आग लगी अकाश में झर-झर झरत अंगार….(१)

पूर्व से लेकर पश्चिम तक,उत्तर से लेकर दक्षिण तक,एशिया प्रायद्वीप से लेकर ऑस्ट्रेलिया,यूरोप,संयुक्त राज्य अमेरिका से लेकर अफ्रीकी देशों तक सर्वत्र आकाश से सफेद बुर्राक आग बरस रही है ! बडे बडे पहाड,पठार,सडकें,पुल,मन्दिर,मस्जिद, चर्च,गुरूद्वारे,गांव,नगर,दुकानें,बस,कारें,मोटरसाइकिलें तिनकों की तरह बह रही हैं। जंगली जानवर,हांथी,मवेशी और मानव भी इस प्रलयंकारी त्रासदी में तिनकों की तरह बह रही है ! लोगों की सैकड़ों वर्षों से तिनके-तिनके कर जोड़ी गृहस्थी,सरकारी सम्पत्ति-“साधु अवज्ञा को फल ऐसा । जरै नगर अनाथ के जैसा॥” और जब कभी दो चार दस घंटों को ! दो तीन दिनों को बारिश रूकती है ! चिलचिलाती धूप निकलने लगी ! पहले ऐसा नहीं होता था ! इतनी उमस भरी प्राण वायु विहीन धूप कि धूप में निकले स्वस्थ,युवा और पशु तक लडखडा कर किसी दण्ड की तरह भूमि पर गिरकर काल कवलित होने लगे ! जैसे लोगों को अपस्मार(मिर्गी) के दौरे आये हों ! रक्तचाप और शर्करा स्तर गिरकर आपको भी गिरा देता है ! मृत्यु के द्वार पर आप दस्तक देने लगते हैं।
वर्षा ऋतु अब देर से आती-जाती है ! जैसे जैसे धर्म-चक्र बदला ! लोगों की दिनचर्या बदली ! आहार के साथ विहार बदले ! विचारों में इतनी स्वार्थपरता आयी कि-“ऋतु चक्र” ही बदल गया ! रेगिस्तान में सैलाब आ रहे हैं ! राजस्थान नदी की धाराओं में बहने को श्रापित होता जा रहा है ! जहाँ कभी अतिवृष्टि हुवा करती थी वहाँ के लोग अनावृष्टिसे लाचार हैं और कभी सूखाग्रस्त रहने वाले क्षेत्रों के किसान अतिवृष्टि से अपनी सूखे खेतों में की जाने वाली फसलों को बाढ में बहती देखने को लाचार हैं।
आकाश से पहले कहीं कहीं सफेद रूई के फाहों जैसी बर्फ गिरकर भूमि का श्रृंगार करती थी ! अपनी सफेद चादर से प्रकृति भूमि-देवी को तृप्त करती थीं ! जन सैलाब उन क्षेत्रों में जाकर आनंद और आह्लाद से प्रफुल्लित होकर वर्ष भर की जीवनीय ऊर्जा लेकर आते थे ! किन्तु अब ये सफेद चादर कफन बनती जा रही है ! ये कफन अटलांटिका से ! ग्लेशियरों से धीरे-धीरे जलता जा रहा है ! पिघलता और सिमटता जा रहा है। इतनी ठंड कभी देखी थी ? बराक उपत्यका के लोगों ने ! सिल्चर के लोगों ने कभी-“रजाई” रखने का सपना देखा था ?
