प्रिय मित्रों ! अपने पितृ-गणों को समर्पित करता हुवा यह श्रृंखला ! अपने पूर्वजों के चरणों में इसकी तृतीय ऋचा के प्रथम अंक को मैं प्रस्तुत करता हूँ-
“आहं पितृन् त्सुविदत्रां अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बहिर्षदो ये स्धया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः॥
ऋषि कहते हैं कि-उत्तम ज्ञान से युक्त पितरों को तथा अपानपात् और विष्णु के विचक्रमण को मैंने अपने अनुकूल बना लिया है !कुशाशन पर बैठने के अधिकारी पितर अपनी इच्छाके अनुसार हमारे द्वारा अर्पित हवि और सोमरस को ग्रहण करें।
ऋचा के भाव को समझने हेतु मेरे विचारसे कुछ बिन्दुओं पर चर्चा करना मैं आवस्यक समझता हूँ-
(१)= कुशासन,हवि तथा सोमरस की महत्ता।
(२)= विष्णु विचक्रमण तथा अपानपात् यहाँ किसे कहा गया है ?
मित्रों ! श्राद्ध पद्धतियों की वैज्ञानिकीय गवेषणाओं को न समझने के कारण ही आज हमारे पौरोहित्य वर्ग का अपमान होते तथा सनातन संस्कृति की सत्यतादि पर भी मैं उंगली उठते देखता हूँ। वैसे मैं आपको कुशा तथा दूर्वा के संदर्भ में अथर्ववेद उन्नीसवें अध्याय के बत्तीसवें खण्ड की प्रथम से दसवीं ऋचा में सांगोपांग विशिष्ट गुणों को बताने वाले-“कुशसूक्त” को देखने का आग्रह अवस्य ही करूँगा- जिसमें कहते हैं कि-
“इरावती धेनुमति हि भूत सूयवसिनी मनेवदशस्या।
व्यस्यकभ्नारोदसि विष्णवे ते दाधर्थ पृथिवीमभितोमयूखैः स्वाहा।
इदं विष्णवे इदं न मम॥”
कुशा,ऊशीर तथा दूर्वा ये तीनों ही औषधियाँ असंक्रामक अर्थात नाॅन कान्टेक्टड हैं ! यहाँ तक कि आज विश्व की प्रख्यात औषधि निर्माता कंपनियों नें इन तीनों ही औषधियों का पेटेंट ले लिया है ! और अब जाकर-“इस्काॅन” ने इसके विरुद्ध उनपर कानूनी कार्यवाही की है ! मैं ज्यादा तो नहीं जानता किन्तु एक हजार दो सौ पचास से कहीं ज्यादा-“एंटीबायोटिक” दवाओं में इनके पचहत्तर प्रतिशत घटकों का प्रयोग हो रहा है।
और वैसे भी आयुर्वेद की औषधियों में मूत्राघात,अश्मरी, मधुमेह, कष्टार्तव,विशूचिका,अम्लपित्त,
“लोमभ्य स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्य स्वाहा मांसेभ्य स्वाहा स्नावभ्य स्वाहा मज्जभ्य स्वाहा रेतसे स्वाहा आयासाय स्वाहा॥”
कहते हुवे इन द्रव्यों की प्रशंशान्तर्गत यही स्पष्ट किया गया है कि उपरोक्त आसनों पर बैठने से शरीर के रोमकूप,त्वचा,रक्त, शोणित,मेद,मज्जा,मांस,स्नायु,रे
मित्रों ! प्रकरणान्तर्गत सोमरस पर भी मैं आपसे संक्षिप्त में चर्चा करता हूँ-“अष्टक-वर्ग,सोमवल्ली,दशमू
“गावो भगो गाव इन्द्रो म इच्छाद्गावः सोमस्य प्रथमस्य भक्ष्यः।
अर्थात गौवें हमारा मुख्य धन हैं,इन्द्र हमें गोधन दें ! जिससे कि हम सोमरस के साथ गो-दुग्धको प्रधान वस्तु के रूप में मिश्रित कर देवताओं के लिये मुख्य नैवेद्य का निर्माण कर सकें।
अब आप स्वयम अपने विवेक से विचार करें कि किसी शराबी को आपने शराब में सोडावाॅटर अथवा जल मिला कर तो पीते देखा होगा किन्तु शराब और दूध का तो “छत्तीस” का सम्बन्ध विश्व-विख्यात है ! अतः मद्यपान और सोमरस-पान को मिलाकर दैखना अति घृणास्पद विचार तथा भ्रामक प्रचार है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्थानीय कुछेक तथाकथित सामवेदीय पुरोहित धार्मिक कर्मकांडों के पश्चात-“कारन” के नाम पर शराब पीकर ही पूजा के आसन से उठते हैं जो कि वैदिकीय और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से अत्यंत ही निन्दनीय कृत्य है।
अब मैं हविष्य अर्थात-“पिण्ड सामग्री” पर भी कुछ चर्चा करना आवश्यक समझता हूँ-“तिल,यव,धृत,मधु तथा गो दुग्ध से पिण्ड-निर्माण की प्रक्रिया की जाती है ! ये जो कुछ लोगों ने मास का अर्थ-“मांस” से कर रखा है वे जानबूझकर-“उणद” को मास कहते हैं ! और इस बात को छुपा लेते हैं। और दुर्भाग्य से यहाँ के पुरोहितों ने तो भात से ही पिण्ड बनाने की परम्परा डाल रखी है।
