगदान दे रहे है | यह हकीकत सबको पता है की वृद्घावस्था में ईलाज एवं जीवन जीने का खर्च वढ़ जाता हैं ऐसे समय पर पेंशन की अनिश्चयता के कारण सरकारी कर्मचारियों के लिए स्वाभिमान पूर्वक जीना मुश्किल हो सकता हैं। जिस कारण कई समाजिक समस्या खड़ी हो सकती है। एक आजाद देश के प्रजातांत्रिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति कभी भी उचित नहीं ठहरायी जा सकती | यह सब तब है जव हम समान नागरिक संहिता की बात कर रहे हैँ | एक देश एक चुनाव की बात कर रहे है ऐसे में मन में सवाल उठता हैं एक देश एक पेंशन क्यों नहीं |