कभी आसमान से जब सूरज आग उगलता है तो हरे-भरे सैकडों वर्ग किलोमीटर के जंगल यूँ धू-धू कर जलते हैं! महीनों जलते रहते हैं ! अपने शरण में रहते जानवरों के साथ जलते हैं ! मानों स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अग्निर्देवता की प्रार्थना सुनकर उनकी क्षुधा-पूर्ति हेतु-“खाण्डव वन” को खाक करवाने का संकल्प पूरा किया हो।मानव,पशू,पक्षी,वृक्ष,नदियाँ ऐसे सूखती हैं कि हरीतिमा काल का ग्रास बनने को आतुर हो। पारा इतना बढने को आतुर हो जाता है कि आपके पंखों के पंख कट कर गिर जाते हैं,कूलर व्यर्थ हो जाता है,एयर कन्डीशनर शो पीस बन जाता है ! लू के थपेडों से अब तो सिल्चर भी अछूता नहीं रहा ! अब तो शिलांग में भी लू चलने लगी ! चाय बागानों के इतने बुरे दिन कभी देखे थे ?
यज्ञ धूम से- हवन की धूम से पर्यावरण दूषित होता है ! मन्दिरों की घंटियों से ध्वनि प्रदूषण होता है ! गंगाजल अशुद्ध है ! गाय दुषित है ! तुलसी में कच्चा पारा है ! शिव लिंग की पूजा-अर्चना करना अश्लीलता है ! श्रीमद्भगवद्गीता युद्ध कराती है ! राम चरित मानस सबसे गंदी पुस्तक है ! धर्म क्षेत्रों में केवल पाखण्डी लोग जाते हैं ! धर्म अफीम की गोली है ! साधू-संत ब्राम्हण ढोंगी हैं ! आज धरती के भगवान डाक्टर और वैज्ञानिक बन चुके ! आज ब्रम्हाण्ड का सर्जक इंसान बन चुका ! आज वैवाहिक संस्था कॉन्ट्रेक्ट में बदल चुकी ! संस्कृत-संस्कार और शुचिता पिछले होने का चिन्ह है और हिन्दी भाषी होना महापातक तथा अशिक्षित होने का प्रमाणपत्र है।
मैं शाकाहारी होने के कारण बांग्ला समाज में कुली कहलाता हूँ ?
शाकाहारी होना पुरातन पंथी होने की पहचान बन चुका ! मद्यपान करना सभ्यता की पहली सीढ़ी है ! सिल्चर जैसे आज अभी-अभी तथाकथित उन्नत होने वाले नगर के विवाह घर में हमारी बच्चियों को अत्यंत ही गंदी पोशाक पहनाकर उनसे वेटर्स की सेवा लेने वाले हम लोग-“शक्ति उपासक” होने का ढिंढोरा पीटते हैं ! एक विवाह होने का परिणाम ! यदि आप कुलीन और धनाढ्य हो तो ! सैकडों मुर्गे,दर्जनों बकरों की हत्या है ! मन्दिर जाने का अर्थ ही बली देना है ! यज्ञ आदि का समापन बिना- “कारन”(शराब) के हो ही नहीं सकता और तभी तो …शेष अगले अंक में–“आनंद शास्त्री”

आग लगी अकाश में झर-झर झरत अंगार….(२)
मेरे आत्मीय स्वजनों  स्वयं को ! मर्मान्तक पीडा से ह्रदय छिन्न-भिन्न सा होता देखता हूँ ! भीतर से टूटता जा रहा हूँ ! आयु की चौहत्तरवीं सीढी चढकर पीछे मुड़कर देखने को बाध्य हूँ कि- “बीस से पचास वर्ष” के बच्चों की अचानक मौत आ जा रही है ! इनमें कइयों को हास्पीटल जाने तक का अवसर नहीं मिलता ! पचासों लाख के हेल्थ इंश्योरेंस धरे के धरे रह गये वे बिचारे एक टैबलेट भी न ले सके ! पहले लोग भुखमरी से मरते थे-अब विषाक्त भोजन से मरने लगे ! पहले लोग-“काशी मुक्ति हेतु उपदेशु” में विश्वास रखते थे अब -“नर्सिंग होम” तक पहुंचना मुश्किल हो चुका।
