घुंघुर में सम्पन्न हुवे महायज्ञान्तर्गत आपने हमारे विद्वान वेदपाठी पुरोहितों द्वारा वेदों का गान सुना होगा !और उस गान के साथ-साथ उनका हस्त संचालन भी देखा होगा ! इसे मुद्रा कहते हैं, जिस प्रकार योग और संभोग के चौरासी आसन होते हैं! जिस प्रकार शक्ति और शिव की चौरासी पीठ होती हैं ! जिस प्रकार चौरासी भैरव और चौरासी भैरवी होती हैं ! जिस प्रकार चौरासी योगी और चौरासी योगिनी होती हैं ! उसी प्रकार चौरासी गुणित चौरासी अर्थात-” सात हजार छप्पन मुद्रा चित्र लीपि” होती है ! इन सभी के उत्कृष्ट उदाहरण ज्ञानवापी,बेड द्वारिका, अंकोरवाट,मिस्र,हड़प्पा,दक्षिण अफ्रीका और समूचे विश्व के सैकड़ों देशों में हजारों हजार की संख्या में प्राचीन गुफाओं में अंकित उन चित्रों को आप देख सकते हैं जो हमारी वैदिकीय प्राचीनतम हिन्दी लीपि के जीवित उदाहरण हैं ।
मित्रों ! भीमपेटरा,अजंता,एलोरा एवं महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत तक के सैकड़ों क्षेत्रों में- “पुरा पाषाण युगीन उन दिव्य मानव ॠषियों द्वारा चित्रित हजारों भित्तिचित्रों कोआप देख सकते हैं जहाँ चित्रों में चित्रकार ने उन भावों को उकेर दिया ! लगभग पैंसठ हजार वर्ष पूर्व ही उकेर दिया ! जिसे कोई भी शिक्षित-अशिक्षित व्यक्ति भलीभांति समझ सकता है ! इसे कहते हैं-“भावनाओं में एकता हिन्दी की विशेषता”।
मित्रों ! ऐसा कोई भी भाव नहीं हो सकता जिसके लिए पृथक पृथक मुद्राओं की कल्पना वेदों में न हो। यहाँ आपको कुछ लोग यह कहकर भ्रमित कर सकते हैं कि -“हिन्दी और संस्कृत,तथा संस्कृत और वैदिकीय संस्कृत” में अंतर है ! आप केवल उनसे यह पूछना कि वैदिकीय संस्कृत किस लीपि में है ? यहाँ आकर वे मौन हो जायेंगे ! बांग्ला,असमिया,कन्नड़,गुजराती,
अग्रेजी,जर्मन,फ्रेन्च,अरबी,फा
मित्रों ! यह हिन्दी हिन्दू और हिन्दुस्थान की सफलता का महत्वपूर्ण पक्ष है कि आज दुष्यंत-शकुन्तला की वो सन्तान जो बाल्यावस्था में ही सिंहों के जबड़ों में हाथ डालकर उनके दांत गीनते थे ! मित्र-भाव से गिनते थे ! जिसके कारण हमारे देश का नाम उनके नाम पर-“भारत” रखा गया ! उस भारत की गाथा बचपन की जिन पुस्तकों में हमने पढा था आज उसका सफल आयोजन-“श्री भारत मण्डपम”में सम्पन्न होता समूचे विश्व ने देखा। जिस “राम राज्य” की कल्पना हमारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने की थी अर्थात जहाँ शेर और बकरी एक घाट पर साथ-साथ पानी पीते हों ऐसा भारत ने इस हिन्दी माह के अंतर्गत जी-20 की बैठक में कर दिखाया ! जहाँ रूस,चीन,यूक्रेन के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में यूरोपीय देशों,इस्लामिक देशों, अफ्रीकी,मध्य पूर्व एशिया के साथ-साथ अमेरिका,जर्मनी, जापान, ब्रिटिश राष्ट्राध्यक्षों के साथ ! विकसित-विकासशील और पिछड़े देशों को एक मंच पर साथ बिठाकर-“वसुधैव कुटुंबकम ” की भावना साकार करत हुवे असम्भव सा दिखते संयुक्त घोषणा पत्र पर सर्वमान्य सहमति बना ली।