और पिण्ड में वैसे तो उणद -चूर्ण का मिश्रण करने का कहीं भी विधान नहीं मिलता किन्तु फिर भी पिण्ड में माँस मिश्रित कर समाज को दिग्भ्रमित करते हैं।
अतः इस अंक में मैं संक्षिप्त में कुशादि औषधियों, सोमरस तथा हविष्यादि पिण्डात्मक सामग्रियों की चर्चा आपसे करने के उपरान्त अगले अंक में पुनश्च इसी ऋचा के द्वितीय अंक को प्रस्तुत करता हूँ….. आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″
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पितृ-सूक्त तृतीय मंत्र- भाग दो अंक छे
प्रिय मित्रों ! अपने पितृ-गणों को समर्पित करता हुवा यह श्रृंखला ! अपने पूर्वजों के चरणों में इसकी तृतीय ऋचा का द्वितीय अंक मैं प्रस्तुत करता हूँ-
“आहं पितृन् त्सुविदत्रां अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
बहिर्षदो ये स्धया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः॥”
ऋषि कहते हैं कि-“नपातं च विक्रमणं च विष्णोः” मैं इस अंक में आपसे प्रथम”विष्णु-विचक्रमण”पर चर्चा करता हूँ ! इस संदर्भ में मैं आपको ऋग्वेदोक्त विष्णु-सूक्त की पञ्चम ऋचा को दिखाना चाहूँगा-
“तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति
उरूक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥”
और इसी श्लोक में “विष्णु-विचक्रमण” का रहस्य छुपा हुवा है
मैं आपसे बारम्बार कहूँगा कि मंत्रों को पढना आवश्यक है किन्तु समझना ! उससे कहीं ज्यादा आवश्यक है ! विष्णु की नाभी से-ब्रम्हा, ब्रम्हा से मरीचि और मरीचि से कश्यप, कश्यप से सूर्य तथा सूर्य से मनु अर्थात मानव अर्थात हमारी आपकी इस चैतन्य मयी सृष्टि की संरचना होती है ! और आप यह स्मरण रखें कि वेदों के जितने भी मंत्र हैं वे प्रकारान्तर से सूर्य को केन्द्र में रखकर ही परिभाषित होते हैं।
मरीचि अर्थात वो पात्र जिससे सूर्य ढँका हुवा है ! आप उसे ज्ञान कह लो अथवा अज्ञान कह लें ! बात एक ही है ! और कश्यप ऋषि तो हैं ही किन्तु जैसे यदि किसी का नाम-“राम” रख दें तो वो “राम”नहीं हो जाते ! उसी प्रकार कश्यप नामधारी ऋषि और ऋचोक्त कश्यप में भेद है।
मित्रों ! सभी गोत्र जिनसे उत्पन्न होते हैं ! और जिनका कोई गोत्र ज्ञात नहीं होता उन सभी को!! ब्राहम्ण,क्षत्रिय,वैश्य हों अथवा शुद्र और तो और मैं तो ये भी कहूँगा कि जो सूर्य के भी पिता हैं- वे कश्यप हैं ! वे तो जड-चैतन्य,पशू पक्षी सभी के पूर्वज अर्थात इस ब्रम्हाण्ड का गोत्र ही “कश्यप” है और कश्यप अर्थात- “विष्णु” ऐसा वेद कहते हैं कि-
“अग्निर्जागार तमृच कामयन्ते अग्निर्जागार तमुसामानि।”
जब अग्नि जागती है ! जब विष्णु जागते हैं तो ऋचायें अपने आप प्रकट होने लगती हैं,सूर्य किरणें बिखेर देता है ! प्राण स्पन्दित होने लगते हैं ! और शब्द रूपी ब्रम्हा वाग्देवी सरस्वती अर्थात अपनी कन्या रूपी भार्या के साथ जाकर निवेदन करते हैं कि आप हमें सृष्टि निर्माण की आज्ञा दो।
मैं आपसे एक बात और भी कहूँगा !आप गंभीरतापूर्वक सोचना- आपकी तीन संतानें हों ! चलो मान लेता हूँ कि दो नालायक हों तो क्या आपकी भार्या उनकी माँ नहीं हैं ? हो सकता है कि वे उनको माँ न मानें,डायन मान लें ! किंतु वे उनकी माँ थी, हैं और रहेंगी भी।
मेरे पूर्वजों में कुछेक माँसाहारी थे,कुछ शाकाहारी ! कुछ शालीन थे,कुछ निन्दनीय ! कुछ संत थे कुछ असंत ! कुछ मुस्लिम हो गये थे कुछ इसाई ! किंतु थे और हैं सभी के सभी सूर्य-पुत्र ही ! उनके मानने न मानने से होता क्या है ? आखिर एक माँ ही तो किसीके पिता को जानती है ! हाँ ! मेरी वैदिक संस्कृति समूचे ब्रम्हाण्ड की जननी है ! मेरे पूर्वजों में धर्मच्यूत हो चुके-“मुहम्मद और जीसस” भी हैं ! ये निश्चित है कि हमारा उनका डीएनए अलग-अलग है ! किन्तु मानव सभी हैं ! मैं तो पितृपक्ष में उनका भी श्राद्ध करना चाहूँगा। किन्तु अभी तो एक समस्या और भी है ! उसका समाधान कैसे होगा ?