प्रकृति विक्षुब्ध हो चुकी! हमने ही अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार ली ! सुविधाओं के नाम पर असुविधा का संसार बसा लिया ! जीभ के स्वाद में मधुमेह और रक्तचाप के शिकार हो गये ! पौष्टिक आहार के स्थान पर डिब्बे बंद खाद्य सामग्री खा खा कर खुद ही डिब्बा बन गये ! जल जमीन जीवन तीनों विषाक्त हो गये ! घातक रासायनिक खादें तो थी हीं अब विषैले बीज भी आ गये! ऐसे बीज आये कि उन नपुंसक बीजों को खाकर हमारे बच्चे नपुंसक होते जा रहे हैं! अर्थात वैचारिक आधार पर हमारी पीढ़ीयाँ नपुंसक होती जा रही हैं ! रासायनिक खाद्यान्नों से हमारे शरीर में बढती अम्लता से वात-पित्त दुषित हो चुके ! गैस और आमवात से सभी ग्रस्त होते जा रहे हैं ।
फल,फूल,शाक,वृक्ष,लता,क्षुप्र,अन्न,रस,दुग्ध,औषधियाँ आदि सभी जीवनदान देने वाली वस्तुयें जीवन का विनाश करने वाली होती जा रही हैं, और इनको ऐसा हमने बनाया ! अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिये बनाया ! हमने धान की खेती की-“अधिक अन्न उपजाओ” का नारा सुना ! उर्वरकता वृद्धि के लिये डीएपी-यूरिया डाल दी! कीणों से बचाने के लिए-“उस्ताद”डाल दिया ! न जाने कितने भयानक एन्टी बाॅयो रसायनों का उपयोग किया ! फसल कट कर आयी उसे सुरक्षित रखने हेतु जहरीली गोलियां डाल दीं ! ये हमें कहाँ खानी हैं ? ये तो बाजार में बिकनी हैं ! ऐसा ही सब्जी-फल-मसाले-चाय उत्पादकों ने किया ! हमने- हमारे लोगों ने ये सोचकर अन्न उपजाये कि ये दूसरे खायेंगे ! और संसार चक्र की तरह अन्न बेचकर हमने चाय लायी ! सब्जी,फल मसाले लाये और उन्हें खाने के बाद अपने यकृत,फेफड़े,किडनी,
हांथ पैर मस्तिष्क को बीमार कर लिया ! और उस पाप से उगाये अन्न के विक्रय से मिले धन को चिकित्सक ले गये ! हमें क्या मिला ? कभी सोचा ?
हमें बीमारी मिली ! निराशा-हताशा और पापों की गठरी बंधी। ये बीज हमने हमारे लोगों के लिये नहीं गैरों के लिये बोये थे ! सुदर्शन चक्र की तरह घूमते इसके फल हमारे, हमारे अपनों के घर आ गये ! हमारे अपनों को ! जो हमें अपने प्राणों से अधिक प्यारे थे ! उन्हें इन्ही के कारण कैंसर हो गया ! उनको-“कैंसल” कर दिया विधाता ने समय पूर्व ही उन्हें बिना किसी प्रकार का विकल्प दिये वीआरएस दे दिया।
हमें, हमारे नेताओं को ! हमारे सामाजिक रचनाकारों को ! पडोसियों की पत्नी,बहने,बेटियाँ छोटे कपडों में बहुत सुन्दर लगती थीं ! अपनी आँखें सेंकने हम सिनेमाघरों में,मेले-मन्दिरों में जाते थे ! दूसरों की बेटियों को देखने जाते थे ! हमारे महान विद्वान उद्योग पतियों ने ! हमें ऐसा-“इडियट बक्सा” दिया कि हमारी बेटियों को पडोसी देखने लगे ! गुंडों मवालियों के रचनाकार हम ही तो हैं ! हम दोष किसे दें ?
