औरों के साथ-साथ ख़ुद की तरक़्क़ी भी ज़रूरी है- सीताराम गुप्ता,
पंजाबी भाषा के कवि सुरजीत पातर की एक कविता है ‘पुल’। कविता इस तरह से है: मैं जिनां लोकां लई पुल बण गिआ सां/ ऊह जदों मेरे तों लंघ के जा रहे सन/ मैं सुणिआ मेरे बारे कहि रहे सन:/ ऊह कित्थे रहि गिआ है चुप्प जिहा बंदा? शायद पिच्छे मुड़ गिआ है! सानूं पहिलां … Read more