मित्रों ! जिस कोर्णाक सूर्य मन्दिर प्रतिकृति के समक्ष हमारे यशस्वी प्रधानमन्त्री जी ने बंगलादेश की शेख हसीना, ऋषि सुनक से लेकर जो•बाइडन• तक को समय चक्र दिखाया ! ये बताया कि समय का पहिया फिर से घूम चुका है ! अब भारत सोने की चिड़िया नहीं हीरण्यमय सूर्य बनने की दिशा में चलता हुवा विश्व के आकाश पर ध्रूव नक्षत्र की तरह स्थिर हो चुका ! अब भारत ऐसा सूर्य है जिसकी परिक्रमा विश्व के सभी देशों को लगानी होगी। ये गर्व का विषय है कि इस सम्मेलन में विश्व की सभी भाषाओं के मध्य हिन्दी भाषा का वो तिरंगा लहरा उठा ! लगभग विश्व के सभी राष्ट्राध्यक्षों ने उपरोक्त सम्मेलन में हिन्दी बोलने का प्रयास किया ! ये हम बराक उपत्यका के लोगों के लिये अनुकरणीय है।
हम सभी जानते हैं कि हमें हिन्दी हिन्दू और हिन्दुस्थान के लिये सत्याग्रह के मार्ग पर चलने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। मित्रों ! ये हमारे अस्तित्व का युद्ध है ! हमारे बांग्ला भाषी लोग नहीं जानते ! वे बिचारे अपनी बुद्धि को गिरवी रख चुके हैं ! वे बंगाल द्वारा बनाए उस चक्रव्यूह में अकेले अभिमन्यु की तरह फंस चुके हैं ! वे भी हमारे समाज के ही अंग हैं ! इस चक्रव्यूह से निकलने का मार्ग वे नहीं जानते और न ही निकलना चाहते हैं ।किन्तु हमें यह-“महाभारत जीतनी ही है”–-“आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्क सूत्रांक 6901375971”
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हीनं दुष्यति इति-“हिन्दूः हिन्दी हिन्दुस्थानम्”–(६)
मित्रों ! ऋग्वेद अष्टम मण्लवान्तर्गत महर्षि गालव के शिष्य महाराज-“सैन्धव” का उल्लेख प्राप्त होता है,जिन्होंने सिन्धु घाटी में चक्रवर्ती सम्राट की भूमिका दो सौ तीस वर्षों तक निभायी ! आपके साम्राज्य की सीमायें वियतनाम से फारस की खाड़ी पर्यन्त एवं ऋषि-भूमि(रूस) से उत्तरीय ध्रुव प्रान्त तक विस्तृत थी कालान्तर में अफ्रीका एवं अन्यान्य मरुभूमि से आये लोगों के उच्चारण में-“स के स्थान पर ह” अपभ्रंशक होने के कारण उनके द्वारा इस भूमि के निवासियों को-“हिन्दवः” का नाम दिया गया !
“हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥
हमारे इतिहास को मेकाॅले,ह्वेनसांग,फाह्यान,आइने अकबरी, मुगल नामा,ब्रिटिश,पुर्तगालियों, जवाहरलाल नेहरू(डिस्कवरी ऑफ इंडिया) से लेकर वामपंथी चोरों तक ने तोड मरोड़ कर अपभ्रंशित कर दिया ! क्षेपकों से हमारे ऐतिहासिक ग्रन्थों को उनके अनुसार ढालने की कोशिश की ! अन्यथा सच्चाई ये है कि हमारे पूर्वज अर्थात-“आर्य-अनार्य” अर्थात गिरिवासियों ! सुदूर वनांचल में निवास करने वाले लोगों की भाषा-“प्रकृति और हिन्दी के समीप प्राकृत” और नगरीय क्षेत्र निवासियों की भाषा-“प्राकृत और संस्कारित भाषा के समीप हिन्दी” थी। अर्थात आर्य बाहर से नहीं आये थे।
ये सभी जानते हैं कि अफ्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलियाई क्षेत्रों में हुवे भयावह भौतिकीय-दैवी आपदाओं के कारण वहां के असभ्य और हिंसक जंगली भटकते हुवे भारत आये और यहाँ बस गये जिनको-असभ्य अर्थात असुर” कहते हैं ! किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि वामपंथियों ने उनको ही -“मूल निवासी”की संज्ञा दे दी । और यहाँ के वास्तविक हम आदिवासी आर्यों को हमारे ही भाई अनार्य अर्थात गिरिवासियों से पृथक करने का पैशाचिक सफल षड्यंत्र किया।