“आहं पितृन् त्सुविदत्रां अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः” लोगों की सोच है कि हम यदि श्राद्धकर्म करते हैं ! अपने पूर्वजों कों आमंत्रित करते हैं तो उनमें जो निशाचर प्रवृति के होंगे ! वे भी आ जायेंगे ! अब इसका भी मैं समाधान करता हूँ-
मैं काशी का ब्राह्मण हूँ, ये तो आप सब जानते ही हो ! और ये बंगाली हैं ! इनका पूरा खानदान माँसाहारी है ! अब जब किसी के यहाँ भोज होता है तो निमंत्रण तो मिलता ही है ! और भोजन में मांस, मछली अंण्डे ही होते हैं ! तो हम बिचारे अपना मन मसोस कर भोज का आनंद लेने से हमेशा चूक जाते हैं किन्तु कभी कदाप किसी के यहाँ शाकाहारी या विधवा के लिये भोजन पक गया तो मैं-“विधवा” न होता हुवा भी खा कर-“तर “जाता हूँ ।
बिलकुल वैसी ही स्थिति-“विष्णु-विचक्रमण” की भी है ! भला विष्णु लोक,स्वर्गादि में गये हमारे पूर्वज ये मधु-तिल और धृत के पिण्ड लेने क्यूँ आयेंगे ?
वहाँ तो मधु के सरोवर ही बह रहे हैं!! किन्तु क्या करें वे ! मुक्त ऋषि गण जिन्हे अपनी संस्कृति और संस्कारों से प्यार है ! वे मुक्त-पुरूष आपकी श्रद्धा के वशीभूत हुवे प्रेम की डोरी से बंधे खिंचे चले आते हैं। और ये भी आप स्मरण रखें कि मर्त्यलोक में जिन्होंने मृत्योपरांत जन्म ले लिया है ! और कहीं भी ले लिया है !किन्ही भी योनियों में ले लिया है !अथवा वे स्वर्गादि लोकों में हैं ! अर्थात वे आदित्य से नीचले लोकों में हैं ! तो उनका भी प्रवेश आपकी श्राद्ध-भूमि में किसी न किसी रूप में अवस्य होगा।
किन्तु समस्या तो है हमारे उन दुष्ट पूर्वजों की जिनका आना निषिद्ध है ! किन्तु आवस्यकता तो उन्हे ही सबसे ज्यादा इन पिण्डों और सोमरस की है ! अब भला ये तो सच्चाई है ही कि-” बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद” जिन्हे अभक्ष्य भक्ष्य ही प्रिय है ! वे भला इस धृत-मधु मिश्रित पिण्ड और गो दुग्ध से निर्मित सोमरस का पान क्यूँ करेंगे ?
तो लो मैं अपनी ही बताता हूँ ! मेरे लिये तो माँसाहारी रसोई घर और पात्रों में बने भोजन अग्राह्य हैं किन्तु मेरे पात्रों में बने भोज्य पदार्थों को गृहण करने में मांसाहारियों को कोई आपत्ति नहीं हुवा करती ! अर्थात वे मांसाहारी भी शाकाहार की श्रेष्ठता को अंतःकरण से स्वीकार करते हैं ! अर्थात वे हविष्य तथा सोमरस भी पान करने के इच्छुक तो हैं किन्तु उन्हे इसमें कई बाधायें भी आयेंगी। अगले अंक में पुनश्च इसी ऋचा के तृतीय अंक को प्रस्तुत करता हूँ!! ……… आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″