मेरे मित्रों ! दलितों को हमने इतना दबाया ! इतना दबाया ! कि उनमें फूटे ज्वालामुखी से बहते अंगारों ने समाज की समरसता में जहर घोल दिया ! कभी हमने उनके पूर्वजों की पीठ पर ,कमर पर झाडू बांधी थी ! आज वही झाडू हमारे सर पर पडने लगी तो हमें बुरा क्यों लगता है ? हमने ही तो कहा था ! हमारे पूर्वजों ने कहा होगा ! दलितों को शिक्षा का अधिकार नहीं है ! मन्दिरों में उनका प्रवेश निषेध है ! वे गीता रामायण नहीं पढ सकते ! वेदों में उनका अधिकार नहीं है ! कोई फर्क पडा ? उन्होंने तो पूरा संविधान ही गढ दिया ! वे नवीन भारत वर्ष के शिल्पकार हो गये ! कालचक्र पुनः घूमा ! आरक्षण मिला उन्हें ! अवसर दिया विधाता ने उनको ! आज हमारे दलित भाई भारत भाग्य विधाता बन गये ! इसमें हम सवर्णों का कोई योगदान नहीं है ! उन्हें हमने घृणा दी उन्होंने उसी घृणा को अपनी प्रेरणा बना लिया। हम कुछ भी कहें किन्तु ये कडवी सच्चाई है कि आज का वेद-“संविधान” है ! देश संविधान से चलता है ! और संविधान कहता है कि-
“शूद्रो ब्राम्हणस्तामेति ब्राम्हणऽश्चेति शुद्रताम्”शेष अगले अंक में-“आनंद शास्त्री”

आग लगी अकाश में झर-झर झरत अंगार….(३)
हम ब्राम्हण लोग ! अपनी जाति के अभिमान में चूर होकर- “चकनाचूर” होते जा रहे हैं ! हमारे अपने बच्चे वेद मंत्र नहीं जानते ! वेद मंत्र को छोडिये श्रीमद्भगवद्गीता का एक भी मंत्र उनको याद नहीं है ! यज्ञोपवीत पहनने में! तिलक लगाने में ! रुद्राक्ष-तुलसी की कंठी पहनने में अंग्रेजों;स्पेनिश,अमेरिकी, यूरोपीयन को शरम नहीं आयी ! हमें शरम आती है ! विदेशियों को हमारा शाकाहार पसन्द है ! उनको राम-कृष्ण अच्छे लगते हैं!उनको हमारी संस्कृति अच्छी लगती है ! हमारे देवालय, वास्तुकला, वेद शास्त्र ज्ञान के अद्वितीय भण्डार लगते हैं  ! उन्होंने संस्कृत-देवनागरी लीपि अपनायी,और हमने ? “मेकाले” को अपनाया ! लुटेरे-“जेवियर्स” को अपनाया ! गुरूकुल छोड़ अपने बच्चों को कान्वेंट में पढाया ! आज वे बच्चे हमारे संस्कारों की हंसी उडाते हैं तो हमें बुरा क्यों लगता है ?