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पुरापाषाण युग पूर्व पृथ्वी पर आये किसी भीषण भूडोल से तद्कालीन पृथ्वी से पृथक होकर-“इन्दु” अर्थात चन्द्रमा की रचना हुयी एवं जिस स्थान से यह खण्ड विखण्डित हुवा वहाँ हुवे विशालकाय गड्ढे से धीरे-धीरे समुद्र का विस्तार होता गया, भूमि के अंतःस्थल से प्रस्फुटित आग के शोलों पर जब वर्षा की बौछारें गिरीं ! तो अग्नि और जल के संयोग से लवण की उत्पत्ति हुयी! और इस सेतु का नाम कालांतर में चन्द्रमा के कारण-“इन्दु महासागर अर्थात हिन्द महासागर “के नाम से विख्यात हुवा।
मित्रों ! हमारे पूर्वज इसी कारण अग्निर्देवता अर्थात यज्ञाग्नि की उपासना करते रहे हैं।यह भूमि ही क्या सूर्य चन्द्र भौमादि सभी नक्षत्र प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हैं और यह समूचा ब्रम्हाण्ड धीरे-धीरे इसी यज्ञाग्नि में सतत् हवन होती और पुनश्च यज्ञधूम से उठी आद्र उष्मा से पुनश्च हमारे आपके नक्षत्रों के जैसे अन्न को बार-बार उत्पन्न पालन और हवन करता रहा है इसी सृष्टि चक्र को श्रीमद्भगवद्गीता में–
“अन्नाद् भवन्ति भूतानी पर्जन्यादन्न सम्भवः।
यज्ञाद् भवन्ति पर्जन्या यज्ञ कर्म समुद्भवः ॥
कर्म ब्रम्ह भवोत्वृद्धि ब्रम्हाक्षरः समुद्भवः ।
तस्मात सर्व गतं ब्रम्ह नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः॥
ऐसा कहा गया है।
हिमालयी क्षेत्रीय विस्तृत श्रृंखला का आंकलन अभी तक जैमिनीय शास्त्री अर्थात अपभ्रंश-“जाग्रफी के विद्वान” करने में असमर्थ रहे हैं। प्राचीन काल से परम्परागत रूप से प्राच्य- “श्रुतियों की स्मृतियों” के आधार पर पाषाण एवं भोजपत्रों के साथ-साथ पीपल पत्र की झिल्लियों पर, नाना प्रकार के मृत पशुओं के चर्मपत्र पर हमारे आदर्श पूर्वजों ने प्राकृतिक भाषा में अर्थात चित्रों के साथ-साथ नाना स्वर और व्यञ्जनों के द्वारा जिन निबंधों को ! जिन गीतों को गाया उसे -ऋग्वेदादि नाना ग्रन्थों”के नाम से हम जानते हैं। हमारे शास्त्रों ने सभी संशयों का समाधान परोक्ष अपरोक्ष दोनों प्रकार से किया है,शास्त्र रूपी नेत्रों के प्रकाश में सबकुछ स्पष्ट है किन्तु जिनकी आँखों पर अपनी महान हिन्दू संस्कृति के प्रति नकारात्मक पट्टी बंधी है उन अंधों को कुछ नहीं दिखता–
“अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः॥”
मित्रों ! आपने अभी अभी दिनांक नौ सितम्बर को सुना होगा कि प्रिंसेस एलिजाबेथ के निधनोपरान्त उनकी बरसी पर-“इष्ट इंडिया कंपनी” ने ब्रिटिश सरकार के लिये -“सिक्के” बनाये ! ये वही कम्पनी है जिसने कभी धोखे से हमपर राज किया था ! हमारी आपसी फूट के कारण हमपर शासन किया था ! हमारे देश का नाम उनके दरिन्दों ने-“इन्डिया” रखा था ! मैं समझता हूँ कि-“हीनं दुष्यति इति-“हिन्दूः हिन्दी हिन्दुस्थानम्”जो अपनी हिनता का परित्याग कर दें ! जो अपने दोषों को त्याग दें वे”हिन्दू हिन्दी और हिन्दुस्थानी हैं--“आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्क सूत्रांक 6901375971”
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