कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 का परिणाम आ गया कांग्रेस को 42.88 फीसदी वोट शेयर के साथ 136 सीटें मिली हैं वहीं सत्ताधारी भाजपा को 36 फीसदी वोटशेयर के साथ 65 सीटें और जेडीएस को 13.29 फीसदी वोटशेयर के साथ महज 19 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है।वैसे तो चुनाव पूर्व ही लगभग माहौल समझ में आने लगा था, राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के खिलाफ माहौल बन गया था। एकतरफ जहां कांग्रेस को राहुल गांधी के भारत जोड़ो यात्रा से नई ऊर्जा मिल गई थी तो वहीं भाजपा को ब्रांड मोदी पर विश्वास था।
बीच बीच में दोनों पार्टियों से हुई जुबानी हमलों ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया। खासकर कांग्रेस की ओर से विश्व हिंदू परिषद के युवा विंग ” बजरंगदल” पर पावंदी लगाने की बात कहने से भाजपा खेमे में उत्साह चरमसीमा पर पहुंच गया। भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं को उम्मीद थी कि ऐसे मुद्दों को ज्यादा से ज्यादा उछालने से शायद भाजपा को लाभ मिल जाए। ऊपर से योगी आदित्यनाथ और हिमंत विश्व शर्मा के जरिए भी भाजपा ने चुनाव में धार्मिक विभाजन का भरपूर प्रयास किया। मगर फिर भी परिणाम भाजपा के अनुकूल कतई नहीं आया खासकर सीटों के मामले में।
इस चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस खेमा में उत्साह और खुशी बहुत ज्यादा है और हो भी क्यों ना हिमाचल प्रदेश के बाद और बड़े राज्य में सत्ता में वापसी हुई है वो भी राहुल गांधी के भारत जोड़ो यात्रा के बाद हुए चुनावों में ये कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत हैं। आज के चुनावी नतीजों को देखने के बाद जहां पूरे देश के कांग्रेस समर्थक जोश के भरपूर हैं तो वहीं देश के तमाम राजनीतिक विश्लेषकों को ये 2024 का ट्रेलर लगने लगा है।उनको ये बासवराज बोम्मई के बजाए नरेन्द्र मोदी की हार लग रही है। उनका मानना है अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाए तो नरेन्द्र मोदी का इस्तीफा देना तय है। मगर वास्तव में अगर हम पिछले कुछ चुनाव परिणामों के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो ये साफ साफ झलकता है कि इस राज्य सरकार के विरुद्ध इतना बड़ा सत्ता विरोधी लहर होने के बावजूद भाजपा के वोट शेयर में सिर्फ .35% की ही गिरावट देखने को मिला है। पिछले विधानसभा चुनाव में जहाँ राज्य में भाजपा को 36.35% वोट मिला था तो इसबार 36% वोटशेयर मिला है। जबकि 2008-2013 तक राज्य में बीएस येदुरप्पा, जगदीश शेट्टर और सदानंद गौड़ा के नेतृत्व में पांच साल तक चली सरकार को अगले चुनाव (साल 2013) में 2008 के मुकाबले लगभग 14 फीसदी वोटशेयर का नुकसान झेलना पड़ा वहीं इस बार अगर केवल मात्र .35 फीसदी की कमी हुई है तो ये नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता की वजह संभव हुआ है।
इसी तरह कांग्रेस के वोट शेयर में करीब साढ़े चार प्रतिशत की बढ़ोतरी होना और जेडीएस के वोट शेयर में तकरीबन चार प्रतिशत घट जाना भी साफ साफ इशारा कर रहा है कि राज्य सरकार के खराब प्रदर्शन के लिए जेडीएस समर्थकों का एक तबके ने कांग्रेस को वोट किया है। दूसरी बात भाजपा को भी इस चुनाव से आत्मचिंतन करने की जरूरत है हर राज्य गुजरात नहीं है जहां डमी मुख्यमंत्री बनाने के बाद भी बड़ी जीत मिलती रहे। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के प्रदेशों में नए क्षत्रप नहीं उभरने देने की सोच के चलते ही झारखंड,हिमाचल और अब कर्नाटक में सरकार गवानी पड़ी। दरअसल सत्ता में रहते हुए चुनाव जीतने के लिए कम से कम चार फैक्टर को ध्यान में रखना पड़ता है “1. विचारधारा, 2. अंत्योदय से जुड़ी योजनाएं 3.सुशासन 4.सरकार और जनता में प्रत्यक्ष संवाद” और कर्नाटक में भाजपा सिर्फ विचारधारा पर ही उम्मीद लगाए बैठी रही जबकि बाकी तीन फैक्टर को साधने में भाजपा सरकार नाकाम रही। भाजपा ने राज्य में एक ऐसे नेता को सीएम बनाया जो जनता से संवाद स्थापित करने में असफल रहा। जो राज्य की जनता तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाने में विफल रहा। बासवराज बोम्मई ने अपने मंत्रियों और विधायकों को अपने नियंत्रण में नहीं सकें राज्य शासनव्यवस्था में अफसरशाही लालफीताशाही हावी रहा। इन सभी कारणों से जनता में राज्य सरकार के विरुद्ध माहौल बनने लगा और भाजपा लव जिहाद,बुर्का विवाद, यूनिफार्म सिविल कॉड, टीपू सुलतान, बजरंग दल जैसे मुद्दों पर ही अटकी रही। जिससे जनता में खासकर युवाओं में राज्य सरकार के खिलाफ आक्रोश बढ़ता गया मगर ब्रांड मोदी की बजह से भाजपा का वोट शेयर स्थिर रहा।
अब सवाल उठता है इस चुनाव परिणाम का भविष्य के चुनावों खासकर एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में क्या असर पड़ेगा या अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को कितना प्रभावित करेगा??