अपने बच्चों के सामने जब अपने दोस्तों के साथ हम जाम टकरा रहे थे !”चीयर्स-चियर्स” चिल्ला रहे थे ! अपने बच्चों को हम मन्दिरों में निरीह पशुओं की बली देने की कुशिक्षा दे रहे थे ! और वो भी ब्राम्हण होकर भी ! तिवारी,पाण्डे,चतुर्वेदी,भट्टाचार्य, चक्रवर्ती, बन्दोपाध्याय, चट्टोपाध्याय,मुखोपाध्याय,आठवले, नम्बूदरी होकर भी हम मांस मछली,अंडे,भेंड,बकरे खाते हैं ! देवी देवताओं के नाम पर खाते हैं ! उनको भी तथाकथित रूप से खिलाकर खाते हैं ! अपने अपनों के श्राद्ध में हमें शर्म आनी चाहिए ! जिन्हें हम “छोटी जात” कहते हैं वे अपने पूर्वजों के श्राद्ध में, त्रयोदशी में मांसाहार नहीं खिलाते किन्तु हम ब्राम्हणों के हर उत्सव में मछली होना भगवान से भी अधिक आवश्यक है ! क्योंकि हम- “सामवेदीय अथवा ऋग्वेदीय” हैं।
“जात” हमारी बहुत जल्दी जाती है, किसी के छू भर लेने से हम अपवित्र हो जाते हैं ! मैं भ्रमित और दुःखी होता हूँ ये सोचकर कि-“कहीं हम खुद ही तो अछूत नहीं हो गये ?” और ऐसे अछूत हुवे हम कि-“ब्राह्मण देवता” से “याचक” बन गये ! अपनी अस्मिता के साथ समझौता करना हमारी सबसे बड़ी भूल थी, अपने सर्वश्रेष्ठ होने का अभिमान हमारे लिये घातक हुवा,धार्मिक मार्ग का अनुसरण संतोष के साथ सम्भव है ! तृष्णा सम्मान की शत्रु है ! ब्रम्हत्व त्याग का पर्याय है ! शिक्षा देना हमारा मूल कर्तव्य है ! और शिक्षक को धनादि पदार्थों को अपने व्यक्तित्व से अधिक महत्व नहीं देना था ! दान लेने का अधिकारी होना पडता है ! अष्टावक्र ने जनक से कहा था-“जब तक तेरी सभी शंकाओं का समुचित समाधान नहीं करता तबतक तुझसे दक्षिणा लेना महापाप है” और हमने ही अग्निहोत्र छोड़ दिया ? हमने गीता पढनी छोड दी ! ध्यान,तप,जप,यज्ञ,तर्पण,मार्जन का त्याग करने के बाद हमें ब्राम्हण कहलाने का क्या अधिकार है ?
ब्राह्मण साक्षात अग्निर्देवता हैं ! ब्रम्हत्व के तेज के समक्ष साक्षात नारायण भी थर-थर कांपते हैं ! और हमारे लोग-“कुटिल राजनीतिज्ञों” की चरण वंदना करने लगे।मित्रों ! समर्थ और समर्पित विद्यावान को-“ब्राह्मण” कहते हैं इसका किसी उपनाम से दूर-दूर तक सम्बन्ध नहीं है! इसकी कोई भी शारीरिक जाति हो सकती है ! और ब्राह्मण मानसिकता को कहते हैं ! जब विद्वान भटक जाते हैं तो वही-“रावण”बन जाते हैं ! और उन्हीं के सामर्थ्यवान भयानक कुकृत्यों से -“ऐसे अपशगुन” होने लगते हैं।
इन्हीं विद्वानों ने नदियों की धारा मोड दी अथवा बांध दी। पहाडों को खोद कर,काट कर बडी बडी सुरंगें और विशाल सड़कों के जाल और रेलवे की पटरियों से छिन्न-भिन्न कर दिया। यहाँ हमारे विद्वत समाज से थोडी सी भूल हो गयी ! उचित-अनुचित का ध्यान रखना था हमारे वैज्ञानिकों,चिकित्सक,अर्थशास्त्री, न्यायविद इंजीनियरों,आर्थिक सलाहकार,पत्रकारों को सैकडों क्षेत्रों के लोगों को अर्थात राष्ट्र और समाज को संरक्षण-संस्कृति और संस्कार देना आपका कर्तव्य है ! “हम सुधरेंगें जग सुधरेगा”
मैं बस इतना सा जानता हूँ कि समूचे कल अपने द्वारा फैलाई गंदगी को आज साफ कर बिस्तर पर जाने से बडी सुखद निद्रा आती है ! जब हमारे पास कुछ होता है तभी हमारे पास कोई आता है ! सब कुछ दिखाने को नहीं होता ! न ही सब कुछ छुपाना चाहिये ! अपने पूर्वजों की दिखाने और छुपाने की शिक्षाओं का हममें विवेक होना चाहिए ! यह हमारे वेदों का संकल्प है ! इसे आप -“शिव संकल्पम्ऽस्तुः” कहते हैं,शेष अगले अंक में–“आनंद शास्त्री”

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