ऐसे में सबसे पहले तो हर राज्य का अपना अलग मुद्दा होता है उसके आधार पर जनता मतदान करती है और लोकसभा के चुनाव में राज्यों के मुद्दे पूरी तरह गौण हो जाते हैं और राष्ट्रीय मुद्दा हावी हो जाता है। जैसे 2018 में भी कर्नाटक में भले ही सीटों के मामले में भाजपा सिंगल लार्जेस्ट पार्टी थी लेकिन वोट शेयर में कांग्रेस से पीछे थी
इसी तरह 2018 के अंत मे हुए पांच राज्यो के चुनाव में भाजपा को अपने तीन गढ़ गवाना पड़ा तभ भी कुछ विश्लेषक इसे भाजपा की 2019 की संभावित हार बताकर पेश कर रहे थें लेकिन जैसे ही जनवरी 2019 आया माहौल मोदीमय हो गया और चुनाव परिणाम में जिन राज्यों में तीन महीना पहले ही भाजपा की हार हुई थी उन राज्यों में भाजपा ने पचास प्रतिशत से अधिक वोटशेयर के साथ एकतरफा क्लीन स्वीप किया।
इसी तरह 2013 में ही कर्नाटक में जब भाजपा को हराकर कांग्रेस ने सत्ता हासिल की तब भाजपा वोट शेयर के मामले में तीसरी नम्बर की पार्टी थी और अगले साल सोहलवीं लोकसभा चुनाव में भाजपा को 43 प्रतिशत वोटशेयर लेकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसी तरह 2018 में भाजपा को जहां विधानसभा चुनाव में 36.35% वोट मिला तो वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में ये आंकड़ा भी 50 फीसदी के पार चला गया।
इसके अलावा भी हमें याद होना चाहिए कि कैसे 2003 के दिसंबर में हुए तीन राज्यों के चुनाव में बड़ी जीत हासिल करके अटल बिहारी वाजपेयी जी इतने उतावले हो गए थें की चौदहवीं लोकसभा चुनाव को समय से छह महीने पहले करवा दिया लेकिन जब 2004 के लोकसभा चुनाव के परिणाम आए तो अटल जी की नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार चली गई। इसी तरह इसके बाद के चुनाव परिणामों में भी यही परिलक्षित होता रहा है। जैसे लोकसभा में दिल्ली की जनता एकतरफा भाजपा को वोट करती है और विधानसभा चुनाव आते आते वो एकतरफा आम आदमी पार्टी को जीता देती है।
कहने का लब्बोलुआब ये है कि कर्नाटक के परिणाम से कांग्रेस को ज्यादा खुश होकर घर बैठने की जरूरत नहीं है क्योंकि 2024 की डगर इससे अलग होगी। राष्ट्रीय मुद्दों पर सकारात्मक रूप से मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करनी चाहिए जैसे महंगाई, रोजगार सृजन, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दे उछालने चाहिए। लेकिन अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस को खासकर राहुल गांधी को ये सब समझाने का काम कौन करेगा। क्योंकि जो समझा सकते हैं उन्हें राहुल गांधी तवज्जो तक नहीं देना पसंद नहीं करते हैं। और भाजपा को भी अपने राज्य सरकारों के ऊपर पैनी नजर रखने की जरूरत है ताकि राज्यों के चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं लड़ना पड़े।
राजदीप राय
दुल्लभछोड़ा
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